भारतकोश
झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

पृष्ठ 261, कुल 526 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 261

२५० झाँसी की रानी [ ४८ ] फरवरी में एक दुर्घटना हो गई। वारकपूर की १६ नम्बर पलटन को कारतूस प्रयोग करने के लिये दिये गये । सिपाहियो ने प्रयोग करने से दृढ़तापूर्वक इनकार कर दिया । बङ्गाल में उस समय कोई गोरी पलटन न थी । इसलिये जनरल ने तुरन्त वरमा से एक गोरी पलटन मंगवाकर १६ नम्बर पलटन से हथियार रखवा लेने और सिपाहियो को वरखास्त कर देने का निश्चय कर लिया । सिपाहियो को मालूम हो गया । उनमें से कुछ ने चुपचाप हथियार रख देने की अपेक्षा तुरन्त क्रांति कर डालने , का संकल्प किया । उनके हिन्दुस्थानी अफ़सरो ने ३१ मई तक सब्र करने की सलाह दी । परन्तु उस पलटन का एक सिपाही मङ्गल पांडे आपे से बाहर हो गया । उसने कुछ अफ़सर मार डाले । उसको फासी देदी गई । इस घटना की सूचना बहुत शीघ्र उत्तर-भारत मे फैल गई । नाना साहव और अजीमुल्ला मार्च के महीने में तीर्थ यात्रा के लिये निकल पड़े । दिल्ली में गुप्त मन्त्रणाये हुई । फिर अम्बाला गये । इसके उपरान्त मध्य अप्रैल में लखनऊ पहुँचे । वहा नाना साहब का समारोह के साथ जलूस निकला । नाना अङ्गरेजों से प्रत्येक स्थान पर मिलता था, जिसमें वे लोग निश्चिन्त बने रहे । लखनऊ के बाद कालपी और झाँसी आये । योजना का कार्य-क्रम निश्चित करके चले गये । उत्तर हिन्द की लगभग समस्त छावनियो में होते हुये नाना और अजीमुल्ला बिठूर आ गये । स्थान-स्थान और प्रदेश प्रदेश में प्रभाव वाले व्यक्ति प्रचार के कार्य में जुट गये । अभी तक अङ्गरेजो को क्रांति के सामूहिक रूप का बिलकुल पता न था । गरमी आ गई । सरोवरों में कमल खिल उठे । फसल भी कट कर घरो में आने लगी । स्वाधीनता-युद्ध के दो चिह्न प्रकट हुये । एक कमल, दूसरा रोटी । असंख्य कमल के फूल भारतवर्ष भर की छावनियो में फैल गये ।