झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)
Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography
वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा
२३६ झाँसी की रानी यह पहला दिन था जब नाना और तात्या ने सहसा लक्ष्मीबाई के पैर छुये—यद्यपि वे दोनो आयु में उनसे बड़े थे । तात्या वहा से आकर सीधा अपने प्रवास स्थान को नही गया। पहले जूही के घर पहुचा । समय कुछ अधिक हो गया था, परन्तु जूही सोई न थी । तात्या के भीतर आते ही जूही सहमी । लाज की अरुणिमा चेहरे पर बिखर गई । तात्या ने बैठते ही मुस्कराकर कहा, 'तुमने उस समय कुछ नही बतला पाया था। मै बहुत जल्दी में था, इसलिये उतावली में ठीक तौर से पूछ भी नही पाया ।' जूही ने नीची पलको को ऊँचा किया । उसकी आखो से मोहक, मादक मधुसा छलक पडा । जरा एक ओर देखते हुये उसने कहा, 'नही कोई बात नही । मुझे लक्ष्मी पूजन के लिये घर आना था, इसलिये चली आई थी । अब सब सुनाती हू ।' वह खडी थी । तात्या के कहने पर एक ओर बैठ गई । नृत्यगान द्वारा झाँसी स्थित अङ्गरेजी सेना में वह जो कुछ किया करती थी वह उसने व्योरेवार सुनाया । जब वह बात कर रही थी, केशजूटो में बंधे हुये चमेली के फूल, हिल हिल जाते । बात की समाप्ति पर तात्या ने उठकर, जूही के सिर पर हाथ फेरा । हाथ फेरने में एक फूल टूटकर नीचे गिर पडा । तात्या ने फिर खोसने कीशिश की । जूही ने पलकें नीची किये हुये कहा, 'जाने दीजिये ।' 'वह तो मैने खोस दिया जूही,' तात्या बोला, 'मैं लक्ष्मी से मनाता हूं एक दिन आवे, जब इस देश की मुक्ति और तुम्हारे फूलो की महक का सम्मेलन हो ।'
लक्ष्मीबाई २३७ जूही खडी हो गई । आखे निश्चल रूप से खुल गईं । श्वेत भूमिकायें काली पुतलियो से प्रकाश भर सा पडा । 'यदि उस काम के करने में, मै या मेरी तरह की और स्त्रिया मर जायँ, तो इस टूटे हुये फूल की महक और देश की मुक्ति के सम्मेलन के वचन को न भूलियेगा।' जूही ने कहा। तात्या बोला 'कभी नही जूही !' जूही — 'आप जारहे हैं ? कब ? फिर कब आइयेगा ?' तात्या—'कल चला जाऊँगा । जल्दी ही आऊँगा । कब आऊंगा ? यह ठीक ठीक अभी नही कह सकता ।' तात्या नमस्ते करके चला गया । उस दिन तात्या को मालूम हुआ कि वास्तव में जूही का बोधक नाम मंगलामुखी सार्थक है ।
२३८ झाँसी की रानी [ ४६ ] जूही का छावनी में आना जाना बढ़ गया। उसके नृत्य गान की कला में और भी मोहकता आगई। परन्तु किसी सिपाही या अफ़सर में उसने अपने को बाल बराबर भी नही खोया। वे समझते थे कि जूही हृदय-हीन है। जूही को हर पल्टन मे तीन तीत उपयुक्त अफ़सर ढूँढने मे बहुत दिन नही लगे। उन अफ़सरो को यह भी मालूम हो गया कि हम लोगो को किसी दिन एक महान कार्य करना है, परन्तु उनको ठीक ठीक यह नही मालूम था कि कब। जूही स्वयं नही जानती थी। कुछ और लोग जो पल्टनो के लिये इसी कर्त्तव्य पर नियुक्त थे उनको भी मालूम न था, परन्तु वे यह जानते थे कि जूही का काम, उसी योजना का एक अङ्ग है, जिसका एक भाग उन लोगो का भी काम था। परन्तु वे एक दूसरे से मिलते न थे। निषेध था। एक दिन जूही के नृत्य-गान का आनन्द लेने के लिये कप्तान डनलप भी आ गया। एक क्षण के लिये जूही सकपकाई। परन्तु उसने अपना नियन्त्रण शीघ्र कर लिया और वह बहुत मजे में नृत्य गान करती रही। असल में डनलप को उसके जासूस ने खबर दी कि छावनी में नर्त- कियां आती हैं और अफ़सरो से दीन धर्म सम्बन्धी कुछ बाते भी किया करती हैं। इसलिये वह सहसा वहा आ गया था। नृत्य गान से उसका मन शीघ्र ऊब गया, क्योकि अधिकांश अङ्गरेजो की तरह उसको भारतीय कलाओ के प्रति उपेक्षा थी। परन्तु जूही बहुत सुन्दर थी। उसको सहज ही विश्वास न होता था कि ऐसा सौन्दर्य अपने परिधान में किसी छल कपट को छिपाये होगा। तो भी उसने सवाल किये— डनलप—'तुम छावनी से कितना पैसा कमा ले जाती हो ?' जूही—'जब जो मिल जाय हुजूर ?' डनलप—'नाचने गाने के सिवाय कोई और पेशा करती हो ?'
