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झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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लक्ष्मीबाई २३१ तात्या—'क्या नारी-प्रकृति पुरुष-प्रकृति से बहुत भिन्न होती है ?' मोतीबाई—'कह नही सकती। शायद किसी दिन आप इस विषय को समझे।' तात्या—'ऐसा नही है कि मैं नारी-प्रकृति को बिलकुल ही नही जानता हू। परन्तु सामने इतने महत्व का बड़ा काम है कि और कुछ सूझता ही नही।' मोतीबाई—'आप कृपा करके जूही से ज़रा मीठा बोलिये। एक बार उसके सिर पर शाबाशी का हाथ फेर दीजिये। वह अपने काम का कमाल कर दिखलावेगी।' तात्या—'मैने आपसे सबक लिया और गांठ बाध ली।' मोतीबाई ने हँसकर कहा, 'आपको औरतो से अभी बहुत सीखना है।' तात्या ने देखा—मोतीबाई के प्रबल सौन्दर्य में विलक्षण शोखी है और शोखी में कोई दृढ़ सत्य । हँसकर बोला, 'मानता हूँ। पर आपकी जूही को वह काम करते देखना है, जो मैंने बतलाया है।' मोतीबाई ने भी हँसकर कहा, 'मेरी नही आपकी—आप लोगो की जूही।' 'बेशक। बेशक।' बतलाइये फौज के देशी अफ़सरो पर उसका प्रभाव हो गया है ?' 'हो गया है अनेक पर।' 'इस प्रभाव को बढ़ाना है।' 'बढ़ जायगा।' 'और कोशिश यह करनी है कि अभी भड़क न उठें। जो तारीख और समय नियुक्त होगा, उसकी बाट जोहे।' 'हो सकेगा।' 'एक पल्टन के तीन अफ़सरो को खास तौर पर चुनना है।' 'मुझको जूही की बुद्धि का भरोसा है।'