झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)
Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography
वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३६० झाँसी की रानी स्कीन भयभीत खडा था । परन्तु इस आरोप ने उसको जगा दिया । बोला, 'मैंने गाली कभी नही दी । मारा शायद हो, मगर याद नही आता । काम में गफलत करने पर तो कभी कभी मारना भी पडता है।' वह जो सवार आया था, उसकी ओर बख्शिशअली ने भयानक दृष्टि से देखा । सवार ने कडकती हुई आवाज मे कहा, 'रिसालदार साहब ने इन सबके कतल का फरमान किया है।' बख्शिशअली ने सबसे पहले स्कीन को मारा, और फिर सब काट दिये गये । उस समय वहा सिवाय उन सिपाहियो के और कोई न था । उसी समय रिसालदार कालेखा आ गया । खून में रगी तलवारो को देखकर क्रुद्ध स्वर में बोला, 'यह क्या किया !' बख्शिशअली ने कहा, 'और क्या करते ?' रिसालदार ने अपने स्वर को सयत करके पूछा, किसके हुकुम से ? क्या रानी साहब ने हुकुम दिया था ?' बख्शिशअली के पास ही वह सवार खडा था । उसने उत्तर दिया, 'रानी साहब को कुछ नही मालूम । वे तो हम लोगो से कुछ कटी कटी सी जान पडती हैं।' 'तब किसके हुकुम से ?' रिसालदार ने और भी सयत स्वर में पूछा । बख्शिशअली ने जवाब दिया, 'आपके नाम पर मेरे हुकुम से !' 'ओफ !', रिसालदार ने धीरे से कहा, 'हमारे बडे मुखिया जब सुनेंगे क्या कहेगे ? मगर...मगर...' रिसालदार थोडी देर चुप रहा । सूर्य की किरणो में जलन बढती चली जा रही थी । रिसालदार ने मुँह पर हाथ फेरा । माथा दबाया । थोडी देर खामोश रहा । बोला, 'जो हुआ सो हुआ । आगे बिना हुकुम के कोई काम न करना । रानी साहब के महल पर चलो ।' वैसी ही तलवारे लिये सिपाही महल की ओर चल पडे ।