झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)
Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography
वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा
लक्ष्मीबाई २६१ [ ५० ] सिपाहियो मे अनुशासन न था । घिन और गुस्सा मनको घेरे थे । अपनी विजय पर उनको पागलो जैसा हर्ष था । रानी के महल पर वे पीछे पहुँचे, उनका शोरगुल पहले पहुँच गया । पहरेदार ने फाटक बन्द कर लिये । सेना के कुछ सिपाही शहर को लूटने की बातचीत करने लगे । कवायद परेड सीखे हुये वे सिपाही अच्छे नेता की कमी के कारण महज हुल्लड और भम्भड की भूमिका भरने लगे । कोई किसी की नही सुन रहा था । हर एक आदमी अपना अपना गुबार निकालने की धुन में था । इतने में कालेखा चिल्लाया, 'खलक खुदा का, मुलक वादशाह का, राज महारानी लक्ष्मीबाई का ।' सब सिपाहियो ने यही नारा लगाया । सिपाहियो की विचारधारा इसी नारे की ओर मुड गई–उस नारे ने अनुशासन की कमी को कुछ पूरा किया । खिडकी की झरप हटी । हाथ जोडे हुये लक्ष्मीबाई दिखलाई दी । पीछे सशस्त्र सहेलिया । बिलकुल गौर-वदन । गले मे हीरो का कण्ठा । होठ एक दूसरे से सटे हुये । सिपाहियो ने फिर नारा लगाया । रानी ने नमस्कार किया । हाथ उठाकर चुप रहने का सकेत किया । भीड में सन्नाटा छा गया । रिसालदार आगे बढा । रानी ने तीव्र स्वर में पूछा, 'क्या है ? तुम रिसालदार कालेखा हो ?' स्वर में तीव्रता होते हुये भी कठ का प्राकृतिक सुरीलापन था । कालेखा ने सैनिक-प्रणाम किया । बोला, 'हुजूर का तावेदार कालेखा रिसालदार में ही हूँ ।' रानी की अनिमेष दृष्टि से कालेखा ने अपनी आख मिलाई । कालेखां की आख झरप गई । नीची हो गई । रानी ने कहा, 'इन तलवारो में रक्त कैसे लगा ?' कालेखा ने बतलाया ।
२६२ झाँसी की रानी रानी बोली, 'इन्ही कर्मों से स्वराज्य और बादशाही स्थापित करोगे ? तुम लोगो ने घोर दुष्कर्म किया है। क्या तुम यह समझते हो कि संसार से सब नियम सयम उठ गये ?' कालेखा—'हुज़ूर .....' रानी—'और अभी तुम लोगो में से कुछ झासी नगर को लूटने की भी चर्चा कर रहे थे। तुम अपने को इतना भूल गये ! क्या तुम लोगो को यही सिखलाया गया है ?' कालेखा—'हुजूर के हुकुम के खिलाफ अगर अब कुछ हो तो हम सबको तोप से उडा दिया जाय। जो आज्ञा हो उसका हम लोग पालन करेंगे।' रानी--'तो मैं यह कहती हू कि छावनी को लौट जाओ। सोच विचार कर सन्ध्या तक आज्ञा दूँगी कि आगे तुम्हे क्या करना है।' कालेखा सिपाहियों से बातचीत करने लगा। कुछ ने कहा, 'छावनी चलो।' कुछ बोले, 'दिल्ली चलो। वहा मज़ा रहेगा।' कुछ ने सलाह दी, 'कुछ रुपया तो पहले गाँठ में कर लो।' अन्त में सिपाहियो ने निश्चय किया 'रानी साहब से रुपया लो और दिल्ली चल दो। रानी साहब रुपया न दें तो जितना शहर से वसूल करते बने वसूल कर के, झासी को रानी के हवाले करो और आगे बढो।' कालेखा ने सिपाहियो का निर्णय रानी को सुना दिया कहा। कहा, 'सरकार, सिपाही भूखे हैं।' रानी परस्थिति को समझ गईं। उन्होने दूरदर्शिता से काम लिया। बोली, 'अङ्गरेज़ो ने मेरे पास रुपया नही छोड़ा। राज्य अङ्गरेजो के अधीन रहा है। मैं कहा से रुपया लाऊँ ?' कालेखा ने कहा, 'हम लोग मजबूर हैं। आप मालिक हैं। आपसे कुछ नही कह सकते। यदि यहां से रुपया नही मिलता है तो हम लोग शहर से उगावेंगे।'
लक्ष्मीबाई २६३ रानी समझ गईं कि शहर लुटने वाला है। उन्होंने गले से हीरों का कंठा उतारा और कालेखां की अञ्जलि में डाल दिया। बोली, 'इससे तुम्हारी सारी अटके पूरी हो जायगी। मनुष्यों की तरह यहा से जाओ। कही लूटमार बिलकुल न करना, अदब कायदे के साथ दिल्ली पहुँचे। हिन्दुओं को गंगा की ओर मुसलमानों को कुरान की सौगन्ध है।' कुछ सिपाहियों ने रानी की नौकरी करनी चाही। परन्तु बहुमत दिल्ली जाने के पक्ष में था। इसलिये लगभग सब दिल्ली चले गये — केवल थोड़े से रह गये। उनमें से एक लालता तोपची था। सिपाहियों के चले जाने पर रानी ने रकसा से दीवान जवाहरसिंह इत्यादि को तुर त ससैन्य बुलवाया। सिपाही फ़ौजी सामान तोपें इत्यादि अपने साथ ले गये।