लक्ष्मीबाई २३६ जूही—'नही तो । मै अविवाहित हूँ । कुमारी ।' डनलप—'तुम लोगो मे विवाह भी होते हैं ?' जूही—'ज़रूर । हम लोग तो केवल नाचने-गाने का पेशा करती हैं !' डनलप—'तुम रानी साहब के यहा भी नाचने-गाने जाती हो ? मैंने सुना है कि उनको गाना सुनने और नाच देखने का शौक है ।' जूही—'मै वहा नही जाती । कभी नही गई । उनको भगवान के भजन सुनने का शौक है । नृत्य का कोई शौक नही ।' डनलप—'रानी साहब गाती हैं ?' जूही—'बिलकुल नही । मुझको क्या मालूम ।' डनलप—'रानी साहब ने तुमको घोडे की सवारी नही सिखलाई ?' जूही— मै उनके पास कभी जाती ही नही । घोडे की सवारी क्यो सिखलाती ?' डनलप—'और औरतो को तो सिखलाती हैं ?' जूही—'सुना है ।' डनलप—'मोतीबाई नाम की वेश्या को जानती हो ?' जूही—'वह वैश्या नही है । आपसे किसने कहा ?' डनलप—'मुझमे सवाल करती है ! जानती है कि धक्के देकर निकलवा दूंगा ।' जूही —'मैने आपका क्या बिगाडा है ?' डनलप—'अच्छा हटो । आगे कभी छावनी में मत आना ।' जूही ने मुंह उदास बना लिया और वह चली गई । परन्तु डनलप के ओट होते ही उसके होठो पर, गाली पर, मुस्कराहट की छटा छा गई । उसको याद आ गया—'एक दिन आवेगा जब फूलो की महक और देश की मुक्ति का सम्मेलन होगा ।' वह चाहती थी कि धक्के देकर निकाली जाती तो अच्छा होता, उसके शरीर से, कही से, थोड़ा-सा खून निकल पडता तो और भी अच्छा होता ।'
२४० झाँसी की रानी नर्तकी चली गई, परन्तु उसका सौन्दर्य डनलप के भीतर एक कोने में हलकी छाप, एक टीस, छोड़ गया। उस टीसने सिपाहियो के प्रति क्षोभ का रूप पकडा। डनलप बोला, 'तुम लोग इन टके वाली औरतो के मोह मे अपना पैसा और समय नष्ट करते हो। इन औरतो का झूठा जादू ही तुमको ईसाई होने से रोक रहा है। इन शैतानो को छोडकर सच्चे धर्म पर ईमान लाओ, तो मुक्ति भी मिलेगी और पैसा अलग।' पैसा और मुक्ति का घनिष्ठ सम्बन्ध सिपाही लोग बहुत दिनो से सुन रहे थे। पहले तो इस सम्बन्ध की बात पर उनको हँसी आया करती थी, अब वे खीजने लगे, जलने लगे। परन्तु सिपाहियो ने चुपचाप सुन लिया। डनलप ने सोचा उसकी बात घर कर रही है। डनलप कहता गया, 'तुम्हारे देवी-देवता सब बदसूरत और व्यर्थ हैं। उन पर विश्वास करने के कारण तुम मूर्ख बने हुये हो। इसलिये तुम्हारी तरक्की नही हो पाती। ईसाई होते ही तुमको एक ईश्वर और उसके एक पुत्र पर ही विश्वास लाने की ज़रूरत है। दुनिया भर की डाकिनी, पिशाचिनो और भूत-प्रेतो से पीछा छूट जावेगा। हिन्दू-मुसलमान सब बेवकूफ हो। इन्जील पढो तो आँखे खुल जावेगी।' सिपाहियो ने इस पर भी कुछ नही कहा। डनलप बोला, 'रिसलदार, तुमको खुद ईसाई धर्म कबूल करना चाहिये, वरना तुम्हारे हक में अच्छा नही होगा। जैसे ही कोई ईसाई अफसर मिला तुम, बरखास्त कर दिये जाओगे।' रिसालदार ने कहा, 'जो हुकुम।' डनलप समझा, 'रिसालदार ईसाई होने के लिये लगभग राजी हो गया है। पूछा, 'कब तक?' रिसालदार ने उत्तर दिया, 'कुछ महीनो की ही कसर है हजूर!' डनलप इस वाक्य के भीतरी अर्थ को नही समझा।
