झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)
Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography
वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२७० झाँसी की रानी करेरा में थानेदार और तहसीलदार अङ्गरेजों की ओर से नियुक्त थे। उनको सदाशिव ने मार भगाया। तुरन्त अडोस-पडोस के जागीरदारो से रुपया वसूल किया और दो एक दिन के भीतर ही अभिषेक करवा लिया। पदवी धारण की-महाराजा श्री सदाशिव नारायण ! और प्रसिद्ध किया कि मैं ही झासी राज्य का सच्चा और सही अधिकारी हूं। गांव-गाव में अपने 'महाराज' होने के घोषणा पत्र भिजवाये। जिसने उसको झासी का राजा न माना उसकी तुरन्त जायदाद जब्त करली। ऐसे सपाटे के साथ कदम बढाया मानो दो चार हफ्ते में ही सारे हिन्दुस्थान का चक्रवर्ती हो जायगा। उसने समझा झासी अनाथ है-एक महज़ अल्प वयस्क स्त्री के हाथ में है। खबर पाते ही रानी ने तैयारी करदी। नगर का प्रबन्ध मजबूत था ही। उत्तर, पूर्व और दक्षिण के भागो का शीघ्र सन्तोष जनक प्रबन्ध कर लिया। करेरा पश्चिम में था। गडबड केवल इसी दिशा में 'महाराजा' सदाशिव के कारण थी। झासी की सेना अधकचरी थी, परन्तु सेनापति चतुर और उत्साही थे। करेरा कूच करने के पहले तीनो सहेलियो से मुस्कराकर रानी ने कहा, 'तुम तीनो कर्नलो की परीक्षा महाराजा सदाशिव नारायण के सामने होगी।' मुन्दर बोली, 'यदि महाराजा साहब हमारे जनरल का नाम सुनते ही भाग गये तो?' रानी हँसी। जैसे मोतियो ने आभा बरसाई हो। काशी शान्त प्रकृति की होते हुये भी बहुत हँसी। रानी ने कहा, 'काशी, मैं बिल्कुल पीछे रहूँगी। तुमको आगे जाकर लोहा लेना पडेगा।' काशी बोली, 'बाईसाहब, उस समय या तो आपका घोड़ा न मानेगा या आप न मानेंगी।'