झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)
Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography
वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२३२ झांसी की रानी 'मैं उमसे आज ही बात करूंगा । आप तो रानी साहब से बात करने के लिये ठहरेंगी ?' फिर कभी मिल लूंगी । आप मेरी बात उनसे कह दीजियेगा । मैं जाती हूं ।' मोतीबाई समझ गई थी कि तात्या इत्यादि बिलकुल एकान्त में, रानी से बातचीत करना चाहते हैं, इसलिये वह नही ठहरी । पूजन के उपरान्त नाना साहब और तात्या की भेंट रानी से हुई । रानी लक्ष्मीबाई आज बिलकुल लक्ष्मी सी भासित होती थी ।' नाना ने कहा, 'मैने अपने एक विश्वस्त आदमी अज़ीमुल्लाखा को विलायत भेजा था । अर्जी, अपील स्वीकृत नही हुई । हो जाती तो कुछ रुपया मिल जाता । कम से कम दादा साहब के ज़माने का जो छयासठ हज़ार रुपया बाकी है, वही मिल जाता । परन्तु अङ्गरेजी सरकार तो बेईमान और अन्यायी है । उसने सब नामंजूर कर दिया ! इसका अब अधिक रञ्ज नही है । रुपये की कमी पूरी हो ही जावेगी । अज़ीमुल्ला देश विदेश घूमा है । वह इटली गया, तुर्की में रहा, रूस भी पहुंचा और ईरान होकर लौट आया । उसने तुर्की के साथ चिट्ठी पत्री की है । इटली में इस समय एक प्रबल पुरुष गेरीबाल्डी नाम का है । वह अङ्गरेज़ी जहाज़ी बेडे को अपने जहाज़ी बेडे से नष्ट कर देगा । रूस से मदद मिलेगी । सब कहते हैं, कि अङ्गरेज़ हिन्दुस्थान में खुल्लमखुल्ला और आडे ओट लेकर बहुत निन्दनीय काम कर रहे हैं । बहादुरशाह बादशाह ने ईरान के शाह से लिखा पढी की है । काबुल तो हतोत्साह है, परन्तु शायद ईरान बादशाह की कुछ सहायता करे ।' रानी — 'ऊपर ऊपर इन बातो का प्रभाव अङ्गरेजो पर अच्छा पड़ेगा, परन्तु वास्तव में कार्य बहुत दृढ़ता और प्रबलता के साथ, अपने देश ही में होना चाहिये । मुझको विश्वास है कि जनता अपने साथ है । वह बहुत बड़ा बल है । अङ्गरेजो के हाथ में सीखी सिखाई हिन्दुस्थानी फौज है । वह सम्पूर्ण रूप में अपने हाथ में आ जानी चाहिये । तोप ढालने वाले