२६४ झाँसी की रानी [ ५१ ] रात में दीवान जवाहरसिंह ससैन्य आ गया । रानी ने आदेश भेजा कि नगर और किले का प्रबन्ध करो और कल दिन में मिलो । दूसरे दिन महल में बहुत लोग उपस्थित हुये । सेना और शासन से सम्बन्ध रखने वाले सरदार, कर्मचारी, जागीरदार, जनता के साहूकार मुखिया और पञ्च । रानी पर्दे के पीछे बैठी । रानी ने कहा, 'कल कठिनाई के साथ मैंने नगर को लुटने से बचा पाया । विद्रोही तो यहाँ से चले गये, परन्तु अव्यवस्था छोड़ गये हैं। डकैती और लूटमार बढ़ने का बहुत भय है । मै चाहती हूँ जनता त्रस्त न होने पावे । इसलिये मैने झासी राज्य के पुराने जागीरदार और सरदारों को कुछ सेना लेकर बुलवाया है, जिसमें अव्यवस्था न रहने पावे । आप लोगों को और जनता के मुखिया पञ्चों को सम्मति के लिये बुलाया है । बतलाइये अब क्या करना चाहिये ?' गार्डन के सरिश्तेदार ने कहा, 'मै तो यह सलाह दूँगा कि सागर के डिप्टी कमिश्नर को बलवे की सूचना दी जावे और जबलपुर के कमिश्नर को लिखा जावे कि आपने अङ्गरेजों की ओर से शासन की बागडोर हाथ में ले ली है ।' माल के सरिश्तेदार ने समर्थन किया । कोरियों का सरपञ्च पूरन बोला, 'मुसकिल से तो कम्पनी को राज हटपाओ है अब उन्हे जा खबर काये दई जाय कै हम तुमाये लानें अपनो मूँड सँजो रये, आओ, और फिर किड बिड़ करके झाँसी के प्रान खाओ ?' दोनो सरिश्तेदारों ने आँखें तरेरी । काछियों के मुखिया ने कहा, 'हमें नई चाउने काऊ और को राज झाँसी में । करै राज तो हमाई बाई साब, न करै तो हमाई बाई साब !' तेलियों के पञ्च ने मत प्रकट किया, हमें तो अपनों पुरानों राज लौटाउने, चाए पृथी इतै की उतै हो जाय ।'
लक्ष्मीबाई २६५ प्रमुख साहूकार मगन गन्धी बोला, 'वाट जोहते जोहते आंखें पथरा गईं । आज कितनी मानताओं के बाद यह दिन देखने को मिला । हम लोग तो अपना राज्य चाहते हैं ।' सरिश्तेदारो ने फिर आंखे तरेरी । चमारों के मुखिया ने कहा, 'एल्लो, उसई आंखे नटेर रये ! राज बाई साव को और फिर बाई साब की और हम सब बाई साब के ।' माल का सरिश्तेदार बोला, 'नवाब अलीबहादुर साहब को भी बुला लीजिये । वे दुनिया देखे हुये हैं । ठीक सलाह दे दें । इन बेपढो की सलाह पर अमल करना गलत होगा ।' 'हो, ते है वडो मौलबी पडित,' अहीरो के नायक ने रुष्ट होकर कहा, 'हमें परदेसियन की हकूमत नई चावने । जो उनकी पिच्छदारी करें तीको करिया मो हो जाय !' मोरोपन्त ने जन-मत का समर्थन किया । एक लक्ष्मणराव वाडे नामका, चतुर काइया भी उस सभा में था । बोला, 'सरिश्तेदार साहब अगरेजी और अगरेज़ को जानते हैं । वे वास्तव में यह चाहते हैं कि बाईसाहब दो चार रोज़ यह मुफ्त का झमेला अपने सिर लिये रहे और सागर के डिप्टी कमिश्नर को बुला कर उनको पेशकारी दिलवादे ताकि कसकर रोजगार चले ।' अब सरिश्तेदारो का कोई कुछ कहने लगा और कोई कुछ । वृद्ध नाना भोपटकर ने, जो अब भी काफी स्वस्थ था, कहा, 'हमलोग सरिश्तेदार साहब की सलाह पर भी विचार करेंगे । इस समय इतना तो अवश्य तै कर लेना चाहिये कि राज्य का सर्वांगीन शासन बाईसाहब के हाथ में रहे और सब लोग अपने को उनकी प्रजा मानकर दृढ़तापूर्वक अपने जीवन का निर्वाह करे ।' उपस्थित जनता ने हर्ष और उत्साह के साथ इस मत को स्वीकार किया ।