डनलप के जाते ही सारा सिपाही समज व्यङ्ग और क्षोभ में प्रमत्त हो गया। सुरीली और रूप वाली नर्तकी के अपमान का उनको रञ्ज था। अपने धर्म की अवहेलना पर उनको क्रोध था और अङ्गरेज के मुँह से रानी का नाम तक लेने पर, उनको क्षोभ था। 'उस विचारी को धक्के देकर निकालने की धमकी दी ! वडा हूश है।' 'अरे पाजी है। कहता है, धर्म-ईमान छोड दो। ये शराबी कबाबी धर्म-ईमान को क्या जाने।' 'मेरी तबियत में तो आ गया था कि पौदो पर दुलत्ती कस दूँ।' 'जरा ठहरो। समय आरहा है। फिलहाल मनाही है। सहते जाओ। थोडी सी कसर रह गई है। हमारे मुखिया लोग इलाज सोच रहे हैं।' 'खाक सोच रहे हैं। जब धर्म न रहेगा, मन्दिर मसजिद साफ हो जावेगे, तब हकीमजी इलाज करने आवेगे।' 'कारतूस फिर जारी किये गये हैं। सुनता हू, कलकत्ते के कारखाने में लाखो करोड़ो की तादाद में बनाये जा रहे है और एक अङ्गरेज या ईसाई को चार आना सेर के हिसाब से, गाय और सुअर की चर्बी इकट्ठी करके कारखाने मे देने का ठेका भी दे दिया गया है।' 'आने दो आने दो कारतूसो को। जीते जी तो उन कारतूसो को छुयेंगे नही। और यदि खोलने के लिये मजबूर किये गये, तो पहली गोली इस पाजी डनलप पर।' 'ईश्वर एक है सो तो बिलकुल ठीक है। न हिन्दू इसके खिलाफ कुछ मानते हैं और न मुसलमान। लेकिन ईश्वर के एक ही बेटा हुआ यह कुर्सीनामा इस डनलप को कहा से मालूम हुआ ?' 'जिस कारखाने से भ्रष्ट कारतूस निकले, उसी से इस तरह का मजहब निकला होगा।' 'हमारे यहाँ ईसा को पैगम्बर माना गया है, लेकिन खुदा का बेटा नही माना गया।' 'उसके बेटे तो मियाँ हम सब लोग हैं।'
२४२ झाँसी की रानी 'यह डनलप असल में अपने और अपने अङ्गरेज भाइयो के सिवाय किसी को खुदा का बेटा नही मानता।' 'हाय न जाने वह दिन कब आवेगा!' 'बहुत दिनो अपने ही भाइयो से लडे और इन लोगो के बहकाने से उनको तबाह किया।' 'कहते हैं हमारा निमक खाते हो, निमक की बजाना--हम कहते हैं निमक तुम्हारे वाप का है?' 'बेशक है। ये लोग अगर कुर्सीनामे में से सावित करदे कि ये खुदा के नाती पोते पन्ती वन्ती कुछ हैं तो बेशक है।' 'यह तो हम लोग सावित कर सकते हैं क्योकि हम उसकी पूजा करते हैं, उसके कदमो में नमाज़ कहते हैं, लेकिन ये लोग—मौका मिला और शराब गटकी, क्लब घर में पहुचे और नाचे मटके। इतवार को गिरजा में सातवे दिन जाकर तोवा करली और फिर वही रफ्तार जारी।' 'कूडा हम साफ करे और मोटी मोटी तनख्वाहे ये मारे।' 'हम हिन्दुस्थानी सिपाहियो की वारक देखो और इन के बंगले। हमारी रोटी, चपाती और दाल देखो और इनके अन्डे बिस्कुट। हमारी छोटी सी तनख्वाह देखो और इनका मुहरो का ढेर, जो रोज़ रोज़ विलायत चला जा रहा है।' 'और इस पर बदमाशो की 'डैमफूल'। तहज़ीब के साथ बात करना जानते ही नही। इनका मुल्क तो बिलकुल हब्शी है।' 'सबको तबाह कर दिया। झासी की देवी को देखो, किस मुसीबत में अपने दिन गुज़ार रही है।' 'मिया तुमने देवी सच कहा। एक दिन कमासिन टौरिया की तरफ घोडा दौडाये जा रही थी। मेरी आंखो में चकाचोध लग गई। जी चाहता था कि पैर छू लूं।' 'सच कहता हूँ डनलप सरीखे शेखीबाज़ो को तो वह एक तमाचे में ढीला करदे।'
लक्ष्मीबाई २४३ 'न जाने वह दिन कब आवेगा कि फिर रानी का झण्डा किले पर फहरावे ।' 'किले में गोरो की वसीगत देखकर मेरा तो खून जल उठता है ।' 'लोगो को किले में जाने की मनाही है ।' 'जब हमारा राज हो जावेगा, हम इन लोगो को किले की हवा के पास भी न फटकने देंगे ।' 'महीना, तारीख, वक्त कुछ मुकर्रर हुआ ?' 'चुप, चुप, अभी नही । ठहरे रहने का हुक्म है । इन्तज़ार करने का ।' 'अब तो सहा नही जाता । कब तक अपने धर्म और मजहव की तौहीन वरदास्त करते रहे ?'
