झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)
Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography
वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा
पृष्ठ 272, कुल 526 में से
संदर्भ में पढ़ेंलक्ष्मीबाई २६१ [ ५० ] सिपाहियो मे अनुशासन न था । घिन और गुस्सा मनको घेरे थे । अपनी विजय पर उनको पागलो जैसा हर्ष था । रानी के महल पर वे पीछे पहुँचे, उनका शोरगुल पहले पहुँच गया । पहरेदार ने फाटक बन्द कर लिये । सेना के कुछ सिपाही शहर को लूटने की बातचीत करने लगे । कवायद परेड सीखे हुये वे सिपाही अच्छे नेता की कमी के कारण महज हुल्लड और भम्भड की भूमिका भरने लगे । कोई किसी की नही सुन रहा था । हर एक आदमी अपना अपना गुबार निकालने की धुन में था । इतने में कालेखा चिल्लाया, 'खलक खुदा का, मुलक वादशाह का, राज महारानी लक्ष्मीबाई का ।' सब सिपाहियो ने यही नारा लगाया । सिपाहियो की विचारधारा इसी नारे की ओर मुड गई–उस नारे ने अनुशासन की कमी को कुछ पूरा किया । खिडकी की झरप हटी । हाथ जोडे हुये लक्ष्मीबाई दिखलाई दी । पीछे सशस्त्र सहेलिया । बिलकुल गौर-वदन । गले मे हीरो का कण्ठा । होठ एक दूसरे से सटे हुये । सिपाहियो ने फिर नारा लगाया । रानी ने नमस्कार किया । हाथ उठाकर चुप रहने का सकेत किया । भीड में सन्नाटा छा गया । रिसालदार आगे बढा । रानी ने तीव्र स्वर में पूछा, 'क्या है ? तुम रिसालदार कालेखा हो ?' स्वर में तीव्रता होते हुये भी कठ का प्राकृतिक सुरीलापन था । कालेखा ने सैनिक-प्रणाम किया । बोला, 'हुजूर का तावेदार कालेखा रिसालदार में ही हूँ ।' रानी की अनिमेष दृष्टि से कालेखा ने अपनी आख मिलाई । कालेखां की आख झरप गई । नीची हो गई । रानी ने कहा, 'इन तलवारो में रक्त कैसे लगा ?' कालेखा ने बतलाया ।