२६६ झांसी की रानी वे दोनो सरिश्तेदार दरबार से हटा दिये गये । रानी बोली, 'आप लोग जो भार मुझे दे रहे हैं, उसको मै अपना गौरव मानती हूँ और परमात्मा की कृपा से उसको निभाऊँगी ।' लोगो ने जय-जयकार किया । गुलाम गौसखा तोपची हाथ बाधकर खडा हो गया । उसने कहा, 'श्रीमन्त सरकार, मुझको मेरी पुरानी नौकरी मिलनी चाहिये ।' रानी उसको पहिचानती थी । बोली, 'तुम सदर तोपची नियुक्त किये जाते हो सब तोपो को संभालो । जो तोपे खराब कर दी गई हैं उनको ठीक करो ।' 'जो आज्ञा', गुलाम गौसखा ने गद्गड़ होकर कहा, --'एक विनय और है, साढे तीन साल से ऊपर हुये एलिस किले वाले महल में आया और हम लोगो के मनमें आशा बँधी कि झांसी के राज्य को लौटाने की चिट्ठी लाया होगा, तब मैने तोपो मे बारूद डाल ली थी—सलामी दागने के लिये । आज मुझको अपने मन की करने का हुक्म दिया जाय ।' रानी ने सुरीले मधुर स्वर मे कहा, 'अभी ऐसा क्या हो गया है ?' गुलाम गौस—'हो गया है सरकार । हमारे दिलो में हो गया है । दिलो के बाहर हो गया है ।' मोरोपन्त—'हो गया है ।' लक्ष्मणराव—'हो गया है ।' नाना भोपटकर—'हो गया है ।' उपस्थित जनता ने उसी को दुहराया और जय-जयकार की । रानी ने अनुमति दे दी । गुलाम गौस ने थोडी देर में तोपो को सभाला । जो चलाने लायक थी, उसने सलामी दाग दी । जब भीड छट गई, रानी ने एकान्त में अपने सरदारो से विचार- विमर्श किया ।
लक्ष्मीबाई २६७ नाना भोपटकर—'अभी लक्षणो से ऐसा प्रतीत नही होता कि अङ्गरेजी राज्य उठ गया। इसलिये एक चिट्ठी जबलपुर के कमिश्नर के पास इस विषय की भेज दी जावे कि वाईसाहब झासी में अङ्गरेजो की ओर से राज्य कर रही हैं, जिससे डकैती, वटमारी और अव्यवस्था जनता को त्रस्त न कर सकें। यदि अङ्गरेज देश से निकाल दिये गये तो झासी हाथ से कही गई नही और यदि अङ्गरेज झासी वापिस आ गये तो बाईसाहब का कोई नुकसान नही हो पावेगा।' मोरोपन्त—'मै इस मत को अनुचित समझता हू। नाना साहव और दिल्ली, लखनऊ इत्यादि के अपने सहयोगी सुनेंगे तो क्या कहेगे ?' रघुनाथसिंह- 'नाना साहव इत्यादि हम लोगो को अच्छी तरह जानते हैं। उनके मन मँजे हुये हैं। भ्रम नही हो सकता। मेरे पास रानी विक्टोरिया की दी हुई सनद और तलवार है। सनद को परवाने का काम करने दीजिये और तलवार को देश की स्वाधीनता का।' दीवान दूल्हाजू—'मैं अपने शरीर के टुकडे टुकडे करने कराने को तैयार हूँ। खूब डट कर राज्य हो और कसकर लडाई। मै तो आज हर्ष के मारे बेकाबू हुआ जा रहा हू।' जवाहरसिंह—'दीवान साहव समय पडने पर सब देखा जायगा।' दूल्हाजू—'कैसे दीवान साहव ?' जवाहरसिंह—'आप तो रुष्ट होने लगे। लडना मरना सबको आता है। यह समय शान्ति के साथ सलाह करने का है, मेरे निवेदन का इतना ही अर्थ है।' भाऊबख्शी—'मेरी समझ में नाना भोपटकर जो कह रहे हैं, वह ध्यान देने योग्य है।' मोरोपन्त—'मैं इस सलाह के विरुद्ध नही हूं। परन्तु झंडे का सवाल उठता है। जगह जगह वादशाह का हरा झंडा फहराया जा रहा है।'
२६८ झांसी की रानी रानी—'झासी पर केवल भगवा झंडा उडाया जावे।' नाना भोपटकर—'मेरी भी यही राय है।' रानी—'नीति का काम नाना भोपटकर जी को सौपा जाय वे जैसा ठीक समझे करें। मैं स्वयं रणनीति और राजनीति के समीकरण में विश्वास करती हू। एक का पलडा भारी हुआ कि दूसरा झमेले में पड़ा।' नाना भोपटकर—'मै स्वयं चिट्ठी नहीं लिखूंगा। गार्डन के सरिश्तेदार से लिखवा कर भेजूंगा। वह यहा से खिसिया कर गया है। मना लूंगा।' इस बात के तै होने पर राजकार्य का विभाग किया गया और पदाधिकारी नियुक्त किए। लक्ष्मणराव प्रधान मन्त्री, बख्शी और तोपे ढालने वाला भाऊ, प्रधान सेनापति दीवान जवाहरसिंह, पैदल सेना के तीन कर्नल—एक दीवान रघुनाथसिंह दूसरा मुहम्मद जमाखा तीसरा खुदाबख्श। घुड सवारो की प्रधान स्वयं रानी। कर्नल-सुन्दर, मुन्दर और काशीबाई। तोपखाने का प्रधान गुलाम गौसखा, नायब दीवान दूल्हाजू। न्यायाधीश नाना-भोपटकर। मोरोपन्त कमठाने के प्रधान। जासूसी विभाग मोतीबाई के हाथ मे, नायब जूही। पुलिस, माल विभाग, दानधर्म विभाग इत्यादि के भी कर्मचारी नियुक्त कर दिये गये। तहसीलो के तहसीलदार भी। मऊ का परगना काशीनाथ भैया नामक एक महाराष्ट्र और आनन्दराय के हाथ में दिया गया। उस दिन खूब लू चली। काफी गरमी पडी। परन्तु किसी ने यह न जाना कि दिन कैसे निकल गया। जब सब काम अच्छी तरह से निबटा लिया तब रानी ने सभा विसर्जित की।
