भारतकोश
झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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पृष्ठ 267

२५६ झाँसी की रानी दूसरे दिन छावनी में स्कीन, गार्डन और डनलप की बैठक हुई। उन लोगो को अब भी विश्वास था कि हिन्दुस्थानी का व्यक्तिगत रूप से अपमान करना किसी भी नुकसान का कारण नही बनता । वे समझते थे कि सारी फौज में कुछ व्यक्ति नाराज हो सकते हैं, सब नही । इसी भरोसे डनलप एक और अङ्गरेज को साथ लेकर पलटन में पहुचा । सिपाहियो ने, जिनमें रिसालदार कालेखां सबसे आगे था, तुरन्त गोली से मार दिया । अङ्गरेजो में भगदड मच गई । गार्डन अकेला रानी के पास दौड़ा गया । मुन्दर द्वारा बातचीत हुई । गार्डन —'हम लोग पुरुष हैं । हमको अपनी चिन्ता नही । हमारी स्त्रियो और बच्चो को अपने महल में आश्रय दे दीजिये ।' मुन्दर ने रानी को आगा-पीछा सुझाया, 'सरकार, इस आफत से दूर रहिये । फौज के लोग हमारे महल पर टूट पड़ेंगे । रानी ने धीमे, परन्तु दृढ स्वर में मुन्दर से कहा, 'हमारी लड़ाई अङ्गरेज पुरुषो मे है, उनके बाल-बच्चो से नही । यदि मैंने सिपाहियो का नियन्त्रण न कर पाया तो उनका नेतृत्व क्या करुँगी ? कह दो गार्डन से कि स्त्रियो और बालको को तुरन्त महल में भेज दे ।' मुन्दर ने सम्वाद दे दिया । गार्डन तुरन्त स्त्रियो और बच्चो को छावनी से निकाल कर शहर ले आया और उनको महल में दाखिल कर दिया । रानी ने उनको भोजन करवाया और ढांढस दिया । परन्तु स्कीन ने हठ किया, इसलिये वे सब महल से हटा लिये गये और किले में भेज दिये गये । इस बीच में सिपाही छावनी के तहस-नहस में उलझे थे । फारिग होकर वे किले पर धावा करने के लिये बढे । गार्डन इत्यादि ने सब