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झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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डनलप के जाते ही सारा सिपाही समज व्यङ्ग और क्षोभ में प्रमत्त हो गया। सुरीली और रूप वाली नर्तकी के अपमान का उनको रञ्ज था। अपने धर्म की अवहेलना पर उनको क्रोध था और अङ्गरेज के मुँह से रानी का नाम तक लेने पर, उनको क्षोभ था। 'उस विचारी को धक्के देकर निकालने की धमकी दी ! वडा हूश है।' 'अरे पाजी है। कहता है, धर्म-ईमान छोड दो। ये शराबी कबाबी धर्म-ईमान को क्या जाने।' 'मेरी तबियत में तो आ गया था कि पौदो पर दुलत्ती कस दूँ।' 'जरा ठहरो। समय आरहा है। फिलहाल मनाही है। सहते जाओ। थोडी सी कसर रह गई है। हमारे मुखिया लोग इलाज सोच रहे हैं।' 'खाक सोच रहे हैं। जब धर्म न रहेगा, मन्दिर मसजिद साफ हो जावेगे, तब हकीमजी इलाज करने आवेगे।' 'कारतूस फिर जारी किये गये हैं। सुनता हू, कलकत्ते के कारखाने में लाखो करोड़ो की तादाद में बनाये जा रहे है और एक अङ्गरेज या ईसाई को चार आना सेर के हिसाब से, गाय और सुअर की चर्बी इकट्ठी करके कारखाने मे देने का ठेका भी दे दिया गया है।' 'आने दो आने दो कारतूसो को। जीते जी तो उन कारतूसो को छुयेंगे नही। और यदि खोलने के लिये मजबूर किये गये, तो पहली गोली इस पाजी डनलप पर।' 'ईश्वर एक है सो तो बिलकुल ठीक है। न हिन्दू इसके खिलाफ कुछ मानते हैं और न मुसलमान। लेकिन ईश्वर के एक ही बेटा हुआ यह कुर्सीनामा इस डनलप को कहा से मालूम हुआ ?' 'जिस कारखाने से भ्रष्ट कारतूस निकले, उसी से इस तरह का मजहब निकला होगा।' 'हमारे यहाँ ईसा को पैगम्बर माना गया है, लेकिन खुदा का बेटा नही माना गया।' 'उसके बेटे तो मियाँ हम सब लोग हैं।'