२४४ झाँसी की रानी [ ४७ ] सन् १८५६ में ईस्ट इण्डिया कम्पनी के कर्णधार, भारतवर्ष भर को ओर से लेकर छोर तक, ईसाई बनाने के स्वप्न देखने लगे थे । अस्पृश्य चर्बी वाले कारतूसों की वास्तविकता को, स्वयं कई ज़िम्मेदार अङ्गरेज़ लेखक स्वीकार करते हैं । यह ठीक है कि उनके बन्द करने का प्रयत्न किया गया, परन्तु वह था शिथिल । कम्पनी के बोर्ड के चेयरमैन तो उस स्वर्गा-घडी की प्रतीक्षा में आँखें अटकाये हुये थे, जब सारा भारतवर्ष– हिन्दू और मुसलमान–अपने धर्म को छोड़कर कम्पनी के धर्म को कबूल करके उनकी शासन सत्ता को प्रलय पर्यन्त, अपने कन्धों पर धारण किये रहे । परन्तु इंगलेड के कुछ लोगो को भारत में आने वाली विपत्ति के बादल का एक छोटा सा टुकडा दिखलाई पडने लगा था । उनके मुनीम डलहौजी ने दूकान को भारत में इतना काफी पसारा दे दिया था, कि अब उनकी रोकड बाकी खीचने और बहीखाता सँभालने के लिये भी, उनको कुछ समय चाहिये था । इसलिये डलहौज़ी को बुलाकर कैनिंग को भेजा । कैनिंग ने विपत्ति के बादल के उस टुकडे को स्पष्ट देख लिया । परन्तु उसको आत्म विश्वास था इसलिये वह भारत में आया, और आने पर ईसाई मत प्रचार के लिये एक काफी रकम हिन्दुस्थान के खज़ाने से निकाल कर रख दी । पञ्जाब को कम्पनी–भक्त समझा जाता था । ईसाईयत के प्रचार वेग से वह भी न बचा । इधर नाना साहब, तात्या, बहादुरशाह और उनकी बेगम ज़ीनत– महल, अवध की बेगम हज़रतमहल और रानी लक्ष्मीबाई का व्यापक और सूक्ष्म प्रचार जारी था । स्वाधीनता के युद्ध के लिये क्षेत्र तैयार हो रहा था, थोडी सी ही कसर थी जब नियत दिन और समय पर एक साथ सम्पूर्ण हिन्दुस्थान में विस्फोट होना था । वह दिन और समय अभी नियुक्त नही हुआ था ।
लक्ष्मीबाई २४५
सन् १८५७ का जनवरी मास आ गया। दमदम की छावनी में एक घटना हो पड़ी। एक मेहतर ने ब्राह्मण सिपाही से पानी पीने के लिये लोटा मांगा। ब्राह्मण सिपाही मेहतर को लोटा कैसे दे देता ! वह मेहतर हो या न हो प्रचारक अवश्य था। वह भागा या हटा नही। दृढ़ता पूर्वक डटा रहा। बोला, 'ओहो, जातपात का यह घमण्ड ! आ रहे है कारतूस जिनको दात से खोलना पडेगा। उनमें सुअर और गाय की चर्बी लगी है। देखें तुम्हारी जात उन कारतूसो के प्रयोग के बाद रहती है या जाती है।' कारतूसो की सनसनी चल तो बहुत दिनो से रही थी और अकेले दमदम में नहीं किन्तु लगभग सारी छावनियो के हिन्दुस्थानी सिपाहियो में। दमदम में कारतूसो के बनाने का कारखाना था और उन दिनो बहुत संख्या में कारतूस बनाये भी जा रहे थे। इसलिये ब्राह्मण सिपाही के मन में यह भर्त्सना खप गई। वह अपने बेडे के अन्य सिपाहियो से कहता फिरा। क्षोभ फैलता गया और बढता गया। सिपाहियो की बात उनके अङ्गरेज अफ़सरो तक पहुँची। उन्होंने इसको महज गप बतलाया। सिपाहियो ने कारखाने के हिन्दुस्थानी मजदूरो से तलाश किया। उन्होने बात को सच बतलाया। दमदम के इन सिपाहियो ने हज़ारो चिट्ठिया हिन्दुस्थान भरकी छावनियो में भिजवाई। सिपाही कुछ कर उठने के लिये बेचैन हो उठे। झाँसी की छावनी में भी चिट्ठी आई। आश्चर्य होता है कि थोडे दिनो में ये चिट्ठिया गुप्त रूप मे कैसे सर्वत्र फैल गई। जूही इत्यादि अब छावनी में नहीं आ-जा पाती थी, पर उनके पता देने वाले लोग छावनी के सम्पर्क में थे। रानी को इस घटना का समाचार मिल गया। उनको चिन्ता हुई कही ऐसा न हो कि ये लोग कुसमय कुछ कर बैठें। वसन्त पञ्चमी हो चुकी थी। फरवरी का महीना था। चाँदनी डूब चुकी थी। रात बिलकुल अन्धेरी। हवा ठंडी मन्द मन्द। तारे दमक रहे थे। कुछ बड़े बड़े, असख्य छोटे छोटे। जैसे चांदनी अपनी चादर छितरा
