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झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

लक्ष्मीबाई २६६ [ ५२ ] सब कर्मचारियो को अपने अपने विभागो को दृढता और सावधानी के साथ सभालने और चलाने का आदेश रानी ने कर दिया ! सबेरे से ही रिसाले और पैदल पलटनो की कवायद और निशाने- बाजी शुरू हो गई । समय पर बिगुल बजा और ठीक समय पर सब काम हुआ और होता रहा । सेना में लगभग सब पुराने सिपाही आ गये । नई भर्ती भी बहुत हुई । सब जातियो और वर्गों के आदमी लिये गये । रानी की हिदायत थी कि सेना को सारे राज्य की जनता अपना समझे और यह तभी हो सकता था जब सेना में सब जातियो के लोग रखे जाते । झांसी का राज्य लेने पर अङ्गरेज़ो ने लगभग सब पुरानी तोपो को कीले ठोककर, बेकार कर दिया था । तोपो के ढालने के कारखानो को चालू करने का कार्य तुरन्त शुरू कर दिया गया । गोले गोलिया बनाने का, तलवारे-बन्दूके, पिस्तौले इत्यादि तैयार करने का भी काम जारी हो गया । परन्तु नये हथियारो का कारखानो से बनकर निकलना शीघ्र सम्पादित नही हो सकता था । इसलिये रानी ने, जहा मिले, पुराने हथियार इकट्ठे किये । जनता ने जी खोलकर रुपया दिया । गुलाम गौसखा ने दो दिन में तोपो को ठीक कर लिया । कुछ तोपें गडी हुई पडी थी । उनको भी सभाल लिया । यह अच्छा हुआ क्योकि राज्य को हाथ में लेने के ठीक पाच दिन बाद (१३ जून की रात को) रानी को मोतीबाई ने खबर दी कि करेरा के किले पर सदाशिवराव नेवालकर ने हमला किया है और काफी सेना इकट्ठी करली है । सदाशिवराव झांसी की गद्दी का दावेदार था । झांसी में ही रहता था । ३१ मई की हलचल की उसको खबर थी । वह अपनी लुडिया मारने के लिये झांसी से निकल गया । गांव में लोग क्रान्ति के लिये तैयार थे ही, बहुत से मनचले नौजवान हथियार बाधकर सदाशिव के साथ हो गये ।

२७० झाँसी की रानी करेरा में थानेदार और तहसीलदार अङ्गरेजों की ओर से नियुक्त थे। उनको सदाशिव ने मार भगाया। तुरन्त अडोस-पडोस के जागीरदारो से रुपया वसूल किया और दो एक दिन के भीतर ही अभिषेक करवा लिया। पदवी धारण की-महाराजा श्री सदाशिव नारायण ! और प्रसिद्ध किया कि मैं ही झासी राज्य का सच्चा और सही अधिकारी हूं। गांव-गाव में अपने 'महाराज' होने के घोषणा पत्र भिजवाये। जिसने उसको झासी का राजा न माना उसकी तुरन्त जायदाद जब्त करली। ऐसे सपाटे के साथ कदम बढाया मानो दो चार हफ्ते में ही सारे हिन्दुस्थान का चक्रवर्ती हो जायगा। उसने समझा झासी अनाथ है-एक महज़ अल्प वयस्क स्त्री के हाथ में है। खबर पाते ही रानी ने तैयारी करदी। नगर का प्रबन्ध मजबूत था ही। उत्तर, पूर्व और दक्षिण के भागो का शीघ्र सन्तोष जनक प्रबन्ध कर लिया। करेरा पश्चिम में था। गडबड केवल इसी दिशा में 'महाराजा' सदाशिव के कारण थी। झासी की सेना अधकचरी थी, परन्तु सेनापति चतुर और उत्साही थे। करेरा कूच करने के पहले तीनो सहेलियो से मुस्कराकर रानी ने कहा, 'तुम तीनो कर्नलो की परीक्षा महाराजा सदाशिव नारायण के सामने होगी।' मुन्दर बोली, 'यदि महाराजा साहब हमारे जनरल का नाम सुनते ही भाग गये तो?' रानी हँसी। जैसे मोतियो ने आभा बरसाई हो। काशी शान्त प्रकृति की होते हुये भी बहुत हँसी। रानी ने कहा, 'काशी, मैं बिल्कुल पीछे रहूँगी। तुमको आगे जाकर लोहा लेना पडेगा।' काशी बोली, 'बाईसाहब, उस समय या तो आपका घोड़ा न मानेगा या आप न मानेंगी।'

