झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)
Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography
वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२४२ झाँसी की रानी इसके बाद वे लोग जेलखाने भेज दिये गये । उनके साथी सिपाही क्षुब्ध हो गये, परन्तु उनको ३१ मई तक रुके रहनेकी आज्ञा थी, इसलिये वे गुस्सा पी गये । घटना सुबह की थी । सन्ध्या समय हिन्दुस्थानी सिपाही बाजार में गये । सबसे पहले कुछ वेश्याओ ने आवाजें कसी । ‘आहा ! आपकी मूछें देखिये ! कैसी भाजी हैं !! भाइयो को जेल- खाने भेजकर मुए किसी पोखरे में न डूब मरे !!!’ फिर गृहस्थ स्त्रियो ने । पुरुषो ने भी ताने कसे । सिपाही वारको को लौट आये । धैर्य ने साथ छोड दिया । स्त्रियो के शब्द कलेजे में बिध गये । रात को गुप्त मन्त्रणा हुई । निश्चय हुआ कि ३१ मई तक नही ठहरेंगे । उसी रात उन लोगो ने दिल्ली खबर भेजी कि कल परसो तक दिल्ली पहुँचते हैं, सब लोग तैयार रहे । दस मई को मेरठ में तलवार बन्दूक चल गई । अङ्गरेजो को मारमूर कर सिपाही दूसरे दिन दिल्ली पहुच गये । वहा की हिन्दुस्थानी सेना उनसे मिल गई । दिल्ली निवासियो ने उनका साथ दिया । चारो ओर ‘दीन दीन,’ ‘अल्ला हो अकबर’ और ‘हर हर महादेव’ की पुकारें एक दूसरे में होकर गूंज गई । दिल्ली की अंग्रेजी फौज मुहासिरे में पड गई । मेरठ और दिल्ली की सम्मिलित हिन्दुस्थानी फौज ने दिल्ली के लाल किले पर अधिकार कर लिया । वादशाह बहादुरशाह को भारत का सम्राट घोषित किया और २१ तोपो की सलामी दी । वादशाह ने क्रांति का नेतृत्व स्वीकार किया और उसने सबसे पहला जो काम किया, वह था गो-वध का क़तई बन्द कर देना । मई के महीने में लगभग सारे उत्तर हिन्द में क्रांति की आग भड़क उठी—किसी दिन कही, और किसी दिन कही ।