२४६ झाँसी की रानी कर छोड गई हो । नीचे सघन अन्धकार । सब दिशाओ में गुलाई सी वाघे हुये । झींगुर झकार रहे थे । रानी को नीद नही आ रही थी । कठिन व्यायाम से तप्त देह को ठड भली लग रही थी । खिडकी खुली हुई थी । उसमें से कई बडे बडे तारे दिखलाई पड़ रहे थे । झींगुर की झनकार के ऊपर दूर से आनेवाला किसानो और चरवाहो के फाग-गीत का स्वर सुनाई पड जाता था । रानी ने सोचा, 'क्या ये लोग ईसाई बना लिये जावेगे ? ईसाई होने पर फिर क्या अपनी फागें गा सकेगे ? इनके बच्चे किल्ली-डडा और कबड्डी छोडकर फिर क्या खेलेगे ? होली, दिवाली, दशहरा ईद, सब यहा से - चलदेंगे ? स्त्रियो का क्या होगा ? ऐसी सुन्दर वेश भूषा को छोड कर ये सब क्या किरानी पोशाक करेंगी ? ईसाई आवागमन नही मानते, फिर मुक्ति का क्या अर्थ ? और गीता, रामायण इत्यादि का क्या होगा ?' रानी बिस्तरो मे बैठ गई ं। निविड अन्धकार में भी महल के सामने वाला ऊँचा पुस्तक-भवन, अपनी थोडी सी रूप-रेखा प्रकट कर रहा था । 'क्या वेद-शास्त्र, गीता, पुराण, दर्शन, काव्य ये सब व्यर्थ हो जायँगे ? जला दिये जायँगे या फेक दिये जायँगे ?' रानी ने होठ से होठ दबाया । नथनो से भभक निकली । 'कदापि नही । कभी नही । मै लडूगी । उन गरीबो के गीतो की रक्षा के लिये । इन पुस्तको के लिये और जो कुछ इनके भीतर लिखा है उसके लिये । ऋषियो का रक्त ऐसा हीन और क्षीण नही हो गया है कि उनकी सन्तान तपस्या न कर सके । कीडो-मकोडो की तरह यो ही विलीन हो जाय ।' 'नही कृष्ण अमर है । गीता अक्षय है । हम लोग अमिट हैं । भगवान की दया से, शंकर के प्रताप से मै बतलाऊँगी कि अभी भारत में कितनी लो शेष है । और यदि मै इस प्रयत्न में मर गई तो क्या होगा । कोई दूसरा तपस्वी मुझसे अच्छा खडा हो जावेगा और इस भूमि का उद्धार करेगा । तपस्या का क्रम कभी खण्डित नही होगा ।'
लक्ष्मीबाई २४७ रानी फिर लेट गईं । 'नैन छिन्दन्ति शस्त्राणि नैन दहति पावक' सोचते हुए निद्रा लाने की चेष्टा करने लगी। इतने में पहरे वाली स्त्री-सैनिक ने द्वार के पास आकर खासा । रानी ने अनसुनी कर दी । वह फिर खासी । रानी बैठ गई । पूछा, 'क्या है ?' पहरे वाली भीतर आई । उसने कहा, 'श्रीमन्त सरकार, मोतीबाई दर्शन के लिये आई है । मैंने मना किया। नही मानी । हठ कर रही हैं। कहती हैं आधी घडी का तुरन्त समय दिया जाय । जैसी आज्ञा हो ।' रानी ने मोतीबाई को बुला लिया । पास काठ की एक चौकी पडी थी । मोतीबाई से उसी पर बैठने को कहा । वह नही बैठी । बोली, 'सरकार इस चिट्ठी को पढले ।' मोतीबाई दीपक उठा लाई चिट्ठी पर किसी के हस्ताक्षर नही थे । उसमें लिखा था:— 'अब और नही सहा जाता । कब तक कलेजे में छुरी चुभाये रहे । उठो और धर्म के लिये कट मरो । थोडे से विदेशियो ने इस विशाल देश को घेर रक्खा है । निकाल दो । देश को स्वतन्त्र करो । धर्म की रक्षा करो ।' रानी—'यह चिट्ठी कहा मिली ?' मोतीबाई—'इस प्रकार की कई चिट्ठियां छावनी में आई हैं। मुझको भरोसे के लोगो ने आज दिन में बतलाया था । इस चिट्ठी को सरदार तात्या साहब ने दिया है ।' रानी—'तात्या टोपे ! कहा हैं ? झासी कब आये ?' मोतीबाई—'सन्ध्या के समय आये और प्रात काल के पहले चले जायेंगे । वह इसी समय दर्शन करना चाहते हैं । बाहर खडे हैं ।' रानी—'बाहरी कमरे में बिठलाओ । में आती हू ।'
