भारतकोश
झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

पृष्ठ 262, कुल 526 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 262

लक्ष्मीबाई २५१ कमल फूलो का राजा । सरस्वती की महानता, लक्ष्मी की विशालता उसके पराग और केशर में कही अदृष्ट रूप से निहित है । वह विष्णु की नाभि से निकला और अनन्त समय के उपरान्त वही वापिस जायगा । वह हिन्दुस्थान की प्रकृति का, सस्कृति का, मृदुल, मजुल. मांगलिक और पावन प्रतीक है । उसका रग हलका लाल है । वह बिलकुल रक्त नही है । हिन्दुस्थान में होने वाली क्रान्ति खूनी जरूर थी, परन्तु उस खूनी क्रांति के गर्भ में मंजुलता और पावनता गढी हुई थी । इसीलिये सन् ५७ की क्रांति का यह प्रतिबिम्ब चुना गया । क्रांति करेंगे—मानवीयता की रक्षा के लिये, क्रांति होगी—मानवीयता लिये हुये ! कमल के साथ रोटी भी चलती थी । एक गाव से दूसरे गाव एक रोटी भेजी जाती थी । दूसरे गाव में फिर ताजी रोटी बनी और तीसरे गाव भेज दी गई । हिन्दुस्थान की वह क्रांति हिन्दुस्तानियो की रोटी की रक्षा के लिये हुई थी । रोटी उस रक्षा के प्रयत्न का प्रतीक थी । जिसने सोचा उसने कल्पना का कमाल कर दिया । यह उपज हिन्दुओं और मुसलमानो, दोनो की थी । कमल और रोटी का दौरा समाप्त नही हुआ था कि छ मई को मेरठ में विस्फोट हो गया । मेरठ में बडी छावनी थी । कई हिन्दुस्थानी और अङ्गरेजी पलटनें थी । एक हिन्दुस्थानी पलटन के नब्बे सिपाहियो को कारतूस दिये गये । सिपा- हियों को विश्वास था कि कारतूस अस्पृश्य चर्बी वाले हैं । अङ्गरेजो ने उन्हे आश्वासन दिया, कि नही हैं। पचासी सिपाहियो ने कारतूसो को छूने से इनकार कर दिया । उनका कोर्टमार्शल हुआ । आज्ञा न मानने के अपराध में उनको दस दस वरस के कठोर कारावास का दंड मिला । नौ मई के दिन इन सिपाहियों को गोरी फौज और तोपखाने के सामने लाकर खडा किया गया । वरदियाँ उतरवा ली गईं और हथकडी वेडियां डाल दी गईं । छावनी के बाकी हिन्दुस्थानी सिपाही भी इस दृश्य को देखने के लिये बुला लिये गये थे ।