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झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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२६८ झांसी की रानी रानी—'झासी पर केवल भगवा झंडा उडाया जावे।' नाना भोपटकर—'मेरी भी यही राय है।' रानी—'नीति का काम नाना भोपटकर जी को सौपा जाय वे जैसा ठीक समझे करें। मैं स्वयं रणनीति और राजनीति के समीकरण में विश्वास करती हू। एक का पलडा भारी हुआ कि दूसरा झमेले में पड़ा।' नाना भोपटकर—'मै स्वयं चिट्ठी नहीं लिखूंगा। गार्डन के सरिश्तेदार से लिखवा कर भेजूंगा। वह यहा से खिसिया कर गया है। मना लूंगा।' इस बात के तै होने पर राजकार्य का विभाग किया गया और पदाधिकारी नियुक्त किए। लक्ष्मणराव प्रधान मन्त्री, बख्शी और तोपे ढालने वाला भाऊ, प्रधान सेनापति दीवान जवाहरसिंह, पैदल सेना के तीन कर्नल—एक दीवान रघुनाथसिंह दूसरा मुहम्मद जमाखा तीसरा खुदाबख्श। घुड सवारो की प्रधान स्वयं रानी। कर्नल-सुन्दर, मुन्दर और काशीबाई। तोपखाने का प्रधान गुलाम गौसखा, नायब दीवान दूल्हाजू। न्यायाधीश नाना-भोपटकर। मोरोपन्त कमठाने के प्रधान। जासूसी विभाग मोतीबाई के हाथ मे, नायब जूही। पुलिस, माल विभाग, दानधर्म विभाग इत्यादि के भी कर्मचारी नियुक्त कर दिये गये। तहसीलो के तहसीलदार भी। मऊ का परगना काशीनाथ भैया नामक एक महाराष्ट्र और आनन्दराय के हाथ में दिया गया। उस दिन खूब लू चली। काफी गरमी पडी। परन्तु किसी ने यह न जाना कि दिन कैसे निकल गया। जब सब काम अच्छी तरह से निबटा लिया तब रानी ने सभा विसर्जित की।