झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)
Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography
वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२३० झाँसी की रानी तात्या—'विश्वास रक्खो, वह दिन कभी नही आवेगा। मुझको यह बतलाओ कि यहा के सिपाही खुद क्या भावना रखते हैं?' मोतीबाई—'मुझको पक्का भरोसा है कि एक फी सदी भी हिन्दू या मुसलमान सिपाही किसी भी लालच में आकर अपने धर्म-ईमान को नही बिगाडेगा।' तात्या—'यह तो हम सब लोग जानते हैं। मुझको यह बतलाओ कि गोरो की इस हरकत का यहा की फौज पर असर क्या पडा है?' मोतीबाई—'उनमें से कुछ तुरन्त मारना-मरना चाहते थे, परन्तु धीरज धरकर रुक गये।' तात्या—'अभी मारने-मरने का समय नही आया है। मै चाहता हूँ प्रत्येक पल्टन में से तीन अफसर, जो बिलकुल विश्वास के योग्य हो चुन लिये जावे। उनको कब और क्या करना होगा, वह दो-एक महीने पीछे बतलाया जावेगा। उनमे कह दिया जाय कि वे ईसाई तो होगे ही नही पर इस समय अपना सब्र न खो बैठें। क्रोध भरे रहे, परन्तु उसको निकलने किसी प्रकार न दे, नही तो सब किया-कराया मिट्टी में मिल जावेगा। अबकी बार आऊँगा तब जो कुछ करना है, उसकी तारीख और समय बतला जाऊँगा। आप या जूही इस काम को कर सकेंगी?' मोतीबाई—'मेरे लिये मशहूर है कि मैं बाहर बहुत कम निकलती हूँ। महलो में आती-जाती हूँ। फौज में नृत्य-गान के लिये, मेरा आना जाना तुरन्त सन्देह उत्पन्न करेगा और बाईसाहब भी यह पसन्द न करेंगी। जूही को इसी कारण महल में नही बुलाया जाता। वह बहुत अच्छा नाचती-गाती है, ईश्वर ने उसको रूप भी दिया है और ज़बरदस्त सयम। वह आपको चाहती है।' तात्या—'मुझको? मोतीबाई, यह ज़माना बुद्धि और तलवार को माजने का है, न कि मन को रस में डुबोने का।' मोतीबाई—'तब आप उसको अपने रस में डूबा रहने दीजिये। तभी तो मैंने कहा कि आप नारी-प्रकृति को नही जानते।'