१४८ झाँसी की रानी रानी ने सफेद साडी पर एक मोटा सफेद दुशाला ओढा और वह बाहरी कमरे में तात्या के पास पहुंची। मोतीबाई को रानी ने उसी कमरे में बिठा लिया। रानी ने पूछा, 'इस चिट्ठी का क्या प्रयोजन है ? मुझको तो असमय जान पडता है।' 'हा बाईसाहब,' तात्यो ने उत्तर दिया, इसीलिये ले आया हूँ। मोतीबाई ने बतलाया कि इस प्रकार की चिट्ठिया यहा की छावनी में भी आई हैं। सिपाहियो में बेहद जोश फैला हुआ है, परन्तु न तो अभी कोई व्यवस्था हो पाई है और न काफी सगठन हुआ है। समय के पहले यदि विस्फोट हो गया तो अनेक सिपाही व्यर्थ मारे जावेगे। असफलता और निराशा देश को दबा लेगी और न जाने कितने समय के लिये यह देश विपदग्रस्त हो जावेगा।' रानी—'इसको रोकना चाहिये और सगठन शीघ्र कर लिया जाना चाहिये।' तात्या—रुपये पैसे की कोई असुविधा नही रही। काफी समय तक लडाई चलाते रहने के लिये धन इकट्ठा हो गया है। बारूद का और शस्त्रो का बहुत अच्छा प्रबन्ध है। इसलिये जल्दी से जल्दी की जो हो सकती थी नियुक्त कर ली गई है। दिल्ली, लखनऊ इत्यादि वाले सहमत हैं। आपकी सहमति लेकर सबेरे के पहले रवाना हो जाऊगा।' 'कौनसी तारीख ?' रानी ने प्रसन्न होकर पूछा। 'इकतीस मई रविवार, ११ बजे दिन', तात्या ने बतलाया। रानी—'तीन-चार महीने हैं। मुझको यह तारीख पसन्द है। देश भर में सब जगह एक साथ ?' तात्या—'सब जगह एक साथ। तब तक हम लोग मनाते हैं कि सिपाही और जनता, आत्म-नियन्त्रण से काम लें'
लक्ष्मीबाई २४६ रानी—'मोतीबाई, अब तुम लोगो को ऐसे साधन काम में लाने पड़ेंगे, जिसमें छावनी में कोई भी उपद्रव उस दिन और उस समय तक न होने पाये।' • तात्या—'हर पल्टन के तीन-तीन अफसरो को इस तारीख और समय की सूचना कर दी जावे और उनको समझा दिया जावे कि तब तक सब प्रकार के अपमान चुपचाप सहते चले जावे । त्राण की घड़ी वही है और उनसे कह देना कि जब तक कमल का फूल छावनी में न आवे, किसी को भी तारीख और समय न बतलाया जावे और सिपाहियो को उत्तेजित होने से बरकाया जावे । कमल का फूल वैशाख से खिलने लगता है । प्रत्येक तालाब मे काफी मिलता है वह ठीक समय पर छावनी से छावनी घुमाया जावेगा । उसका आना समग्र सिपाहियो को कर्तव्य के लिये जाग्रत करना है और तारीख तथा ११ बजे के समय की सूचना देना है।' मोतीबाई—'मैं अच्छी तरह समझ गई।' रानी—'अब कहा जाओगे?' तात्या—'ग्वालियर । वहा से राजपूताने की ओर । एक चक्कर चैत के उपरान्त और लगेगा । नाना साहब तीर्थ-यात्रा के लिये निकलेंगे । उसी की आड में सब कार्यक्रम हर जगह बतला आवेंगे।
२५० झाँसी की रानी [ ४८ ] फरवरी में एक दुर्घटना हो गई। वारकपूर की १६ नम्बर पलटन को कारतूस प्रयोग करने के लिये दिये गये । सिपाहियो ने प्रयोग करने से दृढ़तापूर्वक इनकार कर दिया । बङ्गाल में उस समय कोई गोरी पलटन न थी । इसलिये जनरल ने तुरन्त वरमा से एक गोरी पलटन मंगवाकर १६ नम्बर पलटन से हथियार रखवा लेने और सिपाहियो को वरखास्त कर देने का निश्चय कर लिया । सिपाहियो को मालूम हो गया । उनमें से कुछ ने चुपचाप हथियार रख देने की अपेक्षा तुरन्त क्रांति कर डालने , का संकल्प किया । उनके हिन्दुस्थानी अफ़सरो ने ३१ मई तक सब्र करने की सलाह दी । परन्तु उस पलटन का एक सिपाही मङ्गल पांडे आपे से बाहर हो गया । उसने कुछ अफ़सर मार डाले । उसको फासी देदी गई । इस घटना की सूचना बहुत शीघ्र उत्तर-भारत मे फैल गई । नाना साहव और अजीमुल्ला मार्च के महीने में तीर्थ यात्रा के लिये निकल पड़े । दिल्ली में गुप्त मन्त्रणाये हुई । फिर अम्बाला गये । इसके उपरान्त मध्य अप्रैल में लखनऊ पहुँचे । वहा नाना साहब का समारोह के साथ जलूस निकला । नाना अङ्गरेजों से प्रत्येक स्थान पर मिलता था, जिसमें वे लोग निश्चिन्त बने रहे । लखनऊ के बाद कालपी और झाँसी आये । योजना का कार्य-क्रम निश्चित करके चले गये । उत्तर हिन्द की लगभग समस्त छावनियो में होते हुये नाना और अजीमुल्ला बिठूर आ गये । स्थान-स्थान और प्रदेश प्रदेश में प्रभाव वाले व्यक्ति प्रचार के कार्य में जुट गये । अभी तक अङ्गरेजो को क्रांति के सामूहिक रूप का बिलकुल पता न था । गरमी आ गई । सरोवरों में कमल खिल उठे । फसल भी कट कर घरो में आने लगी । स्वाधीनता-युद्ध के दो चिह्न प्रकट हुये । एक कमल, दूसरा रोटी । असंख्य कमल के फूल भारतवर्ष भर की छावनियो में फैल गये ।
