झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)
Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography
वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२३४ झांसी की रानी वे धर्म के पीछे प्राण गँवाने को उठ-उठ पड़ते हैं। अब उनको बहुत अधिक रोका नही जा सकेगा।' रानी—'जब शीघ्रता करने की अटक होगी, मैं कहूंगी कि अब काम करने में आधी से होड लगाओ। तब वैसा करना। परन्तु अभी जैसे बने तैसे सयम से काम लो। नीति और युद्ध का समन्वय होना चाहिये।' नाना—'प्रयत्न तो यही किया जा रहा है। हम लोग इधर-उधर घूमते-घामते, दक्षिण के तीर्थों को जा रहे हैं। राजाओ से कम बात करेंगे, जन-नायको से मिलेगे। क्योकि बहुत दिनो तक स्वराज्य-युद्ध को चलाते रहने के लिये, हम लोगो को प्राण बुन्देलखण्ड, अवध और महाराष्ट्र से प्राप्त होगे।' तात्या—'यहा की स्त्रिया तो ऐसा काम कर रही हैं कि मैं दंग हो हो जाता हूँ।' रानी—'हां, मोतीबाई और उसकी संगिने काम कर रही हैं।' तात्या—'मोतीबाई अभी आई थी। आप पूजा में थी। उसने बत- लाया कि फौज में ईसाई मत फैलाने का किस रूप में प्रयत्न हो रहा है। हमारे और लोग भी काम कर रहे हैं। उनमें मैंने अलग खोज की थी। मोतीबाई की बातो से उनके समाचारो की पुष्टि होती है।' रानी—'मोतीबाई को यह मालूम है कि हमारे कुछ और लोग भी काम कर रहे हैं?' तात्या—'नही बाईसाहब।' नाना—'ऐसा प्रबन्ध रक्खा है कि एक विभाग वाले दूसरे विभाग वालो की बात न जान सकें।' रानी—'एक-एक पल्टन में तीन-तीन अफसर क्यो चुन रहे हो? दो-दो काफी थे।' नाना—'तीन इसलिये, कि दो दो मार दिये गये या बदल लिये गये तो काम करने के लिये एक एक तो बच ही जावेगा।'