झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)
Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography
वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा
DevanagariHindipublished526 पृष्ठ
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लक्ष्मीबाई २३७ जूही खडी हो गई । आखे निश्चल रूप से खुल गईं । श्वेत भूमिकायें काली पुतलियो से प्रकाश भर सा पडा । 'यदि उस काम के करने में, मै या मेरी तरह की और स्त्रिया मर जायँ, तो इस टूटे हुये फूल की महक और देश की मुक्ति के सम्मेलन के वचन को न भूलियेगा।' जूही ने कहा। तात्या बोला 'कभी नही जूही !' जूही — 'आप जारहे हैं ? कब ? फिर कब आइयेगा ?' तात्या—'कल चला जाऊँगा । जल्दी ही आऊँगा । कब आऊंगा ? यह ठीक ठीक अभी नही कह सकता ।' तात्या नमस्ते करके चला गया । उस दिन तात्या को मालूम हुआ कि वास्तव में जूही का बोधक नाम मंगलामुखी सार्थक है ।