झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)
Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography
वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२६४ झाँसी की रानी [ ५१ ] रात में दीवान जवाहरसिंह ससैन्य आ गया । रानी ने आदेश भेजा कि नगर और किले का प्रबन्ध करो और कल दिन में मिलो । दूसरे दिन महल में बहुत लोग उपस्थित हुये । सेना और शासन से सम्बन्ध रखने वाले सरदार, कर्मचारी, जागीरदार, जनता के साहूकार मुखिया और पञ्च । रानी पर्दे के पीछे बैठी । रानी ने कहा, 'कल कठिनाई के साथ मैंने नगर को लुटने से बचा पाया । विद्रोही तो यहाँ से चले गये, परन्तु अव्यवस्था छोड़ गये हैं। डकैती और लूटमार बढ़ने का बहुत भय है । मै चाहती हूँ जनता त्रस्त न होने पावे । इसलिये मैने झासी राज्य के पुराने जागीरदार और सरदारों को कुछ सेना लेकर बुलवाया है, जिसमें अव्यवस्था न रहने पावे । आप लोगों को और जनता के मुखिया पञ्चों को सम्मति के लिये बुलाया है । बतलाइये अब क्या करना चाहिये ?' गार्डन के सरिश्तेदार ने कहा, 'मै तो यह सलाह दूँगा कि सागर के डिप्टी कमिश्नर को बलवे की सूचना दी जावे और जबलपुर के कमिश्नर को लिखा जावे कि आपने अङ्गरेजों की ओर से शासन की बागडोर हाथ में ले ली है ।' माल के सरिश्तेदार ने समर्थन किया । कोरियों का सरपञ्च पूरन बोला, 'मुसकिल से तो कम्पनी को राज हटपाओ है अब उन्हे जा खबर काये दई जाय कै हम तुमाये लानें अपनो मूँड सँजो रये, आओ, और फिर किड बिड़ करके झाँसी के प्रान खाओ ?' दोनो सरिश्तेदारों ने आँखें तरेरी । काछियों के मुखिया ने कहा, 'हमें नई चाउने काऊ और को राज झाँसी में । करै राज तो हमाई बाई साब, न करै तो हमाई बाई साब !' तेलियों के पञ्च ने मत प्रकट किया, हमें तो अपनों पुरानों राज लौटाउने, चाए पृथी इतै की उतै हो जाय ।'