झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)
Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography
वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२५० झाँसी की रानी [ ४८ ] फरवरी में एक दुर्घटना हो गई। वारकपूर की १६ नम्बर पलटन को कारतूस प्रयोग करने के लिये दिये गये । सिपाहियो ने प्रयोग करने से दृढ़तापूर्वक इनकार कर दिया । बङ्गाल में उस समय कोई गोरी पलटन न थी । इसलिये जनरल ने तुरन्त वरमा से एक गोरी पलटन मंगवाकर १६ नम्बर पलटन से हथियार रखवा लेने और सिपाहियो को वरखास्त कर देने का निश्चय कर लिया । सिपाहियो को मालूम हो गया । उनमें से कुछ ने चुपचाप हथियार रख देने की अपेक्षा तुरन्त क्रांति कर डालने , का संकल्प किया । उनके हिन्दुस्थानी अफ़सरो ने ३१ मई तक सब्र करने की सलाह दी । परन्तु उस पलटन का एक सिपाही मङ्गल पांडे आपे से बाहर हो गया । उसने कुछ अफ़सर मार डाले । उसको फासी देदी गई । इस घटना की सूचना बहुत शीघ्र उत्तर-भारत मे फैल गई । नाना साहव और अजीमुल्ला मार्च के महीने में तीर्थ यात्रा के लिये निकल पड़े । दिल्ली में गुप्त मन्त्रणाये हुई । फिर अम्बाला गये । इसके उपरान्त मध्य अप्रैल में लखनऊ पहुँचे । वहा नाना साहब का समारोह के साथ जलूस निकला । नाना अङ्गरेजों से प्रत्येक स्थान पर मिलता था, जिसमें वे लोग निश्चिन्त बने रहे । लखनऊ के बाद कालपी और झाँसी आये । योजना का कार्य-क्रम निश्चित करके चले गये । उत्तर हिन्द की लगभग समस्त छावनियो में होते हुये नाना और अजीमुल्ला बिठूर आ गये । स्थान-स्थान और प्रदेश प्रदेश में प्रभाव वाले व्यक्ति प्रचार के कार्य में जुट गये । अभी तक अङ्गरेजो को क्रांति के सामूहिक रूप का बिलकुल पता न था । गरमी आ गई । सरोवरों में कमल खिल उठे । फसल भी कट कर घरो में आने लगी । स्वाधीनता-युद्ध के दो चिह्न प्रकट हुये । एक कमल, दूसरा रोटी । असंख्य कमल के फूल भारतवर्ष भर की छावनियो में फैल गये ।