लक्ष्मीबाई २७१ रानी ने काशी के कन्धे की चुटकी भरी और कहा, 'तेरी एक बात तो सच्ची हो गई। उस दिन तूने कहा था—जवाहरसिंह सेनापति होगा। सो हो गया। अब देखू करेरा के सम्बन्ध मे मुन्दर की बात ठीक निकलती है या नही। युद्ध होगा।' 'सरकार', मुन्दर उत्साह के साथ बोली, अबकी बार मेरी वाणी सच्ची होगी।' 'तो अपने हाथ से लड्डू बनाकर खिलाऊँगी', रानी ने कहा। मुन्दर को उन थाल भर लड्डुओ की याद आ गई जो रानी ने अपने हाथ से उस दिन बनाये थे और रघुनाथसिंह इत्यादि को खिला दिये थे। रानी ने कूच कर दिया। वे इतने वेग के साथ अपने घुडसवारो को लेकर करेरा पहुची कि 'महाराज' सदाशिवराव को लड़ने तक का मौका नही दिया ! रानी ने पहुँचते ही करेरा के किले को ऐसा घेरा कि सदाशिव ने मुश्किल से भाग कर अपनी जान वचा पाई। सिन्धिया के राज्य में, नरवर में, जाकर दम ली। वहा से सदाशिव ने सिन्धिया से सहायता की याचना की। ग्वालियर से थोडी सी सहायता आई थी। परन्तु रानी ने सदाशिव को नरवर में घेर लिया—और पकड कर झासी ले आई। झासी के किले में कैद कर दिया। मुन्दर ने कहा, 'बाईसाहब, मेरी भविष्यवाणी कैसी अक्षर अक्षर सत्य निकली ?' काशी बोली, 'और मेरी भी। मैने कहा था न कि बाईसाहव सबसे आगे होगी।' रानी ने कहा, 'मेरे दोनो कर्नल सच्चे।' सुन्दर ने अपनी सुन्दर आँखो से जरा तृष्णा प्रकट की। रानी बोली, 'तू भी नाम करेगी सुन्दर। अबकी तेरी बारी है।'

२७२ झाँसी की रानी [ ५३ ] कानपुर की सेना के जनरल व्हीलर ने किलेबन्दी की और उसके अन्दर अंग्रेजो को बाल बच्चो सहित ले गया । नाना ने व्हीलर को चेतावनी दी कि शाम तक आत्मसमर्पण कर दो वरना किले पर हमला किया जावेगा । व्हीलर ने नही माना । किलेबन्दी का मुहासिरा कर दिया गया और गोले बरसाए जाने लगे । व्हीलर भी खूब लडा । २१ दिन युद्ध हुआ । इलाहाबाद मे भी विप्लव हो गया था । वंगाल की ओर से जनरल नील फौज लेकर आया । उसने अत्यन्त निर्दयता के साथ मार्ग में पडते हुए ग्रामो को जलाया, अपराधी और निरपराधी ग्रामीणो की हत्यायें की । जब इलाहाबाद के विजन से घबराकर हिन्दुस्थानी पुरुष स्त्री और बालक नावो में बैठकर भागे उसके सैनिको ने गोलाबारी की और उनमें से अधिकाश को मार दिया । इतना अन्याय और ऐसा नरसहार किया कि सर्वत्र सनसनी, भय और क्रोध फैल गया । कानपुर मे भी नील और उसके सहयोगियो के नृशस कुकृत्यो के समाचार पहुंचे । आग-सी लग गई । हिन्दू मुसलमान स्त्रियो के भी कलेजे दहक उठे । अजीजन नाम की एक वेश्या घोडे पर सवार, तलवार बाधे शहर की गलियो और छावनी मे उत्तेजना और प्रोत्साहन देने के लिये दौड धूप करने लगी ! व्हीलर ने लखनऊ से सहायता मागी । लखनऊ खुद घिरी हुई थी । सहायता न आई । व्हीलर ने अपनी किले बन्दी पर सुलह का सफेद भडा गाड दिया । इसी समय इलाहाबाद के आसपास से नील की पलटन के वीभत्स- अत्याचारो के समाचार आए । हिन्दुस्थानी सेना क्रोध में और भी पागल हो गई । कानपुर की घिरी हुई अंग्रेज सेना ने आत्मसमर्पण कर दिया । उनको इलाहाबाद भेज देने के लिए ४० नावे तैयार करा दी गई । नाना अपने विठूर वाले महल में था । सिपाहियो ने गुस्से मे आकर अंग्रेज पुरुषो को

लक्ष्मीबाई २७३ मार डाला। इस क्रूर दुष्कृत्य के उपरान्त उन लोगो ने स्त्रियो और बच्चो का वध करना चाहा, परन्तु नाना को खबर लग गई और उसने तुरन्त प्रयत्न करके इनको बचा लिया। फिर कुछ समय उपरान्त जब इनको नावो में बिठला कर इलाहाबाद की ओर भेजा जा रहा था, सिपा- हियो ने, नाना की आज्ञा बिना, बल्कि उसकी आज्ञा के प्रतिकूल, कतल करके अपने को कलंकित किया। कानपुर के कुल अङ्गरेजो में से एक स्त्री और चार पुरुष बचकर निकल पाये थे। इन घटनाओ ने अङ्गरेज़ और हिन्दुस्थानी की परस्पर हिंसा को बेहद बढा दिया। लखनऊ में विप्लव ३० मई को आरम्भ हुआ था। अवध भर में विप्लव की आग फैल गई। तो भी कई स्थानो पर विप्लवकारियो ने अङ्गरेज़ स्त्री-बच्चो की प्राणपण से रक्षा की। इलाहाबाद को कब्जे मे करके नील लखनऊ की ओर बढा और जनरल हैवलाक़ कानपुर की ओर। अवध अदम्य जान पडता था। पञ्जाब की छावनियो में भी गडवड हुई, लेकिन उसको दबाने में अङ्गरेजो को ज्यादा मुश्किल का सामना नही करना पडा। झासी के विप्लव का समाचार सागर और बुन्देलखण्ड़ के अन्य ज़िलो में पहुचा। गार्डन के सरिश्तेदार ने सागर चिट्ठी भेजी, जिसमें अङ्गरजो की ओर से रानी द्वारा झासी का प्रबन्ध किये जाने की ओर सकेत था। सागर के अङ्गरेजो को यह भी विदित कर दिया कि झासी के अङ्गरेज़ स्त्री-पुरुषो और बालको की हत्या में रानी का बिलकुल भी हाथ नही था। इस चिट्ठी के पहुचने पर सागर के अङ्गरेज़ सावधान हुये, परन्तु वे विप्लव को थोडे समय तक ही रोकने में सफल हो पाये। सागर की एक हिन्दुस्थानी पल्टन विप्लव में शामिल हो गई। दूसरी पल्टन सरकार-भक्त बनी रही।