लक्ष्मीबाई २५१ कमल फूलो का राजा । सरस्वती की महानता, लक्ष्मी की विशालता उसके पराग और केशर में कही अदृष्ट रूप से निहित है । वह विष्णु की नाभि से निकला और अनन्त समय के उपरान्त वही वापिस जायगा । वह हिन्दुस्थान की प्रकृति का, सस्कृति का, मृदुल, मजुल. मांगलिक और पावन प्रतीक है । उसका रग हलका लाल है । वह बिलकुल रक्त नही है । हिन्दुस्थान में होने वाली क्रान्ति खूनी जरूर थी, परन्तु उस खूनी क्रांति के गर्भ में मंजुलता और पावनता गढी हुई थी । इसीलिये सन् ५७ की क्रांति का यह प्रतिबिम्ब चुना गया । क्रांति करेंगे—मानवीयता की रक्षा के लिये, क्रांति होगी—मानवीयता लिये हुये ! कमल के साथ रोटी भी चलती थी । एक गाव से दूसरे गाव एक रोटी भेजी जाती थी । दूसरे गाव में फिर ताजी रोटी बनी और तीसरे गाव भेज दी गई । हिन्दुस्थान की वह क्रांति हिन्दुस्तानियो की रोटी की रक्षा के लिये हुई थी । रोटी उस रक्षा के प्रयत्न का प्रतीक थी । जिसने सोचा उसने कल्पना का कमाल कर दिया । यह उपज हिन्दुओं और मुसलमानो, दोनो की थी । कमल और रोटी का दौरा समाप्त नही हुआ था कि छ मई को मेरठ में विस्फोट हो गया । मेरठ में बडी छावनी थी । कई हिन्दुस्थानी और अङ्गरेजी पलटनें थी । एक हिन्दुस्थानी पलटन के नब्बे सिपाहियो को कारतूस दिये गये । सिपा- हियों को विश्वास था कि कारतूस अस्पृश्य चर्बी वाले हैं । अङ्गरेजो ने उन्हे आश्वासन दिया, कि नही हैं। पचासी सिपाहियो ने कारतूसो को छूने से इनकार कर दिया । उनका कोर्टमार्शल हुआ । आज्ञा न मानने के अपराध में उनको दस दस वरस के कठोर कारावास का दंड मिला । नौ मई के दिन इन सिपाहियों को गोरी फौज और तोपखाने के सामने लाकर खडा किया गया । वरदियाँ उतरवा ली गईं और हथकडी वेडियां डाल दी गईं । छावनी के बाकी हिन्दुस्थानी सिपाही भी इस दृश्य को देखने के लिये बुला लिये गये थे ।
२४२ झाँसी की रानी इसके बाद वे लोग जेलखाने भेज दिये गये । उनके साथी सिपाही क्षुब्ध हो गये, परन्तु उनको ३१ मई तक रुके रहनेकी आज्ञा थी, इसलिये वे गुस्सा पी गये । घटना सुबह की थी । सन्ध्या समय हिन्दुस्थानी सिपाही बाजार में गये । सबसे पहले कुछ वेश्याओ ने आवाजें कसी । ‘आहा ! आपकी मूछें देखिये ! कैसी भाजी हैं !! भाइयो को जेल- खाने भेजकर मुए किसी पोखरे में न डूब मरे !!!’ फिर गृहस्थ स्त्रियो ने । पुरुषो ने भी ताने कसे । सिपाही वारको को लौट आये । धैर्य ने साथ छोड दिया । स्त्रियो के शब्द कलेजे में बिध गये । रात को गुप्त मन्त्रणा हुई । निश्चय हुआ कि ३१ मई तक नही ठहरेंगे । उसी रात उन लोगो ने दिल्ली खबर भेजी कि कल परसो तक दिल्ली पहुँचते हैं, सब लोग तैयार रहे । दस मई को मेरठ में तलवार बन्दूक चल गई । अङ्गरेजो को मारमूर कर सिपाही दूसरे दिन दिल्ली पहुच गये । वहा की हिन्दुस्थानी सेना उनसे मिल गई । दिल्ली निवासियो ने उनका साथ दिया । चारो ओर ‘दीन दीन,’ ‘अल्ला हो अकबर’ और ‘हर हर महादेव’ की पुकारें एक दूसरे में होकर गूंज गई । दिल्ली की अंग्रेजी फौज मुहासिरे में पड गई । मेरठ और दिल्ली की सम्मिलित हिन्दुस्थानी फौज ने दिल्ली के लाल किले पर अधिकार कर लिया । वादशाह बहादुरशाह को भारत का सम्राट घोषित किया और २१ तोपो की सलामी दी । वादशाह ने क्रांति का नेतृत्व स्वीकार किया और उसने सबसे पहला जो काम किया, वह था गो-वध का क़तई बन्द कर देना । मई के महीने में लगभग सारे उत्तर हिन्द में क्रांति की आग भड़क उठी—किसी दिन कही, और किसी दिन कही ।
