भारतकोश
झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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लक्ष्मीबाई २५९ उस दिन घोर युद्ध हुआ । गार्डन उत्तरी फाटक के ऊपर की खिडकी में से ताक ताक कर बन्दूक का निशाना लगा रहा था और सिपाही उसके मारे हैरान हो रहे थे । उनको शहर का एक पुराना तीरन्दाज मिल गया । उस तीरन्दाज ने एक पत्थर की ओट लेकर गार्डन पर तीर छोडा । तीर गार्डन की गर्दन को फोडकर पार हो गया । गार्डन के मरते ही समस्त अङ्गरेजो में उदासी और निराशा छा गई । उधर रिसालदार कालेखा ने किले के उत्तर-पश्चिमी कोने पर, जिसे शंकर-किला कहते हैं, भयानक दाब बोली और अपनी सेना की एक टुकडी सहित किले में घुस गया । अङ्गरेजो ने देखा कि अब कोई बचत नहीं, इसलिये उन्होने सुलह की चर्चा छेडी । सिपहियो ने रक्षा का आश्वासन दिया । स्कीन ने ८ जून के सबेरे किले का सदर फाटक, जो दक्षिण की ओर है, खोला और कहा कि हमको सागर चले जाने दो । सिपाहियो ने उन लोगो को कैद कर लिया । सिपाहियो का मुखिया रिसालदार कालेखा छावनी चला गया । थोडी देर में वहा जेल-दरोगा बख्शिशअली आया । उसकी आंखे लाल थी, और मुँह झुलसा हुआ । उसने अङ्गरेजो की ओर देखा । सिपहियो से बोला, 'रिसालदार साहब रास्ते मे मुझे मिले थे । हुकुम दे गये हैं कि इन सब को झोखनबाग ले चलो ।' सिपाही अङ्गरेजो को झोखनबाग ले आये । वहा एक सिपाही घोडे पर सवार आया । बख्शिशअली ने उसके कान में कुछ कहा । सवार हिचका । बख्शिशअली बोला, 'भाइयो, यह जो स्कीन कमिश्नर खडा है, इसने मुझको जूतों की ठोलो से पीटा था, अब क्या देखते हो ?' सिपाही एक दूसरे का मुँह ताकने लगे । बख्शिशअली—'और इसने जूते की ठोल से मुझको इतना मारा था कि मैं गिर पड़ा था । मारने के पहले इसने मुझको सुअर की गाली दी थी ।'