झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)
Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography
वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा
पृष्ठ 240, कुल 526 में से
संदर्भ में पढ़ेंलक्ष्मीबाई २२६ [ ४५ ] उसी समय मोतीबाई चादर ओढकर महल गई । रानी पूजन में थी। उनको लक्ष्मी जी का इष्ट था, इसलिये और लोगो की अपेक्षा इस पूजन को वे अधिक समय देती थी। ड्योढी के एक भाग में तात्या और नाना साहब बैठे हुये थे। तात्या ने मोतीबाई को पहिचान लिया और वह तुरन्त उसको एकान्त में ले जाकर बातचीत करने लगा। तात्या ने प्रश्न किया, 'यहा का हाल अभी ठीक ठीक मालूम नही हुआ। जूही थोडी देर पहले मिली थी, परन्तु वह तो कुछ ऐसी गड गई कि कुछ कह ही नही सकी। केवल यह आश्वासन दे गई कि फिर बतलाऊँगी।' मोतीबाई ने निस्सकोच भाव के साथ उत्तर दिया, 'आप स्त्रियो की प्रकृति को नही जानते।' तात्या ने कहा, 'सुना है कि उनकी प्रकृति टेढी होती है। अभी तक इस विषय के अध्ययन करने का समय नही मिला। जब अवसर आवेगा तब समझने का प्रयत्न करूँगा।' मोतीबाई मुस्कराकर बोली, 'आप शायद ही कभी समझ सकें। परन्तु जरूरत न पडे तो अच्छा ही है। अब काम की बात सुनिये।' तात्या—'मै ध्यान लगाये हू ।' मोतीबाई — फौज के सिपाहियो को ज़बरदस्ती ईसाई बनाये जाने की कोशिश की जा रही है। रामचन्द्रजी और मुहम्मद साहब, दोनो को खुलेग्राम गालियाँ दी जाती हैं। ईसाई बनने के लिये तरह-तरह के प्रलोभन दिये जाते हैं एक अङ्गरेज अफसर तो यहा तक कहता था, कुछ दिनो में सारा हिन्दुस्थान ईसाई हो जावेगा। न एक मन्दिर बचेगा और न एक मस्जिद रहेगी।' तात्या—'इस तरह के समाचार सब तरफ से आ रहे हैं।' मोतीबाई—'क्या सचमुच ऐसा दिन आने वाला है ?'