झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)
Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography
वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१४८ झाँसी की रानी रानी ने सफेद साडी पर एक मोटा सफेद दुशाला ओढा और वह बाहरी कमरे में तात्या के पास पहुंची। मोतीबाई को रानी ने उसी कमरे में बिठा लिया। रानी ने पूछा, 'इस चिट्ठी का क्या प्रयोजन है ? मुझको तो असमय जान पडता है।' 'हा बाईसाहब,' तात्यो ने उत्तर दिया, इसीलिये ले आया हूँ। मोतीबाई ने बतलाया कि इस प्रकार की चिट्ठिया यहा की छावनी में भी आई हैं। सिपाहियो में बेहद जोश फैला हुआ है, परन्तु न तो अभी कोई व्यवस्था हो पाई है और न काफी सगठन हुआ है। समय के पहले यदि विस्फोट हो गया तो अनेक सिपाही व्यर्थ मारे जावेगे। असफलता और निराशा देश को दबा लेगी और न जाने कितने समय के लिये यह देश विपदग्रस्त हो जावेगा।' रानी—'इसको रोकना चाहिये और सगठन शीघ्र कर लिया जाना चाहिये।' तात्या—रुपये पैसे की कोई असुविधा नही रही। काफी समय तक लडाई चलाते रहने के लिये धन इकट्ठा हो गया है। बारूद का और शस्त्रो का बहुत अच्छा प्रबन्ध है। इसलिये जल्दी से जल्दी की जो हो सकती थी नियुक्त कर ली गई है। दिल्ली, लखनऊ इत्यादि वाले सहमत हैं। आपकी सहमति लेकर सबेरे के पहले रवाना हो जाऊगा।' 'कौनसी तारीख ?' रानी ने प्रसन्न होकर पूछा। 'इकतीस मई रविवार, ११ बजे दिन', तात्या ने बतलाया। रानी—'तीन-चार महीने हैं। मुझको यह तारीख पसन्द है। देश भर में सब जगह एक साथ ?' तात्या—'सब जगह एक साथ। तब तक हम लोग मनाते हैं कि सिपाही और जनता, आत्म-नियन्त्रण से काम लें'