२७४ झांसी की रानी [ ५४ ] विन्ध्यखण्ड की समग्र जनता में सनसनी फैली हुई थी । यहा की जनता ने कभी किसी अत्याचारी का शासन आसानी के साथ नही माना । स्वाभिमान को आघात पहुचा कि व्यक्ति ने सिर उठाया और -हथियार हाथ में लिया । शायद भारत का यही खण्ड एक ऐसा है जहा डाकू को 'बागी' कहते हैं । विन्ध्यखण्ड छोटी-बडी रियासतो में बिखरा हुआ था । सब बडी बडी रियासते कम्पनी सरकार का साथ दिये थी । बानपूर और शाहगढ साधारण राज्य थे । ये राज्य विप्लव मे शामिल हुये । रानी को इन दोनो राजाओ के स्वाधीनता-प्रिय विचारो का पता था । इन दोनो को उन्होने स्वराज्य-स्थापना के सग्राम में भाग लेने के लिये पत्र भेजे । वे दोनो लडने के लिये उद्यत हो गये । बानपूर राज्य के राजा मर्दनसिंह ने अपनी सेना को लेकर सागर जिले में प्रवेश किया और खुरई तहसील तथा नरयावली के परगने पर अधिकार कर लिया । इसके उपरान्त वह झासी जिले के दक्षिण में ललितपूर आया और चन्देरी की ओर बढा । चन्देरी अगरेज़ो के अधिकार मे थी । वहा विप्लव नही हुआ था । वहा के हाकिम परगना को राजा मर्दनसिंह के आने की ख़बर एक चन्देरी निवासी ने दी । वह कचहरी में था । रैडटेपिज्म ( लाल फीता- जाब्ता) का पुजारी था । खबर देने वाले ने कहा, 'साहब बलवा हो गया है । फौज चढी चली आ रही है ।' साहब उपेक्षा के साथ बोला, 'अर्जी लिखवाकर लाओ । ज़बानी नही सुना जायगा ।' थोडी देर में राजा मर्दनसिंह आ गया । उसने बिना किसी अर्जी- दरख्वास्त के चन्देरी को घेर लिया और बिना किसी अर्जी-पुर्जी के चन्देरी में अग्रेजी शासन को खतम कर दिया ।

लक्ष्मीबाई २७५ शाहगढ का राजा बखतबली था । उसने भी विप्लव किया । सागर, दमोह, जवलपूर के जिले में विद्रोहियो की सख्या बहुत बढ गई । दमोह जिले के तो समस्त लोधी क्रान्ति में सम्मिलित हो गये । ये सब शाहगढ के राजा के साथ थे । उससे लडने के लिये सागर से पलटन आई, पर राजा बखतबली ने उसको आसानी से हरा दिया । इस राजा के एक सरदार बोधन दौआ ने गढा कोटा पर चढाई की और उस पर अधिकार कर लिया । राजा मर्दनसिंह चन्देरी को अधिकृत करके सागर लौटा । उसी समय जवलपूर की हिन्दुस्थानी पलटन ने भी विप्लव कर दिया । अङ्गरेजो ने पन्ना राज्य से सहायता मागी । पन्ना के राजा ने अङ्गरेजो की सहायता के लिये अपनी काफी सेना भेजी । पन्ना की सेना ने विप्लवकारियो को दमोह के जिले में पराजित किया और अङ्गरेजो की ओर से दमोह का शासन किया । पन्ना की सेना जबलपूर की विप्लव- कारिणी पलटन से भी लडी और उसको भी हरा दिया । झासी के चारो ओर, दूर और पास, इसी प्रकार की परिस्थिति थी । इस परिस्थिति में रानी लक्ष्मीबाई झासी में एक सुदृढ स्फटिक सी थी । झासी जिले में उन्होने प्रबलता के साथ शान्ति स्थापित की । उनकी दिनचर्या वैसे ही नियम-सयम के साथ चली जा रही थी । उनकी चर्या में केवल दो अन्तर आये । एक तो वे सुबह के नित्य कृत्यो और पूजा ध्यान के उपरान्त राज्य के कर्मचारियो को मिलने और उनकी समस्याओ को सुनने के लिये समय देने लगी, दूसरे ठीक तीन बजे के पश्चात् वे कचहरी करने लगी । बडे और महत्वपूर्ण मुकद्दमे वे स्वय करती थी और तुरन्त निर्णय कर देती थी । कभी कभी दण्ड भी स्वय अपने हाथ से दे देती थी परन्तु केवल उन मामलो में जिनमें किसी ने बालक या स्त्री को सताया हो । वे कचहरी में टोपी लगाकर बैठती थी । भीतर लोहा ऊपर लाल रेशम । टोपी झालरदार-मोतियो और जवाहरो की । कठ मे हीरो की माला । सुडोल और भरे हुये वक्षस्थल पर कचुकी, जो सुनहरी जरीदार

