भारतकोश
झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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पृष्ठ 247

२३६ झाँसी की रानी यह पहला दिन था जब नाना और तात्या ने सहसा लक्ष्मीबाई के पैर छुये—यद्यपि वे दोनो आयु में उनसे बड़े थे । तात्या वहा से आकर सीधा अपने प्रवास स्थान को नही गया। पहले जूही के घर पहुचा । समय कुछ अधिक हो गया था, परन्तु जूही सोई न थी । तात्या के भीतर आते ही जूही सहमी । लाज की अरुणिमा चेहरे पर बिखर गई । तात्या ने बैठते ही मुस्कराकर कहा, 'तुमने उस समय कुछ नही बतला पाया था। मै बहुत जल्दी में था, इसलिये उतावली में ठीक तौर से पूछ भी नही पाया ।' जूही ने नीची पलको को ऊँचा किया । उसकी आखो से मोहक, मादक मधुसा छलक पडा । जरा एक ओर देखते हुये उसने कहा, 'नही कोई बात नही । मुझे लक्ष्मी पूजन के लिये घर आना था, इसलिये चली आई थी । अब सब सुनाती हू ।' वह खडी थी । तात्या के कहने पर एक ओर बैठ गई । नृत्यगान द्वारा झाँसी स्थित अङ्गरेजी सेना में वह जो कुछ किया करती थी वह उसने व्योरेवार सुनाया । जब वह बात कर रही थी, केशजूटो में बंधे हुये चमेली के फूल, हिल हिल जाते । बात की समाप्ति पर तात्या ने उठकर, जूही के सिर पर हाथ फेरा । हाथ फेरने में एक फूल टूटकर नीचे गिर पडा । तात्या ने फिर खोसने कीशिश की । जूही ने पलकें नीची किये हुये कहा, 'जाने दीजिये ।' 'वह तो मैने खोस दिया जूही,' तात्या बोला, 'मैं लक्ष्मी से मनाता हूं एक दिन आवे, जब इस देश की मुक्ति और तुम्हारे फूलो की महक का सम्मेलन हो ।'