लक्ष्मीबाई २६६ [ ५२ ] सब कर्मचारियो को अपने अपने विभागो को दृढता और सावधानी के साथ सभालने और चलाने का आदेश रानी ने कर दिया ! सबेरे से ही रिसाले और पैदल पलटनो की कवायद और निशाने- बाजी शुरू हो गई । समय पर बिगुल बजा और ठीक समय पर सब काम हुआ और होता रहा । सेना में लगभग सब पुराने सिपाही आ गये । नई भर्ती भी बहुत हुई । सब जातियो और वर्गों के आदमी लिये गये । रानी की हिदायत थी कि सेना को सारे राज्य की जनता अपना समझे और यह तभी हो सकता था जब सेना में सब जातियो के लोग रखे जाते । झांसी का राज्य लेने पर अङ्गरेज़ो ने लगभग सब पुरानी तोपो को कीले ठोककर, बेकार कर दिया था । तोपो के ढालने के कारखानो को चालू करने का कार्य तुरन्त शुरू कर दिया गया । गोले गोलिया बनाने का, तलवारे-बन्दूके, पिस्तौले इत्यादि तैयार करने का भी काम जारी हो गया । परन्तु नये हथियारो का कारखानो से बनकर निकलना शीघ्र सम्पादित नही हो सकता था । इसलिये रानी ने, जहा मिले, पुराने हथियार इकट्ठे किये । जनता ने जी खोलकर रुपया दिया । गुलाम गौसखा ने दो दिन में तोपो को ठीक कर लिया । कुछ तोपें गडी हुई पडी थी । उनको भी सभाल लिया । यह अच्छा हुआ क्योकि राज्य को हाथ में लेने के ठीक पाच दिन बाद (१३ जून की रात को) रानी को मोतीबाई ने खबर दी कि करेरा के किले पर सदाशिवराव नेवालकर ने हमला किया है और काफी सेना इकट्ठी करली है । सदाशिवराव झांसी की गद्दी का दावेदार था । झांसी में ही रहता था । ३१ मई की हलचल की उसको खबर थी । वह अपनी लुडिया मारने के लिये झांसी से निकल गया । गांव में लोग क्रान्ति के लिये तैयार थे ही, बहुत से मनचले नौजवान हथियार बाधकर सदाशिव के साथ हो गये ।
२७० झाँसी की रानी करेरा में थानेदार और तहसीलदार अङ्गरेजों की ओर से नियुक्त थे। उनको सदाशिव ने मार भगाया। तुरन्त अडोस-पडोस के जागीरदारो से रुपया वसूल किया और दो एक दिन के भीतर ही अभिषेक करवा लिया। पदवी धारण की-महाराजा श्री सदाशिव नारायण ! और प्रसिद्ध किया कि मैं ही झासी राज्य का सच्चा और सही अधिकारी हूं। गांव-गाव में अपने 'महाराज' होने के घोषणा पत्र भिजवाये। जिसने उसको झासी का राजा न माना उसकी तुरन्त जायदाद जब्त करली। ऐसे सपाटे के साथ कदम बढाया मानो दो चार हफ्ते में ही सारे हिन्दुस्थान का चक्रवर्ती हो जायगा। उसने समझा झासी अनाथ है-एक महज़ अल्प वयस्क स्त्री के हाथ में है। खबर पाते ही रानी ने तैयारी करदी। नगर का प्रबन्ध मजबूत था ही। उत्तर, पूर्व और दक्षिण के भागो का शीघ्र सन्तोष जनक प्रबन्ध कर लिया। करेरा पश्चिम में था। गडबड केवल इसी दिशा में 'महाराजा' सदाशिव के कारण थी। झासी की सेना अधकचरी थी, परन्तु सेनापति चतुर और उत्साही थे। करेरा कूच करने के पहले तीनो सहेलियो से मुस्कराकर रानी ने कहा, 'तुम तीनो कर्नलो की परीक्षा महाराजा सदाशिव नारायण के सामने होगी।' मुन्दर बोली, 'यदि महाराजा साहब हमारे जनरल का नाम सुनते ही भाग गये तो?' रानी हँसी। जैसे मोतियो ने आभा बरसाई हो। काशी शान्त प्रकृति की होते हुये भी बहुत हँसी। रानी ने कहा, 'काशी, मैं बिल्कुल पीछे रहूँगी। तुमको आगे जाकर लोहा लेना पडेगा।' काशी बोली, 'बाईसाहब, उस समय या तो आपका घोड़ा न मानेगा या आप न मानेंगी।'
लक्ष्मीबाई २७१ रानी ने काशी के कन्धे की चुटकी भरी और कहा, 'तेरी एक बात तो सच्ची हो गई। उस दिन तूने कहा था—जवाहरसिंह सेनापति होगा। सो हो गया। अब देखू करेरा के सम्बन्ध मे मुन्दर की बात ठीक निकलती है या नही। युद्ध होगा।' 'सरकार', मुन्दर उत्साह के साथ बोली, अबकी बार मेरी वाणी सच्ची होगी।' 