२७६ झाँसी की रानी कमरपेटी से कसी रहती थी। कभी साड़ी और कभी ढीला पैजामा पहिन आती थी। रानी के आसन के पास ही दीवान लक्ष्मणराव कागज, कलम, दावात लिये बैठता था। यद्यपि वह पढ़ा लिखा बहुत कम था, परन्तु वह अपनी निरक्षरता को खूबी के साथ छिपाये रहता था। कभी कभी रानी अपने हाथ से फैसला लिखती थी और कभी बोल देती थी। लक्ष्मणराव लिखने का बहाना करता था और नीचे बैठे हुये मुसद्दियो से लिखवा कर झटपट मुहर लगा देता था ! आये गये की उनको जबरदस्त याद रहती थी। नित्य का आने वाला यदि एक दिन भी चूक जाय तो वह उसके आते ही गैरहाजिरी का कारण पूछती थी, और समय की वे कठोर पाबन्दी करती थी। वर्षा का प्रारम्भ विलम्ब से हुआ, परन्तु प्रचण्डता के साथ। फिर भी उनके कार्यों में शिथिलता न आई-घोडे की सवारी करने से जरूर विवश थी। ऐसी ऋतु में प्रायः डकैती बटमारी बन्द हो जाती है, परन्तु इन्ही दिनो उनको सूचना मिली कि बरवासागर के पास सागरसिंह-कुंवर सागरसिंह-डाकू ने लगातार कई डाके डाले हैं और बरवासागर का थानेदार उसका कुछ नही कर पा रहा है। रानी ने तुरन्त निश्चय किया। मोतीबाई द्वारा खुदाबख्श को बुलवाया। आने पर खुदाबख्श से कहा, 'सागरसिंह का शीघ्र दमन किया जाना चाहिये।' खुदाबख्श ने हाथ जोड कर स्वीकार किया। रानी—'तुम इसी समय २५ सिपाही लेकर वरवामागर जाओ और सागरसिंह को जीवित या मृत ले आओ। उसकी दुष्टता के कारण बरवासागर और बरवासागर का त्रस्त और सन्तप्त हो उठा है। इस काम को कितने दिन में पूरा कर सकोगे ? — एक महीने में ?'

लक्ष्मीबाई २७७ खुदाबख्श — 'श्रीमंत सरकार, जितनी जल्दी हो सकेगा उतनी जल्दी । केवल वर्षा की कठिनाई है।' रानी — 'परन्तु सागरसिंह को वर्षा कोई विघ्न बाधा नही पहुँचाती !' खुदाबख्श — 'सरकार —' रानी — 'कहो, कहो।' खुदाबख्श — सरकार, ये लोग कुछ ग्रामीणो से मिलकर बनियो महाजनो को लूटते हैं और सघन जंगलो में भाग कर छिप जाते हैं।' रानी — 'पानी बरसते घने जगलो मे वे सोते खाते कहा होगे ? यदि तुम उन्हे उनके अड्डो पर ढूढो तो वे जगलो मे नही मिलेगे बल्कि अपने अड्डो पर। कुछ और सिपाही चाहिये हो तो ले जाओ।' खुदाबख्श — 'नही सरकार इतने ही बहुत हैं। यदि अटक पडेगी तो समाचार दूंगा।' खुदाबख्श चला गया । रानी ने अपनी सहेलियो से एकान्त में सलाह की । रानी ने प्रश्न किया, 'खूब बरसते पानी में घोडा दौडा सकोगी ?' मुन्दर ने उत्तर दिया, 'दौडा लूँगी । अभ्यास तो किया है।' 'तुम सुन्दर, और काशीबाई ?' रानी ने पूछा । उन दोनो ने भी हा भरी, परन्तु काशीबाई की हा में कुछ दुर्बलता थी । रानी ने मुस्करा कर कहा, 'काशी हाल मे कुछ अस्वस्थ रही है इसलिये वह महल में ही रहेगी और यहां का काम काज देखेगी। मेरी अनुपस्थिति का समाचार झांसी से बाहर न जाने पावे। खुदाबख्श के बरवासागर पहुँचने के बाद किसो दिन हम लोग यहा से चलेगे।' खुदाबख्श उसी दिन चला गया। सन्ध्या तक वरवासागर पहुँचा । भीगा हुआ और भूखा । परन्तु उसको मानसिक क्लेश कुछ न था । जरा सुस्ता कर भोजन किया। थानेदार से सागरसिंह की गतिविधि पर बात चीत की। खुदाबख्श झांसी से वह ख्याल लेकर आया था कि बरवासागर का थानेदार किंकर्तव्य विमूढ हो गया है, परन्तु उसका यह

