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झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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लक्ष्मीबाई २६५ प्रमुख साहूकार मगन गन्धी बोला, 'वाट जोहते जोहते आंखें पथरा गईं । आज कितनी मानताओं के बाद यह दिन देखने को मिला । हम लोग तो अपना राज्य चाहते हैं ।' सरिश्तेदारो ने फिर आंखे तरेरी । चमारों के मुखिया ने कहा, 'एल्लो, उसई आंखे नटेर रये ! राज बाई साव को और फिर बाई साब की और हम सब बाई साब के ।' माल का सरिश्तेदार बोला, 'नवाब अलीबहादुर साहब को भी बुला लीजिये । वे दुनिया देखे हुये हैं । ठीक सलाह दे दें । इन बेपढो की सलाह पर अमल करना गलत होगा ।' 'हो, ते है वडो मौलबी पडित,' अहीरो के नायक ने रुष्ट होकर कहा, 'हमें परदेसियन की हकूमत नई चावने । जो उनकी पिच्छदारी करें तीको करिया मो हो जाय !' मोरोपन्त ने जन-मत का समर्थन किया । एक लक्ष्मणराव वाडे नामका, चतुर काइया भी उस सभा में था । बोला, 'सरिश्तेदार साहब अगरेजी और अगरेज़ को जानते हैं । वे वास्तव में यह चाहते हैं कि बाईसाहब दो चार रोज़ यह मुफ्त का झमेला अपने सिर लिये रहे और सागर के डिप्टी कमिश्नर को बुला कर उनको पेशकारी दिलवादे ताकि कसकर रोजगार चले ।' अब सरिश्तेदारो का कोई कुछ कहने लगा और कोई कुछ । वृद्ध नाना भोपटकर ने, जो अब भी काफी स्वस्थ था, कहा, 'हमलोग सरिश्तेदार साहब की सलाह पर भी विचार करेंगे । इस समय इतना तो अवश्य तै कर लेना चाहिये कि राज्य का सर्वांगीन शासन बाईसाहब के हाथ में रहे और सब लोग अपने को उनकी प्रजा मानकर दृढ़तापूर्वक अपने जीवन का निर्वाह करे ।' उपस्थित जनता ने हर्ष और उत्साह के साथ इस मत को स्वीकार किया ।