'तो अपने हाथ से लड्डू बनाकर खिलाऊँगी', रानी ने कहा। मुन्दर को उन थाल भर लड्डुओ की याद आ गई जो रानी ने अपने हाथ से उस दिन बनाये थे और रघुनाथसिंह इत्यादि को खिला दिये थे। रानी ने कूच कर दिया। वे इतने वेग के साथ अपने घुडसवारो को लेकर करेरा पहुची कि 'महाराज' सदाशिवराव को लड़ने तक का मौका नही दिया ! रानी ने पहुँचते ही करेरा के किले को ऐसा घेरा कि सदाशिव ने मुश्किल से भाग कर अपनी जान वचा पाई। सिन्धिया के राज्य में, नरवर में, जाकर दम ली। वहा से सदाशिव ने सिन्धिया से सहायता की याचना की। ग्वालियर से थोडी सी सहायता आई थी। परन्तु रानी ने सदाशिव को नरवर में घेर लिया—और पकड कर झासी ले आई। झासी के किले में कैद कर दिया। मुन्दर ने कहा, 'बाईसाहब, मेरी भविष्यवाणी कैसी अक्षर अक्षर सत्य निकली ?' काशी बोली, 'और मेरी भी। मैने कहा था न कि बाईसाहव सबसे आगे होगी।' रानी ने कहा, 'मेरे दोनो कर्नल सच्चे।' सुन्दर ने अपनी सुन्दर आँखो से जरा तृष्णा प्रकट की। रानी बोली, 'तू भी नाम करेगी सुन्दर। अबकी तेरी बारी है।'
२७२ झाँसी की रानी [ ५३ ] कानपुर की सेना के जनरल व्हीलर ने किलेबन्दी की और उसके अन्दर अंग्रेजो को बाल बच्चो सहित ले गया । नाना ने व्हीलर को चेतावनी दी कि शाम तक आत्मसमर्पण कर दो वरना किले पर हमला किया जावेगा । व्हीलर ने नही माना । किलेबन्दी का मुहासिरा कर दिया गया और गोले बरसाए जाने लगे । व्हीलर भी खूब लडा । २१ दिन युद्ध हुआ । इलाहाबाद मे भी विप्लव हो गया था । वंगाल की ओर से जनरल नील फौज लेकर आया । उसने अत्यन्त निर्दयता के साथ मार्ग में पडते हुए ग्रामो को जलाया, अपराधी और निरपराधी ग्रामीणो की हत्यायें की । जब इलाहाबाद के विजन से घबराकर हिन्दुस्थानी पुरुष स्त्री और बालक नावो में बैठकर भागे उसके सैनिको ने गोलाबारी की और उनमें से अधिकाश को मार दिया । इतना अन्याय और ऐसा नरसहार किया कि सर्वत्र सनसनी, भय और क्रोध फैल गया । कानपुर मे भी नील और उसके सहयोगियो के नृशस कुकृत्यो के समाचार पहुंचे । आग-सी लग गई । हिन्दू मुसलमान स्त्रियो के भी कलेजे दहक उठे । अजीजन नाम की एक वेश्या घोडे पर सवार, तलवार बाधे शहर की गलियो और छावनी मे उत्तेजना और प्रोत्साहन देने के लिये दौड धूप करने लगी ! व्हीलर ने लखनऊ से सहायता मागी । लखनऊ खुद घिरी हुई थी । सहायता न आई । व्हीलर ने अपनी किले बन्दी पर सुलह का सफेद भडा गाड दिया । इसी समय इलाहाबाद के आसपास से नील की पलटन के वीभत्स- अत्याचारो के समाचार आए । हिन्दुस्थानी सेना क्रोध में और भी पागल हो गई । कानपुर की घिरी हुई अंग्रेज सेना ने आत्मसमर्पण कर दिया । उनको इलाहाबाद भेज देने के लिए ४० नावे तैयार करा दी गई । नाना अपने विठूर वाले महल में था । सिपाहियो ने गुस्से मे आकर अंग्रेज पुरुषो को
लक्ष्मीबाई २७३ मार डाला। इस क्रूर दुष्कृत्य के उपरान्त उन लोगो ने स्त्रियो और बच्चो का वध करना चाहा, परन्तु नाना को खबर लग गई और उसने तुरन्त प्रयत्न करके इनको बचा लिया। फिर कुछ समय उपरान्त जब इनको नावो में बिठला कर इलाहाबाद की ओर भेजा जा रहा था, सिपा- हियो ने, नाना की आज्ञा बिना, बल्कि उसकी आज्ञा के प्रतिकूल, कतल करके अपने को कलंकित किया। कानपुर के कुल अङ्गरेजो में से एक स्त्री और चार पुरुष बचकर निकल पाये थे। इन घटनाओ ने अङ्गरेज़ और हिन्दुस्थानी की परस्पर हिंसा को बेहद बढा दिया। लखनऊ में विप्लव ३० मई को आरम्भ हुआ था। अवध भर में विप्लव की आग फैल गई। तो भी कई स्थानो पर विप्लवकारियो ने अङ्गरेज़ स्त्री-बच्चो की प्राणपण से रक्षा की। इलाहाबाद को कब्जे मे करके नील लखनऊ की ओर बढा और जनरल हैवलाक़ कानपुर की ओर। अवध अदम्य जान पडता था। पञ्जाब की छावनियो में भी गडवड हुई, लेकिन उसको दबाने में अङ्गरेजो को ज्यादा मुश्किल का सामना नही करना पडा। झासी के विप्लव का समाचार सागर और बुन्देलखण्ड़ के अन्य ज़िलो में पहुचा। गार्डन के सरिश्तेदार ने सागर चिट्ठी भेजी, जिसमें अङ्गरजो की ओर से रानी द्वारा झासी का प्रबन्ध किये जाने की ओर सकेत था। सागर के अङ्गरेजो को यह भी विदित कर दिया कि झासी के अङ्गरेज़ स्त्री-पुरुषो और बालको की हत्या में रानी का बिलकुल भी हाथ नही था। इस चिट्ठी के पहुचने पर सागर के अङ्गरेज़ सावधान हुये, परन्तु वे विप्लव को थोडे समय तक ही रोकने में सफल हो पाये। सागर की एक हिन्दुस्थानी पल्टन विप्लव में शामिल हो गई। दूसरी पल्टन सरकार-भक्त बनी रही।