भ्रम निकला। सागरसिंह बहुत चालाक और बडा साहसी था। उसके साथ उत्पातियो का काफी बडा गिरोह था। बरवासागर का थाना प्रयास करने पर भी उसके कार्यक्रम में बहुत कम बाधा डाल सकता था। सागरसिंह का घर रावली ग्राम मे, बरवासागर से पाच छह कोस की दूरी पर था, परन्तु वह घर पर रहता बहुत कम था। खुदाबख्श को बरवासागर आकर अपने आसामी की विकटता का पता लगा। और अधिक सिपाही मँगाने मे नाक सी कटती थी। समय केवल एक महीने का था। मोतीबाई की याद आई। अपने जादू से शायद वह कुछ कर डालती। तुरन्त उसके मन ने इस कल्पना को धिक्कारा। दूसरे दिन बादल जरा खुला। भरे भरे सावले घूंघरे बादल आते और चले जाते थे। एकाध फुहार छोड जाते। नदिया नाले भरे, इठलाये हुये और सवेग। खुदाबख्श ने बरवासागर के थानेदार, उसके सिपाहियो और अपने सिपाहियो को लेकर सबेरे ही रावली की ओर दौर कर दी। छिपे लुके, भीगे और कीचड में लतपत, बन्दूको को कपडो से ढके, जेबो में भुने चनें और प्याज भरे. ये लोग दुपहरी में रावली के गेवडे पहुँच गये। खेतो में कोई काम नही हो रहा था, इसलिये मार्ग में किसी से भेट नही हुई। सब लोग गाव मे थे और पानी के खुलने की की मना रहे थे। सागरसिंह भी घर पर था। सागरसिंह का मकान ऊँची टौरिया पर था। सागरसिंह खाना खाने के बाद झपकी ले रहा था। झकोरो हवा चल रही थी और कभी कभी फुहार पड जाती थी, इसलिये खुदाबख्श के दल का शब्द नही सुनाई पडा। जब तक गाव वाले सागरसिंह को सचेत करे कि खुदाबख्श ने सागरसिंह की हवेली घेर ली। उसको फाटक लगवा लेने का अवसर मिल गया। हवेली में उसके कुछ आदमी थे। वे सब जल्दी तैयार हो गये। सागरसिंह को आश्चर्य था कि कुऋतु और कुसमय पर किसने घेरा डालने की हिम्मत की। दीवारो के तीरकशो में होकर उसने परख लिया कि घेरने वालो के साथ तोप नही है और वे केवल घर में घुसकर ही

लक्ष्मीबाई २७६ नुकसान पहुचा सकते हैं । सोचा शाम तक यो ही पडा रहने दूँ और देखता रहूँ, फिर उसको ख्याल आया कि घेरने वाले रानी के सिपाही होगे और इनकी पीठ पर कुछ बन कही और लगा होगा । इसलिये उसने तुरन्त लड डालने की ठानी । वह जानता था कि घेरने वाले अधिक समय तक बन्दूक नही चला सकेंगे और वह स्वय सूखी जगह में बैठकर बहुत अच्छा और बडी देर तक लड सकेगा । हवेली टोरिया की ठीक चोटी पर न थी किन्तु अपराधी से जरा ऊपर । खुदाबख्श ने इस स्थिति से लाभ उठाने का प्रयत्न किया, परन्तु सागरसिंह की पहली वाढ ने ही खुदाबख्श के कई सिपाहियो को घायल कर दिया । खुदाबख्श ने तुरन्त हवेली पर चढ जाने की आज्ञा दी । स्वय आगे हो गया । जब तक सागरसिंह फिर बन्दूको को भरे, खुदाबख्श हवेली पर चढ गया और उसके कई साथी भी । सागरसिंह ने फिर वाढ दागी, परन्तु खाली गई । सागरसिंह ने समझ लिया कि अब गये । उसने तलवार हाथ में ली । खुदाबख्श और उसके साथी आँगन मे कूद पडे । सागरसिंह का मुकाबला न हो सका । खुदाबख्श घायल होकर गिर पडा । और सागरसिंह उसके साथियो को चीरता हुआ बाहर निकल गया । तब खुदाबख्श के अन्य सिपाही फाटक से होकर भीतर आगये । खुदाबख्श और उसके साथियो ने गाव में टिकना ठीक नही समझा । खुदाबख्श बैलगाडी से रात होते बरवासागर आ गया । घाव बहुत गहरे न थे, परन्तु थे कई, खून काफी निकल चुका था । उसकी और उसके घायल सिपाहियो की मरहम पट्टी की गई । रात में खुदाबख्श को बेहोशी रही । सबेरे रानी के पास समाचार भेज दिया गया ।

२८० झाँसी की रानी [ ५५ ] मेघ छाये हुये थे। हवा सन्न थी। पानी रिमझिम रिमझिम बरस रहा था। महल के ऊपरी खण्ड के हवाई कमरे में रानी आंखे मूँदे हुये मोतीबाई का भजन सुन रही थी। मुन्दर जमुहा रही थी। सुन्दर बैठे बैठे सावधानी के साथ निद्रामग्न हो गई थी। काशी सचेत थी। भजन की समाप्ति पर रानी का ध्यान टूटा, मुन्दर की जमुहाई हटी। परन्तु सुन्दर की निद्रा-समाधि भग्न न हुई। रानी ने हँसकर कहा, 'सुन्दर, देख यह भालू कहा से आ गया है? सुन्दर हडबड़ा गई। भौंचक्की होकर बोली, 'कहां है बाईसाहब?' 'ढूंढ तो पता लग जायगा', रानी ने कहा, 'साधारण भालू तो है नही।' सुन्दर लज्जित हो गई। हाथ जोड़कर बोली, 'सरकार दिन भर की थकी थी, इसलिये अभी अभी थोडी सी नीद आ गई।' काशीबाई—'सरकार, यह आज दिन भर चक्की चलाती रही है, इसलिये बहुत थक गई।' सुन्दर—'नही काशीबाई, चक्की नही चलाई तो और काम तो बहुत किया है।' मुन्दर—तुम अकेली ने !' उसी समय पहरे वाले ने निवेदन किया, 'बरवासागर से एक सिपाही आवश्यक समाचार लाया है।' रानी ने दूसरे कमरे में उसको बुलवाया। उनका आदेश था कि आवश्यक समाचार के लिये समय-कुसमय न देखा जावे और उनको तुरन्त सूचना दी जाया करे।' रानी सहेलियो के साथ दूसरे कमरे में गई । समाचार-वाहक ने कहा, 'सरकार, रावली के बागियो से सरदार खुदाबख्श की लडाई हुई। वे घायल हो गये हैं। सात सिपाही भी घायल

