भारतकोश
झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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झाँसी की रानी २३५ रानी—'तो अब आग को भड़काने की आवश्यकता नही है । उसको ढांकने की आवश्यकता है ।' तात्या—'कही कही दोनो की अटक है ।' रानी—'अङ्गरेजो ने भी जासूस छोड़ रक्खे हैं ।' नाना—'अन्तर इतना ही कि उनका जासूप विभाग, महज पैसे के लिये अपना ईमान और अपना देश बेचने को तैयार है और हम लोगो का जासूसी विभाग, कुछ भी न लेकर अपने धर्म, अपने देश और स्वराज्य के लिये, अपने तन, मन, धन को आग में झोकने के लिये प्रस्तुत हैं । पुलिस, जो शासन का सबसे अधिक प्रचण्ड कुत्ता होता है, वह भी हमारे साथ होता चला जाता है ।' रानी—'इसलिये कि हम सबके धर्म का और रोटी का सवाल है ।' नाना—'मुसलमान और भी अधिक कुढे हुये हैं । वादशाह की जो नज़र—न्योछावर ईद और नौरोज के दिन होती थी, वह तो बारह-चौदह साल से बन्द हैं । अब अङ्गरेज चाहते हैं कि बादशाह दिल्ली का लाल किला खाली करके मुङ्गेर चला जावे और गोरे लोग किले में बैठकर हिन्दुस्थान भर को लाल आंखे आराम के साथ दिखलाते रहे । जो अपने को कभी 'फिदवी खास' कह कहकर बल खाते थे, वे अब अपने को तान कर, मालिक खास कहते हैं ।' रानी—'क्या वे लोग यह सब खुल्लमख़ुल्ला कर रहे हैं ?' नाना—'बिलकुल । उनको अब कोई डर नही रहा । जनता में, विविध उपायो से, हिन्दू-मुसलमानो को लडाने का सिलसिला जारी है ।' रानी सोचने लगी । बोली, 'बहुत सावधानी और संयम से काम लेने की आवश्यकता है । हम लोगो के अपने कार्य की प्रगति के समाचार, बराबर मिलते रहने चाहिये ।' रानी ने खिड़की के बाहर दृष्टि डाली । रात कुछ अधिक गई समझ कर, ये दोनो उठ खड़े हुये और रानी का चरण स्पर्श करके चले गये ।