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झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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पृष्ठ 258

लक्ष्मीबाई २४७ रानी फिर लेट गईं । 'नैन छिन्दन्ति शस्त्राणि नैन दहति पावक' सोचते हुए निद्रा लाने की चेष्टा करने लगी। इतने में पहरे वाली स्त्री-सैनिक ने द्वार के पास आकर खासा । रानी ने अनसुनी कर दी । वह फिर खासी । रानी बैठ गई । पूछा, 'क्या है ?' पहरे वाली भीतर आई । उसने कहा, 'श्रीमन्त सरकार, मोतीबाई दर्शन के लिये आई है । मैंने मना किया। नही मानी । हठ कर रही हैं। कहती हैं आधी घडी का तुरन्त समय दिया जाय । जैसी आज्ञा हो ।' रानी ने मोतीबाई को बुला लिया । पास काठ की एक चौकी पडी थी । मोतीबाई से उसी पर बैठने को कहा । वह नही बैठी । बोली, 'सरकार इस चिट्ठी को पढले ।' मोतीबाई दीपक उठा लाई चिट्ठी पर किसी के हस्ताक्षर नही थे । उसमें लिखा था:— 'अब और नही सहा जाता । कब तक कलेजे में छुरी चुभाये रहे । उठो और धर्म के लिये कट मरो । थोडे से विदेशियो ने इस विशाल देश को घेर रक्खा है । निकाल दो । देश को स्वतन्त्र करो । धर्म की रक्षा करो ।' रानी—'यह चिट्ठी कहा मिली ?' मोतीबाई—'इस प्रकार की कई चिट्ठियां छावनी में आई हैं। मुझको भरोसे के लोगो ने आज दिन में बतलाया था । इस चिट्ठी को सरदार तात्या साहब ने दिया है ।' रानी—'तात्या टोपे ! कहा हैं ? झासी कब आये ?' मोतीबाई—'सन्ध्या के समय आये और प्रात काल के पहले चले जायेंगे । वह इसी समय दर्शन करना चाहते हैं । बाहर खडे हैं ।' रानी—'बाहरी कमरे में बिठलाओ । में आती हू ।'