२७४ झांसी की रानी [ ५४ ] विन्ध्यखण्ड की समग्र जनता में सनसनी फैली हुई थी । यहा की जनता ने कभी किसी अत्याचारी का शासन आसानी के साथ नही माना । स्वाभिमान को आघात पहुचा कि व्यक्ति ने सिर उठाया और -हथियार हाथ में लिया । शायद भारत का यही खण्ड एक ऐसा है जहा डाकू को 'बागी' कहते हैं । विन्ध्यखण्ड छोटी-बडी रियासतो में बिखरा हुआ था । सब बडी बडी रियासते कम्पनी सरकार का साथ दिये थी । बानपूर और शाहगढ साधारण राज्य थे । ये राज्य विप्लव मे शामिल हुये । रानी को इन दोनो राजाओ के स्वाधीनता-प्रिय विचारो का पता था । इन दोनो को उन्होने स्वराज्य-स्थापना के सग्राम में भाग लेने के लिये पत्र भेजे । वे दोनो लडने के लिये उद्यत हो गये । बानपूर राज्य के राजा मर्दनसिंह ने अपनी सेना को लेकर सागर जिले में प्रवेश किया और खुरई तहसील तथा नरयावली के परगने पर अधिकार कर लिया । इसके उपरान्त वह झासी जिले के दक्षिण में ललितपूर आया और चन्देरी की ओर बढा । चन्देरी अगरेज़ो के अधिकार मे थी । वहा विप्लव नही हुआ था । वहा के हाकिम परगना को राजा मर्दनसिंह के आने की ख़बर एक चन्देरी निवासी ने दी । वह कचहरी में था । रैडटेपिज्म ( लाल फीता- जाब्ता) का पुजारी था । खबर देने वाले ने कहा, 'साहब बलवा हो गया है । फौज चढी चली आ रही है ।' साहब उपेक्षा के साथ बोला, 'अर्जी लिखवाकर लाओ । ज़बानी नही सुना जायगा ।' थोडी देर में राजा मर्दनसिंह आ गया । उसने बिना किसी अर्जी- दरख्वास्त के चन्देरी को घेर लिया और बिना किसी अर्जी-पुर्जी के चन्देरी में अग्रेजी शासन को खतम कर दिया ।
लक्ष्मीबाई २७५ शाहगढ का राजा बखतबली था । उसने भी विप्लव किया । सागर, दमोह, जवलपूर के जिले में विद्रोहियो की सख्या बहुत बढ गई । दमोह जिले के तो समस्त लोधी क्रान्ति में सम्मिलित हो गये । ये सब शाहगढ के राजा के साथ थे । उससे लडने के लिये सागर से पलटन आई, पर राजा बखतबली ने उसको आसानी से हरा दिया । इस राजा के एक सरदार बोधन दौआ ने गढा कोटा पर चढाई की और उस पर अधिकार कर लिया । राजा मर्दनसिंह चन्देरी को अधिकृत करके सागर लौटा । उसी समय जवलपूर की हिन्दुस्थानी पलटन ने भी विप्लव कर दिया । अङ्गरेजो ने पन्ना राज्य से सहायता मागी । पन्ना के राजा ने अङ्गरेजो की सहायता के लिये अपनी काफी सेना भेजी । पन्ना की सेना ने विप्लवकारियो को दमोह के जिले में पराजित किया और अङ्गरेजो की ओर से दमोह का शासन किया । पन्ना की सेना जबलपूर की विप्लव- कारिणी पलटन से भी लडी और उसको भी हरा दिया । झासी के चारो ओर, दूर और पास, इसी प्रकार की परिस्थिति थी । इस परिस्थिति में रानी लक्ष्मीबाई झासी में एक सुदृढ स्फटिक सी थी । झासी जिले में उन्होने प्रबलता के साथ शान्ति स्थापित की । उनकी दिनचर्या वैसे ही नियम-सयम के साथ चली जा रही थी । उनकी चर्या में केवल दो अन्तर आये । एक तो वे सुबह के नित्य कृत्यो और पूजा ध्यान के उपरान्त राज्य के कर्मचारियो को मिलने और उनकी समस्याओ को सुनने के लिये समय देने लगी, दूसरे ठीक तीन बजे के पश्चात् वे कचहरी करने लगी । बडे और महत्वपूर्ण मुकद्दमे वे स्वय करती थी और तुरन्त निर्णय कर देती थी । कभी कभी दण्ड भी स्वय अपने हाथ से दे देती थी परन्तु केवल उन मामलो में जिनमें किसी ने बालक या स्त्री को सताया हो । वे कचहरी में टोपी लगाकर बैठती थी । भीतर लोहा ऊपर लाल रेशम । टोपी झालरदार-मोतियो और जवाहरो की । कठ मे हीरो की माला । सुडोल और भरे हुये वक्षस्थल पर कचुकी, जो सुनहरी जरीदार
