भारतकोश
झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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पृष्ठ 255

२४४ झाँसी की रानी [ ४७ ] सन् १८५६ में ईस्ट इण्डिया कम्पनी के कर्णधार, भारतवर्ष भर को ओर से लेकर छोर तक, ईसाई बनाने के स्वप्न देखने लगे थे । अस्पृश्य चर्बी वाले कारतूसों की वास्तविकता को, स्वयं कई ज़िम्मेदार अङ्गरेज़ लेखक स्वीकार करते हैं । यह ठीक है कि उनके बन्द करने का प्रयत्न किया गया, परन्तु वह था शिथिल । कम्पनी के बोर्ड के चेयरमैन तो उस स्वर्गा-घडी की प्रतीक्षा में आँखें अटकाये हुये थे, जब सारा भारतवर्ष– हिन्दू और मुसलमान–अपने धर्म को छोड़कर कम्पनी के धर्म को कबूल करके उनकी शासन सत्ता को प्रलय पर्यन्त, अपने कन्धों पर धारण किये रहे । परन्तु इंगलेड के कुछ लोगो को भारत में आने वाली विपत्ति के बादल का एक छोटा सा टुकडा दिखलाई पडने लगा था । उनके मुनीम डलहौजी ने दूकान को भारत में इतना काफी पसारा दे दिया था, कि अब उनकी रोकड बाकी खीचने और बहीखाता सँभालने के लिये भी, उनको कुछ समय चाहिये था । इसलिये डलहौज़ी को बुलाकर कैनिंग को भेजा । कैनिंग ने विपत्ति के बादल के उस टुकडे को स्पष्ट देख लिया । परन्तु उसको आत्म विश्वास था इसलिये वह भारत में आया, और आने पर ईसाई मत प्रचार के लिये एक काफी रकम हिन्दुस्थान के खज़ाने से निकाल कर रख दी । पञ्जाब को कम्पनी–भक्त समझा जाता था । ईसाईयत के प्रचार वेग से वह भी न बचा । इधर नाना साहब, तात्या, बहादुरशाह और उनकी बेगम ज़ीनत– महल, अवध की बेगम हज़रतमहल और रानी लक्ष्मीबाई का व्यापक और सूक्ष्म प्रचार जारी था । स्वाधीनता के युद्ध के लिये क्षेत्र तैयार हो रहा था, थोडी सी ही कसर थी जब नियत दिन और समय पर एक साथ सम्पूर्ण हिन्दुस्थान में विस्फोट होना था । वह दिन और समय अभी नियुक्त नही हुआ था ।