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झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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२४४ झाँसी की रानी [ ४६ [ स्कीन, गार्डन डनलप इत्यादि को झाँसी में मई की खबरे मिल गई और रानी को उनसे पहले ही ! रानी ने एक विशेष समय तक के लिये, लगभग सब आने-जाने वालो का महल आना बन्द कर दिया । जो थोडे से लोग आते-जाते थे, उनमें एक मोतीबाई थी । उसी के द्वारा रानी सब महत्वपूर्ण समाचार लेती और देती थी । मोतीवाई, खुदाबख्श और रघुनाथसिंह के सम्पर्क में थी । वह इन लोगो को सब बाते भुगता देती थी—स्वाभाविक था । ये दोनो दूसरे लोगो के सम्पर्क में थे । इस प्रकार काम जारी था । मोतीबाई ने खुदाबख्श को महल में आगन्तुको वाले निषेध का वास्तविक कारण बतलाया । खुदाबख्श ने पीरअली को सुनाया और पीरअली ने नवाव अलीबहादुर को । ३१ मई के दिन और समय वाली बात भी उन अङ्ग्रेज अफसरों को मालूम हो गई । परन्तु मेरठ और दिल्ली इत्यादि स्थानों में इसके काफी पहले ही काण्ड हो चुके थे इसलिये उन लोगो ने ३१ मई सम्बन्धी सावधानी पर ध्यान नही दिया । स्कीन ने जो चिट्ठिया मई के महीने में लैफ्टिनेंट गवर्नर के पास आगरे भेजी उनमें साफ लिखा कि झासी में विद्रोह का कोई भी चिन्ह नही है और सिपाहियो का पूरा विश्वास किया जा सकता है । पहली जून की चिट्ठी में उसने सबमे पहले कुछ झंझट की सूचना दी । 'रात को मुझे खबर मिली कि कुछ ठाकुर लोग कोच पर धावा करने वाले हैं । मैंने तुरन्त डनलप को सूचित किया । सबेरे ही कुछ फौज गाव की रक्षा के लिये भेज दी । फौज के पहुंचते ही ठाकुरो का विचार बदल गया । इधर-उधर भले ही विद्रोह फैला हो, परन्तु यहा के लोग हमसे कभी नही बिगडेंगे ।' असल में रानी की दृढ सावधानी के कारण, झाँसी में असमय विस्फोट नही हो पाया । महल में आगन्तुको के निषेध की बात सुनकर, इन लोगो को और भी विश्वास हो गया कि रानी को आन्दोलन से