झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)
Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography
वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२८० झाँसी की रानी [ ५५ ] मेघ छाये हुये थे। हवा सन्न थी। पानी रिमझिम रिमझिम बरस रहा था। महल के ऊपरी खण्ड के हवाई कमरे में रानी आंखे मूँदे हुये मोतीबाई का भजन सुन रही थी। मुन्दर जमुहा रही थी। सुन्दर बैठे बैठे सावधानी के साथ निद्रामग्न हो गई थी। काशी सचेत थी। भजन की समाप्ति पर रानी का ध्यान टूटा, मुन्दर की जमुहाई हटी। परन्तु सुन्दर की निद्रा-समाधि भग्न न हुई। रानी ने हँसकर कहा, 'सुन्दर, देख यह भालू कहा से आ गया है? सुन्दर हडबड़ा गई। भौंचक्की होकर बोली, 'कहां है बाईसाहब?' 'ढूंढ तो पता लग जायगा', रानी ने कहा, 'साधारण भालू तो है नही।' सुन्दर लज्जित हो गई। हाथ जोड़कर बोली, 'सरकार दिन भर की थकी थी, इसलिये अभी अभी थोडी सी नीद आ गई।' काशीबाई—'सरकार, यह आज दिन भर चक्की चलाती रही है, इसलिये बहुत थक गई।' सुन्दर—'नही काशीबाई, चक्की नही चलाई तो और काम तो बहुत किया है।' मुन्दर—तुम अकेली ने !' उसी समय पहरे वाले ने निवेदन किया, 'बरवासागर से एक सिपाही आवश्यक समाचार लाया है।' रानी ने दूसरे कमरे में उसको बुलवाया। उनका आदेश था कि आवश्यक समाचार के लिये समय-कुसमय न देखा जावे और उनको तुरन्त सूचना दी जाया करे।' रानी सहेलियो के साथ दूसरे कमरे में गई । समाचार-वाहक ने कहा, 'सरकार, रावली के बागियो से सरदार खुदाबख्श की लडाई हुई। वे घायल हो गये हैं। सात सिपाही भी घायल