भारतकोश
झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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पृष्ठ 257

२४६ झाँसी की रानी कर छोड गई हो । नीचे सघन अन्धकार । सब दिशाओ में गुलाई सी वाघे हुये । झींगुर झकार रहे थे । रानी को नीद नही आ रही थी । कठिन व्यायाम से तप्त देह को ठड भली लग रही थी । खिडकी खुली हुई थी । उसमें से कई बडे बडे तारे दिखलाई पड़ रहे थे । झींगुर की झनकार के ऊपर दूर से आनेवाला किसानो और चरवाहो के फाग-गीत का स्वर सुनाई पड जाता था । रानी ने सोचा, 'क्या ये लोग ईसाई बना लिये जावेगे ? ईसाई होने पर फिर क्या अपनी फागें गा सकेगे ? इनके बच्चे किल्ली-डडा और कबड्डी छोडकर फिर क्या खेलेगे ? होली, दिवाली, दशहरा ईद, सब यहा से - चलदेंगे ? स्त्रियो का क्या होगा ? ऐसी सुन्दर वेश भूषा को छोड कर ये सब क्या किरानी पोशाक करेंगी ? ईसाई आवागमन नही मानते, फिर मुक्ति का क्या अर्थ ? और गीता, रामायण इत्यादि का क्या होगा ?' रानी बिस्तरो मे बैठ गई ं। निविड अन्धकार में भी महल के सामने वाला ऊँचा पुस्तक-भवन, अपनी थोडी सी रूप-रेखा प्रकट कर रहा था । 'क्या वेद-शास्त्र, गीता, पुराण, दर्शन, काव्य ये सब व्यर्थ हो जायँगे ? जला दिये जायँगे या फेक दिये जायँगे ?' रानी ने होठ से होठ दबाया । नथनो से भभक निकली । 'कदापि नही । कभी नही । मै लडूगी । उन गरीबो के गीतो की रक्षा के लिये । इन पुस्तको के लिये और जो कुछ इनके भीतर लिखा है उसके लिये । ऋषियो का रक्त ऐसा हीन और क्षीण नही हो गया है कि उनकी सन्तान तपस्या न कर सके । कीडो-मकोडो की तरह यो ही विलीन हो जाय ।' 'नही कृष्ण अमर है । गीता अक्षय है । हम लोग अमिट हैं । भगवान की दया से, शंकर के प्रताप से मै बतलाऊँगी कि अभी भारत में कितनी लो शेष है । और यदि मै इस प्रयत्न में मर गई तो क्या होगा । कोई दूसरा तपस्वी मुझसे अच्छा खडा हो जावेगा और इस भूमि का उद्धार करेगा । तपस्या का क्रम कभी खण्डित नही होगा ।'