झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)
Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography
वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंलक्ष्मीबाई २४७ फाटक बन्द कर लिए । लेकिन सिपाही बहुत थे । उनके पास तोपखाना था और किले में तोप न थी—युद्ध सामग्री भी थोडी, खाने के लिए करीब करीब कुछ नहीं । नवाब अलीबहादुर ने उसी समय पीरअली को भेजा और कहलवाया कि हुक्म हो तो ओर्छा और दतिया से सेना बुलवा ली जावे ।* अङ्गरेज इतने भयभीत हो गये थे या इतनी हेकडी में थे कि उन्होंने जवाब दिया, 'कोई जरूरत नही है । छोटा सा बलवा है । दबा लेंगे ।' पीरअली ने नवाब साहव को वह उत्तर भुगता दिया । खुदाबख्श मिल गया । उसको भी सुनाया । खुदाबख्श ने मोतीबाई को रानी के पास भेजा और स्वयं रघुनाथसिंह के पास चला गया । मोतीबाई ने कहा, 'सरकार अब समय आगया है ।' और खुदाबख्श की कही बात सुनाई । रानी बोली, 'नियुक्त तारीख पर आरभ न होने के कारण कार्यक्रम का रूप बदल गया है । तो भी, अपनी सेना तुरन्त तैयार करने का प्रयत्न इसी समय किया जाना चाहिये । रघुनाथसिंह को समाचार दो कि कटीली से दीवान जवाहरसिंह को बुलाले और जितनी विश्वनीय सेना इकट्ठी हो सके आठ मील पर, रकसा के निकट, जमा करे । घुडसवार अधिक हो । जब तक मेरी आज्ञा न मिले झासी की ओर न आवे ।' मोतीबाई ने दीवान रघुनाथसिंह को आज्ञा सुना दी । वह खुदाबख्श को लेकर चला गया । उस दिन सिपाही किले पर बराबर आक्रमण करते रहे । परन्तु अङ्गरेज उनको गोलियो की बौछार से पीछे हटाते रहे । दूसरे दिन भी लडाई चलती रही । दोपहर के उपरान्त अङ्गरेजो के पास खाने के लिये एक दाना भी न रहा । किले वाला महल दुवारा-तिवारा *नवाब अलीबहादुर का बयान जो उन्होने सन् १८५६ में दिया था और जिसकी नकल नर्वाव वन्ने के पास है ।