भारतकोश
झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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लक्ष्मीबाई २७६ नुकसान पहुचा सकते हैं । सोचा शाम तक यो ही पडा रहने दूँ और देखता रहूँ, फिर उसको ख्याल आया कि घेरने वाले रानी के सिपाही होगे और इनकी पीठ पर कुछ बन कही और लगा होगा । इसलिये उसने तुरन्त लड डालने की ठानी । वह जानता था कि घेरने वाले अधिक समय तक बन्दूक नही चला सकेंगे और वह स्वय सूखी जगह में बैठकर बहुत अच्छा और बडी देर तक लड सकेगा । हवेली टोरिया की ठीक चोटी पर न थी किन्तु अपराधी से जरा ऊपर । खुदाबख्श ने इस स्थिति से लाभ उठाने का प्रयत्न किया, परन्तु सागरसिंह की पहली वाढ ने ही खुदाबख्श के कई सिपाहियो को घायल कर दिया । खुदाबख्श ने तुरन्त हवेली पर चढ जाने की आज्ञा दी । स्वय आगे हो गया । जब तक सागरसिंह फिर बन्दूको को भरे, खुदाबख्श हवेली पर चढ गया और उसके कई साथी भी । सागरसिंह ने फिर वाढ दागी, परन्तु खाली गई । सागरसिंह ने समझ लिया कि अब गये । उसने तलवार हाथ में ली । खुदाबख्श और उसके साथी आँगन मे कूद पडे । सागरसिंह का मुकाबला न हो सका । खुदाबख्श घायल होकर गिर पडा । और सागरसिंह उसके साथियो को चीरता हुआ बाहर निकल गया । तब खुदाबख्श के अन्य सिपाही फाटक से होकर भीतर आगये । खुदाबख्श और उसके साथियो ने गाव में टिकना ठीक नही समझा । खुदाबख्श बैलगाडी से रात होते बरवासागर आ गया । घाव बहुत गहरे न थे, परन्तु थे कई, खून काफी निकल चुका था । उसकी और उसके घायल सिपाहियो की मरहम पट्टी की गई । रात में खुदाबख्श को बेहोशी रही । सबेरे रानी के पास समाचार भेज दिया गया ।