२७६ झाँसी की रानी कमरपेटी से कसी रहती थी। कभी साड़ी और कभी ढीला पैजामा पहिन आती थी। रानी के आसन के पास ही दीवान लक्ष्मणराव कागज, कलम, दावात लिये बैठता था। यद्यपि वह पढ़ा लिखा बहुत कम था, परन्तु वह अपनी निरक्षरता को खूबी के साथ छिपाये रहता था। कभी कभी रानी अपने हाथ से फैसला लिखती थी और कभी बोल देती थी। लक्ष्मणराव लिखने का बहाना करता था और नीचे बैठे हुये मुसद्दियो से लिखवा कर झटपट मुहर लगा देता था ! आये गये की उनको जबरदस्त याद रहती थी। नित्य का आने वाला यदि एक दिन भी चूक जाय तो वह उसके आते ही गैरहाजिरी का कारण पूछती थी, और समय की वे कठोर पाबन्दी करती थी। वर्षा का प्रारम्भ विलम्ब से हुआ, परन्तु प्रचण्डता के साथ। फिर भी उनके कार्यों में शिथिलता न आई-घोडे की सवारी करने से जरूर विवश थी। ऐसी ऋतु में प्रायः डकैती बटमारी बन्द हो जाती है, परन्तु इन्ही दिनो उनको सूचना मिली कि बरवासागर के पास सागरसिंह-कुंवर सागरसिंह-डाकू ने लगातार कई डाके डाले हैं और बरवासागर का थानेदार उसका कुछ नही कर पा रहा है। रानी ने तुरन्त निश्चय किया। मोतीबाई द्वारा खुदाबख्श को बुलवाया। आने पर खुदाबख्श से कहा, 'सागरसिंह का शीघ्र दमन किया जाना चाहिये।' खुदाबख्श ने हाथ जोड कर स्वीकार किया। रानी—'तुम इसी समय २५ सिपाही लेकर वरवामागर जाओ और सागरसिंह को जीवित या मृत ले आओ। उसकी दुष्टता के कारण बरवासागर और बरवासागर का त्रस्त और सन्तप्त हो उठा है। इस काम को कितने दिन में पूरा कर सकोगे ? — एक महीने में ?'
लक्ष्मीबाई २७७ खुदाबख्श — 'श्रीमंत सरकार, जितनी जल्दी हो सकेगा उतनी जल्दी । केवल वर्षा की कठिनाई है।' रानी — 'परन्तु सागरसिंह को वर्षा कोई विघ्न बाधा नही पहुँचाती !' खुदाबख्श — 'सरकार —' रानी — 'कहो, कहो।' खुदाबख्श — सरकार, ये लोग कुछ ग्रामीणो से मिलकर बनियो महाजनो को लूटते हैं और सघन जंगलो में भाग कर छिप जाते हैं।' रानी — 'पानी बरसते घने जगलो मे वे सोते खाते कहा होगे ? यदि तुम उन्हे उनके अड्डो पर ढूढो तो वे जगलो मे नही मिलेगे बल्कि अपने अड्डो पर। कुछ और सिपाही चाहिये हो तो ले जाओ।' खुदाबख्श — 'नही सरकार इतने ही बहुत हैं। यदि अटक पडेगी तो समाचार दूंगा।' खुदाबख्श चला गया । रानी ने अपनी सहेलियो से एकान्त में सलाह की । रानी ने प्रश्न किया, 'खूब बरसते पानी में घोडा दौडा सकोगी ?' मुन्दर ने उत्तर दिया, 'दौडा लूँगी । अभ्यास तो किया है।' 'तुम सुन्दर, और काशीबाई ?' रानी ने पूछा । उन दोनो ने भी हा भरी, परन्तु काशीबाई की हा में कुछ दुर्बलता थी । रानी ने मुस्करा कर कहा, 'काशी हाल मे कुछ अस्वस्थ रही है इसलिये वह महल में ही रहेगी और यहां का काम काज देखेगी। मेरी अनुपस्थिति का समाचार झांसी से बाहर न जाने पावे। खुदाबख्श के बरवासागर पहुँचने के बाद किसो दिन हम लोग यहा से चलेगे।' खुदाबख्श उसी दिन चला गया। सन्ध्या तक वरवासागर पहुँचा । भीगा हुआ और भूखा । परन्तु उसको मानसिक क्लेश कुछ न था । जरा सुस्ता कर भोजन किया। थानेदार से सागरसिंह की गतिविधि पर बात चीत की। खुदाबख्श झांसी से वह ख्याल लेकर आया था कि बरवासागर का थानेदार किंकर्तव्य विमूढ हो गया है, परन्तु उसका यह
भ्रम निकला। सागरसिंह बहुत चालाक और बडा साहसी था। उसके साथ उत्पातियो का काफी बडा गिरोह था। बरवासागर का थाना प्रयास करने पर भी उसके कार्यक्रम में बहुत कम बाधा डाल सकता था। सागरसिंह का घर रावली ग्राम मे, बरवासागर से पाच छह कोस की दूरी पर था, परन्तु वह घर पर रहता बहुत कम था। खुदाबख्श को बरवासागर आकर अपने आसामी की विकटता का पता लगा। और अधिक सिपाही मँगाने मे नाक सी कटती थी। समय केवल एक महीने का था। मोतीबाई की याद आई। अपने जादू से शायद वह कुछ कर डालती। तुरन्त उसके मन ने इस कल्पना को धिक्कारा। दूसरे दिन बादल जरा खुला। भरे भरे सावले घूंघरे बादल आते और चले जाते थे। एकाध फुहार छोड जाते। नदिया नाले भरे, इठलाये हुये और सवेग। खुदाबख्श ने बरवासागर के थानेदार, उसके सिपाहियो और अपने सिपाहियो को लेकर सबेरे ही रावली की ओर दौर कर