लक्ष्मीबाई २६१ हुये हैं। सरदार को तलवार के घाव लगे हैं और सिपाहियो को गोलियो के। भगवान की कृपा से मरे कोई नही हैं। और, न किसी के लिये इस तरह का भय है। सागरसिंह भाग गया है। लड़ाई रावली में सागरसिंह के घर पर हुई थी।' मोती का चहरा पीला पड गया। रानी ने पूछा, 'रावली बरवासागर से कितनी दूर है?' उसने उत्तर दिया, 'पाच-छ कोस है सरकार। जासूस ने पता दिया कि सागरसिंह अपने घर है। सरदार ने धावा बोल दिया।' रानी—'खुदाबख्श को कहा चोट आई है और अब क्या हाल है? लडाई को कितने दिन हो गये?' उत्तर—'लडाई को आज चौथा दिन है। घाव बाहो और जांघो में हैं सिर पर भी एक वार है। अच्छे हो रहे हैं। सिपाहियो के घाव अलबत्ता ज्यादा गहरे हैं।' रानी—'तुमको समाचार लाने मे इतना विलम्ब क्यो हुआ?' उत्तर—'बेतवा इतनी चढी हुई है कि नाव नही लग सकी, सरकार आज दोपहर कुछ उतरी तब आ पाया हूँ।' रानी—'प्रबन्ध करती हू। तुम जाओ।' रानी अपने कक्ष में लौट आईं। रानी ने कहा, 'कल बरवासागर चलना चाहिये।' काशी बोली, 'सरकार न जाये। कुछ ठीक नही किस समय जोर से पानी बरस पडे, नदी चढ आवे। उस दिन जब आपने बरवासागर जाने का निश्चय किया, में कुछ न कह सकी थी, परन्तु आज तो मैं हठ करुँगी।' रानी सोचने लगी। उन्होने मोतीबाई की उदासी देख ली, और पहिचान ली। रानी—'तुम ठीक कहती हो काशी। परन्तु स्थिति की मांग हम पर प्रबल है। यदि कल पानी न बरसा तो अच्छे घोड़ो पर चल देंगे। हाथी

२८२ झांसी की रानी भी जा सकता है, परन्तु मै इस समय प्रदर्शन बचाना चाहती हूँ, और वह सवारी बहुत धीमी भी है ।' मोतीबाई—'सरकार को कुछ घुडसवार साथ में ले लेने चाहिये ।' रानी—'लूंगी । दीवान रघुनाथसिंह को सबेरे सूचना दे देना ।' काशीबाई—'मै भी चलूंगी ।' रानी—'चलना, मैं क्या रोकती हूँ ?' मोतीबाई--'आज्ञा हो तो मै भी चलूं ।' रानी--'नाव न लगी तो घोडे पर नदी पार कर लेगी ?' मोतीबाई--'सरकार की सेवा में रहते, मुझको आग-पानी, किसी का भी डर नही रहा ।' रानी ने स्वीकृत किया । रात में पानी थोडा थोडा बरसता रहा । सबेरे बादल खुला सा दिखलाई दिया । रानी सहेलियो समेत बरवासागर की ओर चल दी । पच्चीस घुडसवार साथ में ले लिये । दीवान रघुनाथसिंह सङ्ग में । शीघ्र ही घाट पर यह दस्ता पहुच गया । देखे तो बेतवा दोनो पाट दाबे वेग से चली जा रही है । ऊपर ज्यादा पानी बरस गया था, इसलिये बेतवा बेतहाशा इठला गई । हवा, आँधी के रूप में चल रही थी । मल्लाहो के लिये नाव का लगाना असम्भव था । अनेक घुडसवारो के दिल टूटने लगे । उस पार की पहाडियो का लहरियादार सिलसिला हरियाली से ढका हुआ था । बादल के सफेद धूनरे टुकडे पहाडियो की चोटी और हरियाली को चूमने के लिये नभ से उतर उतर कर टकराते चले जा रहे थे । बेतवा का शोर आँधी का साथ पाकर तुमुल हो उठा । रानी ने मुडकर मोतीबाई की ओर देखा । वह उस पार की पहाडियो से टकराते हुये मेघ खण्डो पर दृष्टि जमाये थी । रानी ने आज्ञा दी, 'कूद पड़ो ।' और वे सबसे आगे घोडे पर पानी में धस गईं ।

