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झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

पृष्ठ 251, कुल 526 में से

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२४० झाँसी की रानी नर्तकी चली गई, परन्तु उसका सौन्दर्य डनलप के भीतर एक कोने में हलकी छाप, एक टीस, छोड़ गया। उस टीसने सिपाहियो के प्रति क्षोभ का रूप पकडा। डनलप बोला, 'तुम लोग इन टके वाली औरतो के मोह मे अपना पैसा और समय नष्ट करते हो। इन औरतो का झूठा जादू ही तुमको ईसाई होने से रोक रहा है। इन शैतानो को छोडकर सच्चे धर्म पर ईमान लाओ, तो मुक्ति भी मिलेगी और पैसा अलग।' पैसा और मुक्ति का घनिष्ठ सम्बन्ध सिपाही लोग बहुत दिनो से सुन रहे थे। पहले तो इस सम्बन्ध की बात पर उनको हँसी आया करती थी, अब वे खीजने लगे, जलने लगे। परन्तु सिपाहियो ने चुपचाप सुन लिया। डनलप ने सोचा उसकी बात घर कर रही है। डनलप कहता गया, 'तुम्हारे देवी-देवता सब बदसूरत और व्यर्थ हैं। उन पर विश्वास करने के कारण तुम मूर्ख बने हुये हो। इसलिये तुम्हारी तरक्की नही हो पाती। ईसाई होते ही तुमको एक ईश्वर और उसके एक पुत्र पर ही विश्वास लाने की ज़रूरत है। दुनिया भर की डाकिनी, पिशाचिनो और भूत-प्रेतो से पीछा छूट जावेगा। हिन्दू-मुसलमान सब बेवकूफ हो। इन्जील पढो तो आँखे खुल जावेगी।' सिपाहियो ने इस पर भी कुछ नही कहा। डनलप बोला, 'रिसलदार, तुमको खुद ईसाई धर्म कबूल करना चाहिये, वरना तुम्हारे हक में अच्छा नही होगा। जैसे ही कोई ईसाई अफसर मिला तुम, बरखास्त कर दिये जाओगे।' रिसालदार ने कहा, 'जो हुकुम।' डनलप समझा, 'रिसालदार ईसाई होने के लिये लगभग राजी हो गया है। पूछा, 'कब तक?' रिसालदार ने उत्तर दिया, 'कुछ महीनो की ही कसर है हजूर!' डनलप इस वाक्य के भीतरी अर्थ को नही समझा।

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