लक्ष्मीबाई २५३ कानपूर में चौथी जून की रात को यकायक आधी रात के समय तीन फायर हुये । हिन्दुस्थानी सेना ने कानपूर में क्रांति का आरम्भ कर दिया । सवेरे खजाना और शस्त्रागार क्रांतकारियो के हाथ में आ गये और नाना को राजा घोषित कर दिया गया ।
२४४ झाँसी की रानी [ ४६ [ स्कीन, गार्डन डनलप इत्यादि को झाँसी में मई की खबरे मिल गई और रानी को उनसे पहले ही ! रानी ने एक विशेष समय तक के लिये, लगभग सब आने-जाने वालो का महल आना बन्द कर दिया । जो थोडे से लोग आते-जाते थे, उनमें एक मोतीबाई थी । उसी के द्वारा रानी सब महत्वपूर्ण समाचार लेती और देती थी । मोतीवाई, खुदाबख्श और रघुनाथसिंह के सम्पर्क में थी । वह इन लोगो को सब बाते भुगता देती थी—स्वाभाविक था । ये दोनो दूसरे लोगो के सम्पर्क में थे । इस प्रकार काम जारी था । मोतीबाई ने खुदाबख्श को महल में आगन्तुको वाले निषेध का वास्तविक कारण बतलाया । खुदाबख्श ने पीरअली को सुनाया और पीरअली ने नवाव अलीबहादुर को । ३१ मई के दिन और समय वाली बात भी उन अङ्ग्रेज अफसरों को मालूम हो गई । परन्तु मेरठ और दिल्ली इत्यादि स्थानों में इसके काफी पहले ही काण्ड हो चुके थे इसलिये उन लोगो ने ३१ मई सम्बन्धी सावधानी पर ध्यान नही दिया । स्कीन ने जो चिट्ठिया मई के महीने में लैफ्टिनेंट गवर्नर के पास आगरे भेजी उनमें साफ लिखा कि झासी में विद्रोह का कोई भी चिन्ह नही है और सिपाहियो का पूरा विश्वास किया जा सकता है । पहली जून की चिट्ठी में उसने सबमे पहले कुछ झंझट की सूचना दी । 'रात को मुझे खबर मिली कि कुछ ठाकुर लोग कोच पर धावा करने वाले हैं । मैंने तुरन्त डनलप को सूचित किया । सबेरे ही कुछ फौज गाव की रक्षा के लिये भेज दी । फौज के पहुंचते ही ठाकुरो का विचार बदल गया । इधर-उधर भले ही विद्रोह फैला हो, परन्तु यहा के लोग हमसे कभी नही बिगडेंगे ।' असल में रानी की दृढ सावधानी के कारण, झाँसी में असमय विस्फोट नही हो पाया । महल में आगन्तुको के निषेध की बात सुनकर, इन लोगो को और भी विश्वास हो गया कि रानी को आन्दोलन से
लक्ष्मीबाई २५५ सरोकार नही है कोच पर इकतीस मई को 'कुछ ठाकुरो' का पहुच जाना, जिसका समाचार स्कीन को पहली जून की रात को मिला, काफी अर्थ रखता था। परन्तु जान पडता है कि उन ठाकुरो को यह नही मालूम था कि ३१ मार्च के आगे के लिये कार्यक्रम स्थगित हो गया है। और फिर दूसरे ही दिन कुछ हिन्दुस्थानी फौज का डनलप के साथ कोच पहुच जाना ठाकुरो के हतोत्साहक होने का कारण हो गया। चौथी जून को कानपुर में और उसी दिन झासी में क्रान्ति के लक्षण प्रकट हुये। गुरबख्शसिंह नाम का हवलदार कुछ सैनिको को लेकर कम्पनी निर्मित छोटे से किले में, जो पुराने किले से एक मील शहर बाहर है, और जिसे अङ्गरेज लोग उसकी बनावट के कारण 'स्टार फोर्ट' (तारा-गढ) कहते थे, घुस पडा और लडाई का सब सामान और रुपया-पैसा उठवाकर ले आया। डनलप बची-बचाई सेना लेकर मुकाबिले के लिये आया। स्टार फोर्ट में कोई भी सामान न पाकर वह लोट गया। कमिश्नर को सूचना मिली। उसकी सलाह पर छावनी के सब अङ्गरेज अपने बाल-बच्चे लेकर किले में जाने को तैयार हुये। डनलप ने नौगाव छावनी, सहायता पाने के लिये, पत्र लिखा। अब इन लोगो को रानी की, रानी के शौर्य की, उनकी योग्यता की और उनकी तेजस्विता की याद आई। गार्डन कई अङ्गरेजो को लेकर रानी के महल पर पहुचा। गार्डन ने कहलवाया, 'अभी हमको भरोसा है कि फौज में जो थोड़ी सी गडवड हुई है उसको दवा लेंगे, परन्तु यदि कोई बडी विपद आवे तो आप हमारी सहायता करियेगा। रानी ने उत्तर दिलवाया, 'इस समय हमारे पास न तो काफी शस्त्र हैं और न लडने वाले आदमी। देश में उपद्रव फैल रहा है। यदि अनुमति मिल जाय तो मे अपनी और जनता की रक्षा के लिये एक अच्छी सेना भर्ती करलूँ।' डनलप सहमत होकर चला आया।