लक्ष्मीबाई २८३ फिर क्या था, उनको सहेलियां और सब घुड़सवार धार को चीरते दिखलाई पड़ने लगे । रानी सबसे आगे । बेतवा की धार पुञ्ज के ऊपर पुञ्ज सी दिखलाई पड़ती थी । क्रम अभंग और अनन्त सा । जब एक क्षण में ही अनेक बार एक जलपुञ्ज दूसरे से सघर्ष खाता और एक, दूसरे से, आगे निकल जाने का अनवरत, अथक, अटूट प्रयास करता तब इतना फेनिल हो जाता कि सारी नदी में फेन ही फेन दिखलाई पड़ता था । झाग की इतनी बड़ी निरन्तर बहती और उत्पन्न होती हुई राशियां आड़े आ जाती थीं कि घुड़सवारों को सामने का किनारा नही दिखलाई पड़ पाता था । लहरो के एक पल्लड़ को चीरा, उस पर के झाग को बेधा कि दूसरा सामने । शब्दमय प्रवाह की निरर्थक भाषा मानो बार बार कहती थी बचो, बचो । सामने की उथल पुथल से आगे बढ़े कि बगल से थपेड़ पड़ी । घोड़े आँखें फाड़े नथनो से जल फुफकारते बढ़ रहे थे । वे अपना और अपने सवार का संकट समझ रहे थे । सवार के पैर घोड़े से चिमटे हुये और उनके पैरो के नीचे घोड़े की निस्तब्ध टाप । और टाप के नीचे ? न जाने कितनी गहराई । सवारो के चारो ओर भँवरे पड़ पड़ जा रही थी । एक भंवर बनी, पार की, कि दूसरी तुरन्त मौजूद । परन्तु अपनी रानी और उनकी सहेलियो को आगे देखकर किस सिपाही के मनमें अधिक समय तक भय ठहर सकता था ? रानी के घोड़े का केवल सिर ऊपर, शेष भाग पानी और झाग में । रानी की कमर तक झाग, पानी और धार के साथ बहकर आया हुआ झाड़ी-झंखाड़ । धार की बूँदो की झड़ी उचट उचट कर आखो में, बालो पर और सारे शरीर पर बरस रही थी । जब कभी सिपाहियो और सहेलियो को उत्साह देना होता तो हँस हँसकर शाबाशी देती—मानो प्रचण्ड बेतवा की मलिन अञ्जलि में मुक्ता बरसा दिये हो । घूमरे बादलो के आगे एक ओर बगुलो की पात निकल गई । मानो पहाड़ियो और पहाड़ियो से मिलने वाले बादलो को सफेद कोर लगा दी हो ।

२८४ झांसी की रानी पहाडो की कन्दराओ में घुसे हुये, उनको आच्छादित किये हुये वादलो में होकर वह वकुलावलि छिपती हुई सी मालूम पडी और फिर तितर-वितर हुई । जैसे हिलती हुई सावली सलोनी चादर में टके हुये सितारे । पहाड पर बडे बडे और सघन पेड । गहरे हरे श्यामल । बगुले एक पेड पर जा बैठे मानो वनदेवी ने प्रभा छिटका दी हो । उस विषम धार के पार थोडी देर में किनारा दिखलाई दिया । रानी फिर हँसी । बगुलो की सफेदी से रानी के दातो ने तुरन्त होड लगा दी । चिल्लाकर बोली, 'देखो किनारा आ गया । पडाव मार लिया ।' थोडी देर में पूरा दस्ता नदी पार हो गया । सब भीग गये थे परन्तु पीठ पर कसे ढके हुये हथियार लगभग सूखे थे । घोडे ठिठुर गये थे । घाट पर कपडे सुखाने, बदलने में और घोडो को आराम देने में थोडा सा समय लगा । फिर दौड लगी और रानी बरुआसागर के किले में दोपहर के करीब पहुँच गईं । बरवासागर का किला विशाल झील के ठीक ऊपर है । झील में बरवा नाम का बड़ा नाला पडता है । झील को विशालता इस नाले ने ही दी है । घायल सिपाही और खुदाबख्श इसी किले में पडे हुये थे । रानी ने तुरन्त इन सबको देखा । किसी के सिर पर हाथ फेरा, किसी की मरहमपट्टी की देखभाल की । सिपाही अपनी रानी के स्नेह को पाकर मुग्ध और गद्गद् हो गये । फिर खुदाबख्श के पास पहुँची । खुदाबख्श ने चारपाई से उठने का प्रयत्न किया, परन्तु न उठ सका । रानी को देखते ही उसके आंसू आ गये । चरण स्पर्श करने की कोशिश की ।

लक्ष्मीबाई २८५ रानी ने फिर सिर पर हाथ फेरा। चौकी पर बैठ गई। सहेलिया खडी थी। मोतीबाई सहेलियो के पीछे से खुदाबख्श को एकटक देख रही थी। खुदाबख्श ने उसको देख लिया, परन्तु आखे उसकी मोतीबाई की ओर न थी। खुदाबख्श ने रानी को सागरसिंह की लडाई का व्योरेवार हाल सुनाया। रानी—'कुछ पता चला सागरसिंह अब कहा चला गया है?' खुदाबख्श—'सरकार गाव वाले पता नही बतलाते। वे ही उसको शरण, भोजन इत्यादि सब देते हैं। इतना तो भी मालूम हो गया है कि वह पडोस के जगल मे है।' रानी—'गाव वाले डाकुओ से डरते हैं। उनके पास निर्भय होने का कोई साधन नही है। अग्रेजी राज्य ने पञ्चायतो का सर्वनाश कर दिया है इसलिये गावो में परस्पर सहायता की प्रणाली उठसी गई है और उसने डाकुओ को सहायता देने का रूप पकड़ लिया है। देखू गी। तुम चिन्ता मत करो।' खुदाबख्श—'अब सरकार स्वय यहा आगई हैं। मुझको किस बात की चिन्ता? घाव लगभग अच्छे होगये हैं। एकाध दिन में ठीक हुआ जाता हूँ। फिर देखता हूँ सागरसिंह को।' रानी ने उसको विश्राम करने का हठ किया। मोतीबाई को खुदाबख्श के पास छोडकर, किले के महल वाले हिस्से में चली गईं। स्नान ध्यान में लग गईं। अब मोतीबाई की आखे तरल हुई। रुद्ध कठ मुखरित होने के लिये आकुल हो गया। खुदाबख्श ने देख लिया। बोला, 'यह क्या ! आखो में आसू ! आपको तो हर्ष और गर्व से हँसना चाहिये था। आपका कैदी—नही आपकी सरकार का सिपाही अपने मालिक के लिये कुछ तो कर सका।' मोतीबाई ने आख पोछ कर कहा, 'क्या दर्द बहुत है।'

