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झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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लक्ष्मीबाई २६१ हुये हैं। सरदार को तलवार के घाव लगे हैं और सिपाहियो को गोलियो के। भगवान की कृपा से मरे कोई नही हैं। और, न किसी के लिये इस तरह का भय है। सागरसिंह भाग गया है। लड़ाई रावली में सागरसिंह के घर पर हुई थी।' मोती का चहरा पीला पड गया। रानी ने पूछा, 'रावली बरवासागर से कितनी दूर है?' उसने उत्तर दिया, 'पाच-छ कोस है सरकार। जासूस ने पता दिया कि सागरसिंह अपने घर है। सरदार ने धावा बोल दिया।' रानी—'खुदाबख्श को कहा चोट आई है और अब क्या हाल है? लडाई को कितने दिन हो गये?' उत्तर—'लडाई को आज चौथा दिन है। घाव बाहो और जांघो में हैं सिर पर भी एक वार है। अच्छे हो रहे हैं। सिपाहियो के घाव अलबत्ता ज्यादा गहरे हैं।' रानी—'तुमको समाचार लाने मे इतना विलम्ब क्यो हुआ?' उत्तर—'बेतवा इतनी चढी हुई है कि नाव नही लग सकी, सरकार आज दोपहर कुछ उतरी तब आ पाया हूँ।' रानी—'प्रबन्ध करती हू। तुम जाओ।' रानी अपने कक्ष में लौट आईं। रानी ने कहा, 'कल बरवासागर चलना चाहिये।' काशी बोली, 'सरकार न जाये। कुछ ठीक नही किस समय जोर से पानी बरस पडे, नदी चढ आवे। उस दिन जब आपने बरवासागर जाने का निश्चय किया, में कुछ न कह सकी थी, परन्तु आज तो मैं हठ करुँगी।' रानी सोचने लगी। उन्होने मोतीबाई की उदासी देख ली, और पहिचान ली। रानी—'तुम ठीक कहती हो काशी। परन्तु स्थिति की मांग हम पर प्रबल है। यदि कल पानी न बरसा तो अच्छे घोड़ो पर चल देंगे। हाथी