भारतकोश
झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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लक्ष्मीबाई २६६ [ ५२ ] सब कर्मचारियो को अपने अपने विभागो को दृढता और सावधानी के साथ सभालने और चलाने का आदेश रानी ने कर दिया ! सबेरे से ही रिसाले और पैदल पलटनो की कवायद और निशाने- बाजी शुरू हो गई । समय पर बिगुल बजा और ठीक समय पर सब काम हुआ और होता रहा । सेना में लगभग सब पुराने सिपाही आ गये । नई भर्ती भी बहुत हुई । सब जातियो और वर्गों के आदमी लिये गये । रानी की हिदायत थी कि सेना को सारे राज्य की जनता अपना समझे और यह तभी हो सकता था जब सेना में सब जातियो के लोग रखे जाते । झांसी का राज्य लेने पर अङ्गरेज़ो ने लगभग सब पुरानी तोपो को कीले ठोककर, बेकार कर दिया था । तोपो के ढालने के कारखानो को चालू करने का कार्य तुरन्त शुरू कर दिया गया । गोले गोलिया बनाने का, तलवारे-बन्दूके, पिस्तौले इत्यादि तैयार करने का भी काम जारी हो गया । परन्तु नये हथियारो का कारखानो से बनकर निकलना शीघ्र सम्पादित नही हो सकता था । इसलिये रानी ने, जहा मिले, पुराने हथियार इकट्ठे किये । जनता ने जी खोलकर रुपया दिया । गुलाम गौसखा ने दो दिन में तोपो को ठीक कर लिया । कुछ तोपें गडी हुई पडी थी । उनको भी सभाल लिया । यह अच्छा हुआ क्योकि राज्य को हाथ में लेने के ठीक पाच दिन बाद (१३ जून की रात को) रानी को मोतीबाई ने खबर दी कि करेरा के किले पर सदाशिवराव नेवालकर ने हमला किया है और काफी सेना इकट्ठी करली है । सदाशिवराव झांसी की गद्दी का दावेदार था । झांसी में ही रहता था । ३१ मई की हलचल की उसको खबर थी । वह अपनी लुडिया मारने के लिये झांसी से निकल गया । गांव में लोग क्रान्ति के लिये तैयार थे ही, बहुत से मनचले नौजवान हथियार बाधकर सदाशिव के साथ हो गये ।