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झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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लक्ष्मीबाई २४५

सन् १८५७ का जनवरी मास आ गया। दमदम की छावनी में एक घटना हो पड़ी। एक मेहतर ने ब्राह्मण सिपाही से पानी पीने के लिये लोटा मांगा। ब्राह्मण सिपाही मेहतर को लोटा कैसे दे देता ! वह मेहतर हो या न हो प्रचारक अवश्य था। वह भागा या हटा नही। दृढ़ता पूर्वक डटा रहा। बोला, 'ओहो, जातपात का यह घमण्ड ! आ रहे है कारतूस जिनको दात से खोलना पडेगा। उनमें सुअर और गाय की चर्बी लगी है। देखें तुम्हारी जात उन कारतूसो के प्रयोग के बाद रहती है या जाती है।' कारतूसो की सनसनी चल तो बहुत दिनो से रही थी और अकेले दमदम में नहीं किन्तु लगभग सारी छावनियो के हिन्दुस्थानी सिपाहियो में। दमदम में कारतूसो के बनाने का कारखाना था और उन दिनो बहुत संख्या में कारतूस बनाये भी जा रहे थे। इसलिये ब्राह्मण सिपाही के मन में यह भर्त्सना खप गई। वह अपने बेडे के अन्य सिपाहियो से कहता फिरा। क्षोभ फैलता गया और बढता गया। सिपाहियो की बात उनके अङ्गरेज अफ़सरो तक पहुँची। उन्होंने इसको महज गप बतलाया। सिपाहियो ने कारखाने के हिन्दुस्थानी मजदूरो से तलाश किया। उन्होने बात को सच बतलाया। दमदम के इन सिपाहियो ने हज़ारो चिट्ठिया हिन्दुस्थान भरकी छावनियो में भिजवाई। सिपाही कुछ कर उठने के लिये बेचैन हो उठे। झाँसी की छावनी में भी चिट्ठी आई। आश्चर्य होता है कि थोडे दिनो में ये चिट्ठिया गुप्त रूप मे कैसे सर्वत्र फैल गई। जूही इत्यादि अब छावनी में नहीं आ-जा पाती थी, पर उनके पता देने वाले लोग छावनी के सम्पर्क में थे। रानी को इस घटना का समाचार मिल गया। उनको चिन्ता हुई कही ऐसा न हो कि ये लोग कुसमय कुछ कर बैठें। वसन्त पञ्चमी हो चुकी थी। फरवरी का महीना था। चाँदनी डूब चुकी थी। रात बिलकुल अन्धेरी। हवा ठंडी मन्द मन्द। तारे दमक रहे थे। कुछ बड़े बड़े, असख्य छोटे छोटे। जैसे चांदनी अपनी चादर छितरा