भारतकोश
झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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लक्ष्मीबाई २४७ फाटक बन्द कर लिए । लेकिन सिपाही बहुत थे । उनके पास तोपखाना था और किले में तोप न थी—युद्ध सामग्री भी थोडी, खाने के लिए करीब करीब कुछ नहीं । नवाब अलीबहादुर ने उसी समय पीरअली को भेजा और कहलवाया कि हुक्म हो तो ओर्छा और दतिया से सेना बुलवा ली जावे ।* अङ्गरेज इतने भयभीत हो गये थे या इतनी हेकडी में थे कि उन्होंने जवाब दिया, 'कोई जरूरत नही है । छोटा सा बलवा है । दबा लेंगे ।' पीरअली ने नवाब साहव को वह उत्तर भुगता दिया । खुदाबख्श मिल गया । उसको भी सुनाया । खुदाबख्श ने मोतीबाई को रानी के पास भेजा और स्वयं रघुनाथसिंह के पास चला गया । मोतीबाई ने कहा, 'सरकार अब समय आगया है ।' और खुदाबख्श की कही बात सुनाई । रानी बोली, 'नियुक्त तारीख पर आरभ न होने के कारण कार्यक्रम का रूप बदल गया है । तो भी, अपनी सेना तुरन्त तैयार करने का प्रयत्न इसी समय किया जाना चाहिये । रघुनाथसिंह को समाचार दो कि कटीली से दीवान जवाहरसिंह को बुलाले और जितनी विश्वनीय सेना इकट्ठी हो सके आठ मील पर, रकसा के निकट, जमा करे । घुडसवार अधिक हो । जब तक मेरी आज्ञा न मिले झासी की ओर न आवे ।' मोतीबाई ने दीवान रघुनाथसिंह को आज्ञा सुना दी । वह खुदाबख्श को लेकर चला गया । उस दिन सिपाही किले पर बराबर आक्रमण करते रहे । परन्तु अङ्गरेज उनको गोलियो की बौछार से पीछे हटाते रहे । दूसरे दिन भी लडाई चलती रही । दोपहर के उपरान्त अङ्गरेजो के पास खाने के लिये एक दाना भी न रहा । किले वाला महल दुवारा-तिवारा *नवाब अलीबहादुर का बयान जो उन्होने सन् १८५६ में दिया था और जिसकी नकल नर्वाव वन्ने के पास है ।