झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)
Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography
वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा
पृष्ठ 277, कुल 526 में से
संदर्भ में पढ़ें२६६ झांसी की रानी वे दोनो सरिश्तेदार दरबार से हटा दिये गये । रानी बोली, 'आप लोग जो भार मुझे दे रहे हैं, उसको मै अपना गौरव मानती हूँ और परमात्मा की कृपा से उसको निभाऊँगी ।' लोगो ने जय-जयकार किया । गुलाम गौसखा तोपची हाथ बाधकर खडा हो गया । उसने कहा, 'श्रीमन्त सरकार, मुझको मेरी पुरानी नौकरी मिलनी चाहिये ।' रानी उसको पहिचानती थी । बोली, 'तुम सदर तोपची नियुक्त किये जाते हो सब तोपो को संभालो । जो तोपे खराब कर दी गई हैं उनको ठीक करो ।' 'जो आज्ञा', गुलाम गौसखा ने गद्गड़ होकर कहा, --'एक विनय और है, साढे तीन साल से ऊपर हुये एलिस किले वाले महल में आया और हम लोगो के मनमें आशा बँधी कि झांसी के राज्य को लौटाने की चिट्ठी लाया होगा, तब मैने तोपो मे बारूद डाल ली थी—सलामी दागने के लिये । आज मुझको अपने मन की करने का हुक्म दिया जाय ।' रानी ने सुरीले मधुर स्वर मे कहा, 'अभी ऐसा क्या हो गया है ?' गुलाम गौस—'हो गया है सरकार । हमारे दिलो में हो गया है । दिलो के बाहर हो गया है ।' मोरोपन्त—'हो गया है ।' लक्ष्मणराव—'हो गया है ।' नाना भोपटकर—'हो गया है ।' उपस्थित जनता ने उसी को दुहराया और जय-जयकार की । रानी ने अनुमति दे दी । गुलाम गौस ने थोडी देर में तोपो को सभाला । जो चलाने लायक थी, उसने सलामी दाग दी । जब भीड छट गई, रानी ने एकान्त में अपने सरदारो से विचार- विमर्श किया ।