२८६ झांसी की रानी खुदाबख्श ने जवाब दिया, 'जरा भी नही। मालिक ने हाथ क्या फेरा, अमृत लुढका दिया । सच कहता हूं, अभी उनकी आज्ञा हो तो घोडे पर बैठकर उस अत्याचारी से दो हाथ करूं ।' फिर उसने करवट लेने की कोशिश की । जरा कष्ट हुआ । एक आह को दबाकर बोला, 'जान पडता है कि श्रीमन्त सरकार मेरे स्वस्थ होने तक नही ठहरेंगी ।' मोतीबाई ने सतृष्ण नेत्रो से कहा, 'मै भी उनके साथ जाऊँगी ।' खुदाबख्श ने आंख मीच ली । बोला, 'आप भी जाओगी ।' 'क्यो ? मुझे क्या हुआ ? उनकी छाया में आदमी आधी बन जाता है, तो औरत क्या आदमी भी नही बन सकती ।' मोतीबाई को रत्नावली नाटक में रंगमंच पर रत्नावली का अभिनय करते देखा था । स्मरण हो आया । एक साथ कोमलता और प्रसूनो के चित्र आंखो में घूम गये । खुदाबख्श ने एक निश्वास लिया । आंखे मूंदे ही बोला, 'मेरी मरहम-पट्टी के लिये रह जाना ।' मोतीबाई ने सस्नेह कहा, 'सरकार से कह देना । मैं खुशी से रह जाऊँगी ।' खुदाबख्श ने आंख खोली । भ्रुकुटि भंग की । जरा रुखाई के साथ बोला, 'श्रीमन्त सरकार से भिक्षा मागूंगा कि रत्नावली को सेवा टहल के लिये दे दीजिये ।' मोतीबाई ने उसकी उपेक्षा की । कहा, 'रत्नावली कौन ?' खुदाबख्श को आश्चर्य हुआ । बोला, 'क्या मैंने रत्नावली कहा ?' मोतीबाई हंसी । उसकी हंसी में चमत्कार था परन्तु खुदाबख्श पर कोई प्रभाव नही पडा । मोतीबाई—'रत्नावली ही तो कहा। क्या कोई सपना देख रहे थे ?' खुदाबख्श—'वह सपना था । अब मीठा जागरण सामने है ।'

लक्ष्मीबाई २८७ मोतीबाई ने खुदाबख्श की आखो में स्नेह को पकडने का प्रयत्न किया। बोली, 'तब मैं खुद तो उनसे नही कह सकूँगी। वह सोचेगी, मैं बहुत तुच्ची हूँ।' 'जी हा,' खुदाबख्श ने जरा सा सिर उठा कर कहा, 'आप चाहती हैं वह आपको बहादुर समझे और मुझे तुच्चा और निकम्मा।' 'मैंने यह तो नही कहा,' मोतीबाई बोली, 'खुदा करे आप जल्दी अच्छे हो जावें', और वह वहा से चली गई। ऊपर की छत को घेरे हुये किले की दीवार थी। दीवार में मुडेरदार खिडकी। उसमे होकर मोतीबाई झील की लहरो को परखने लगी-और रोने लगी। जब उसने रत्नावली का अभिनय किया था इतनी नही रोई थी। नियन्त्रण करके वह अपने काम में लग गई।

२८८ झाँसी की रानी [ ५६ ] सन्ध्या के पहले बरवासागर के मुखिया और पञ्च रानी से मिलने के लिये आये । नज़र न्योछावर हुई । रानी ने सबसे कुशलक्षेम की वार्ता की । जब एकान्त पाया थानेदार ने रानी को सागरसिंह के विषय में सूचना दी । मालूम हुआ कि खिसनी के जङ्गल में आश्रय पाये हुये हैं । खिसनी का जङ्गल बरवासागर से १२ मील था । थानेदार को उन्होने आदेश दिया । 'सवेरे आठ बजे तैयार रहना किसी को मालूम न होने पावे ।' सवेरे सब तैयार हो गये । ठीक समय पर उन्होने मोतीबाई को बुलाकर कहा, 'तुम यही रहो । खुदाबख्श की मरहम पट्टी और देख भाल करना ।' मोतीबाई ने पलके नीची की । बोली, 'मै तो सरकार की सेवा में चलूगी । क्या किसी ने प्रार्थना की है ?' 'नही, मैं ही कह रही हू,' रानी ने उत्तर दिया । मोतीबाई ने चलने का हठ किया । उनकी अन्य सहेलियो ने भी अनुरोध किया । रानी मान गई । रानी अपनी और बरवासागर के थाने की टुकडी को लिये हुये चल दी । उन्होने इस टुकडी के दो भाग किये । एक को दीवान रघुनाथसिंह की अधीनता में रावली की ओर रवाना किया और दूसरी को स्वय लेकर खिसनी के जङ्गल का ओर चलदी । दीवान रघुनाथसिंह ने सागरसिंह की हवेली घेर ली । एक गाव वाले से कहलवा भेजा, 'हथियार डालकर मेरे पास आ जाओ । रानी साहब कुछ रियायत कर देंगी, नही तो हवेली की ईंट से ईंट बजा दूँगा ।' गाव वाले ने कहा, 'कुंवर सागरसिंह हवेली में नही है ।' रघुनाथसिंह—'तब तो हवेली को पटक देने में और भी सुभीता रहेगा ।'