झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)
Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography
वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंलक्ष्मीबाई २७१ रानी ने काशी के कन्धे की चुटकी भरी और कहा, 'तेरी एक बात तो सच्ची हो गई। उस दिन तूने कहा था—जवाहरसिंह सेनापति होगा। सो हो गया। अब देखू करेरा के सम्बन्ध मे मुन्दर की बात ठीक निकलती है या नही। युद्ध होगा।' 'सरकार', मुन्दर उत्साह के साथ बोली, अबकी बार मेरी वाणी सच्ची होगी।' 'तो अपने हाथ से लड्डू बनाकर खिलाऊँगी', रानी ने कहा। मुन्दर को उन थाल भर लड्डुओ की याद आ गई जो रानी ने अपने हाथ से उस दिन बनाये थे और रघुनाथसिंह इत्यादि को खिला दिये थे। रानी ने कूच कर दिया। वे इतने वेग के साथ अपने घुडसवारो को लेकर करेरा पहुची कि 'महाराज' सदाशिवराव को लड़ने तक का मौका नही दिया ! रानी ने पहुँचते ही करेरा के किले को ऐसा घेरा कि सदाशिव ने मुश्किल से भाग कर अपनी जान वचा पाई। सिन्धिया के राज्य में, नरवर में, जाकर दम ली। वहा से सदाशिव ने सिन्धिया से सहायता की याचना की। ग्वालियर से थोडी सी सहायता आई थी। परन्तु रानी ने सदाशिव को नरवर में घेर लिया—और पकड कर झासी ले आई। झासी के किले में कैद कर दिया। मुन्दर ने कहा, 'बाईसाहब, मेरी भविष्यवाणी कैसी अक्षर अक्षर सत्य निकली ?' काशी बोली, 'और मेरी भी। मैने कहा था न कि बाईसाहव सबसे आगे होगी।' रानी ने कहा, 'मेरे दोनो कर्नल सच्चे।' सुन्दर ने अपनी सुन्दर आँखो से जरा तृष्णा प्रकट की। रानी बोली, 'तू भी नाम करेगी सुन्दर। अबकी तेरी बारी है।'