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झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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लक्ष्मीबाई २५५ सरोकार नही है कोच पर इकतीस मई को 'कुछ ठाकुरो' का पहुच जाना, जिसका समाचार स्कीन को पहली जून की रात को मिला, काफी अर्थ रखता था। परन्तु जान पडता है कि उन ठाकुरो को यह नही मालूम था कि ३१ मार्च के आगे के लिये कार्यक्रम स्थगित हो गया है। और फिर दूसरे ही दिन कुछ हिन्दुस्थानी फौज का डनलप के साथ कोच पहुच जाना ठाकुरो के हतोत्साहक होने का कारण हो गया। चौथी जून को कानपुर में और उसी दिन झासी में क्रान्ति के लक्षण प्रकट हुये। गुरबख्शसिंह नाम का हवलदार कुछ सैनिको को लेकर कम्पनी निर्मित छोटे से किले में, जो पुराने किले से एक मील शहर बाहर है, और जिसे अङ्गरेज लोग उसकी बनावट के कारण 'स्टार फोर्ट' (तारा-गढ) कहते थे, घुस पडा और लडाई का सब सामान और रुपया-पैसा उठवाकर ले आया। डनलप बची-बचाई सेना लेकर मुकाबिले के लिये आया। स्टार फोर्ट में कोई भी सामान न पाकर वह लोट गया। कमिश्नर को सूचना मिली। उसकी सलाह पर छावनी के सब अङ्गरेज अपने बाल-बच्चे लेकर किले में जाने को तैयार हुये। डनलप ने नौगाव छावनी, सहायता पाने के लिये, पत्र लिखा। अब इन लोगो को रानी की, रानी के शौर्य की, उनकी योग्यता की और उनकी तेजस्विता की याद आई। गार्डन कई अङ्गरेजो को लेकर रानी के महल पर पहुचा। गार्डन ने कहलवाया, 'अभी हमको भरोसा है कि फौज में जो थोड़ी सी गडवड हुई है उसको दवा लेंगे, परन्तु यदि कोई बडी विपद आवे तो आप हमारी सहायता करियेगा। रानी ने उत्तर दिलवाया, 'इस समय हमारे पास न तो काफी शस्त्र हैं और न लडने वाले आदमी। देश में उपद्रव फैल रहा है। यदि अनुमति मिल जाय तो मे अपनी और जनता की रक्षा के लिये एक अच्छी सेना भर्ती करलूँ।' डनलप सहमत होकर चला आया।