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झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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लक्ष्मीबाई २६७ नाना भोपटकर—'अभी लक्षणो से ऐसा प्रतीत नही होता कि अङ्गरेजी राज्य उठ गया। इसलिये एक चिट्ठी जबलपुर के कमिश्नर के पास इस विषय की भेज दी जावे कि वाईसाहब झासी में अङ्गरेजो की ओर से राज्य कर रही हैं, जिससे डकैती, वटमारी और अव्यवस्था जनता को त्रस्त न कर सकें। यदि अङ्गरेज देश से निकाल दिये गये तो झासी हाथ से कही गई नही और यदि अङ्गरेज झासी वापिस आ गये तो बाईसाहब का कोई नुकसान नही हो पावेगा।' मोरोपन्त—'मै इस मत को अनुचित समझता हू। नाना साहव और दिल्ली, लखनऊ इत्यादि के अपने सहयोगी सुनेंगे तो क्या कहेगे ?' रघुनाथसिंह- 'नाना साहव इत्यादि हम लोगो को अच्छी तरह जानते हैं। उनके मन मँजे हुये हैं। भ्रम नही हो सकता। मेरे पास रानी विक्टोरिया की दी हुई सनद और तलवार है। सनद को परवाने का काम करने दीजिये और तलवार को देश की स्वाधीनता का।' दीवान दूल्हाजू—'मैं अपने शरीर के टुकडे टुकडे करने कराने को तैयार हूँ। खूब डट कर राज्य हो और कसकर लडाई। मै तो आज हर्ष के मारे बेकाबू हुआ जा रहा हू।' जवाहरसिंह—'दीवान साहव समय पडने पर सब देखा जायगा।' दूल्हाजू—'कैसे दीवान साहव ?' जवाहरसिंह—'आप तो रुष्ट होने लगे। लडना मरना सबको आता है। यह समय शान्ति के साथ सलाह करने का है, मेरे निवेदन का इतना ही अर्थ है।' भाऊबख्शी—'मेरी समझ में नाना भोपटकर जो कह रहे हैं, वह ध्यान देने योग्य है।' मोरोपन्त—'मैं इस सलाह के विरुद्ध नही हूं। परन्तु झंडे का सवाल उठता है। जगह जगह वादशाह का हरा झंडा फहराया जा रहा है।'