दी। छिपे लुके, भीगे और कीचड में लतपत, बन्दूको को कपडो से ढके, जेबो में भुने चनें और प्याज भरे. ये लोग दुपहरी में रावली के गेवडे पहुँच गये। खेतो में कोई काम नही हो रहा था, इसलिये मार्ग में किसी से भेट नही हुई। सब लोग गाव मे थे और पानी के खुलने की की मना रहे थे। सागरसिंह भी घर पर था। सागरसिंह का मकान ऊँची टौरिया पर था। सागरसिंह खाना खाने के बाद झपकी ले रहा था। झकोरो हवा चल रही थी और कभी कभी फुहार पड जाती थी, इसलिये खुदाबख्श के दल का शब्द नही सुनाई पडा। जब तक गाव वाले सागरसिंह को सचेत करे कि खुदाबख्श ने सागरसिंह की हवेली घेर ली। उसको फाटक लगवा लेने का अवसर मिल गया। हवेली में उसके कुछ आदमी थे। वे सब जल्दी तैयार हो गये। सागरसिंह को आश्चर्य था कि कुऋतु और कुसमय पर किसने घेरा डालने की हिम्मत की। दीवारो के तीरकशो में होकर उसने परख लिया कि घेरने वालो के साथ तोप नही है और वे केवल घर में घुसकर ही
लक्ष्मीबाई २७६ नुकसान पहुचा सकते हैं । सोचा शाम तक यो ही पडा रहने दूँ और देखता रहूँ, फिर उसको ख्याल आया कि घेरने वाले रानी के सिपाही होगे और इनकी पीठ पर कुछ बन कही और लगा होगा । इसलिये उसने तुरन्त लड डालने की ठानी । वह जानता था कि घेरने वाले अधिक समय तक बन्दूक नही चला सकेंगे और वह स्वय सूखी जगह में बैठकर बहुत अच्छा और बडी देर तक लड सकेगा । हवेली टोरिया की ठीक चोटी पर न थी किन्तु अपराधी से जरा ऊपर । खुदाबख्श ने इस स्थिति से लाभ उठाने का प्रयत्न किया, परन्तु सागरसिंह की पहली वाढ ने ही खुदाबख्श के कई सिपाहियो को घायल कर दिया । खुदाबख्श ने तुरन्त हवेली पर चढ जाने की आज्ञा दी । स्वय आगे हो गया । जब तक सागरसिंह फिर बन्दूको को भरे, खुदाबख्श हवेली पर चढ गया और उसके कई साथी भी । सागरसिंह ने फिर वाढ दागी, परन्तु खाली गई । सागरसिंह ने समझ लिया कि अब गये । उसने तलवार हाथ में ली । खुदाबख्श और उसके साथी आँगन मे कूद पडे । सागरसिंह का मुकाबला न हो सका । खुदाबख्श घायल होकर गिर पडा । और सागरसिंह उसके साथियो को चीरता हुआ बाहर निकल गया । तब खुदाबख्श के अन्य सिपाही फाटक से होकर भीतर आगये । खुदाबख्श और उसके साथियो ने गाव में टिकना ठीक नही समझा । खुदाबख्श बैलगाडी से रात होते बरवासागर आ गया । घाव बहुत गहरे न थे, परन्तु थे कई, खून काफी निकल चुका था । उसकी और उसके घायल सिपाहियो की मरहम पट्टी की गई । रात में खुदाबख्श को बेहोशी रही । सबेरे रानी के पास समाचार भेज दिया गया ।
२८० झाँसी की रानी [ ५५ ] मेघ छाये हुये थे। हवा सन्न थी। पानी रिमझिम रिमझिम बरस रहा था। महल के ऊपरी खण्ड के हवाई कमरे में रानी आंखे मूँदे हुये मोतीबाई का भजन सुन रही थी। मुन्दर जमुहा रही थी। सुन्दर बैठे बैठे सावधानी के साथ निद्रामग्न हो गई थी। काशी सचेत थी। भजन की समाप्ति पर रानी का ध्यान टूटा, मुन्दर की जमुहाई हटी। परन्तु सुन्दर की निद्रा-समाधि भग्न न हुई। रानी ने हँसकर कहा, 'सुन्दर, देख यह भालू कहा से आ गया है? सुन्दर हडबड़ा गई। भौंचक्की होकर बोली, 'कहां है बाईसाहब?' 'ढूंढ तो पता लग जायगा', रानी ने कहा, 'साधारण भालू तो है नही।' सुन्दर लज्जित हो गई। हाथ जोड़कर बोली, 'सरकार दिन भर की थकी थी, इसलिये अभी अभी थोडी सी नीद आ गई।' काशीबाई—'सरकार, यह आज दिन भर चक्की चलाती रही है, इसलिये बहुत थक गई।' सुन्दर—'नही काशीबाई, चक्की नही चलाई तो और काम तो बहुत किया है।' मुन्दर—तुम अकेली ने !' उसी समय पहरे वाले ने निवेदन किया, 'बरवासागर से एक सिपाही आवश्यक समाचार लाया है।' रानी ने दूसरे कमरे में उसको बुलवाया। उनका आदेश था कि आवश्यक समाचार के लिये समय-कुसमय न देखा जावे और उनको तुरन्त सूचना दी जाया करे।' रानी सहेलियो के साथ दूसरे कमरे में गई । समाचार-वाहक ने कहा, 'सरकार, रावली के बागियो से सरदार खुदाबख्श की लडाई हुई। वे घायल हो गये हैं। सात सिपाही भी घायल