झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)
Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography
वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभ्रम निकला। सागरसिंह बहुत चालाक और बडा साहसी था। उसके साथ उत्पातियो का काफी बडा गिरोह था। बरवासागर का थाना प्रयास करने पर भी उसके कार्यक्रम में बहुत कम बाधा डाल सकता था। सागरसिंह का घर रावली ग्राम मे, बरवासागर से पाच छह कोस की दूरी पर था, परन्तु वह घर पर रहता बहुत कम था। खुदाबख्श को बरवासागर आकर अपने आसामी की विकटता का पता लगा। और अधिक सिपाही मँगाने मे नाक सी कटती थी। समय केवल एक महीने का था। मोतीबाई की याद आई। अपने जादू से शायद वह कुछ कर डालती। तुरन्त उसके मन ने इस कल्पना को धिक्कारा। दूसरे दिन बादल जरा खुला। भरे भरे सावले घूंघरे बादल आते और चले जाते थे। एकाध फुहार छोड जाते। नदिया नाले भरे, इठलाये हुये और सवेग। खुदाबख्श ने बरवासागर के थानेदार, उसके सिपाहियो और अपने सिपाहियो को लेकर सबेरे ही रावली की ओर दौर कर दी। छिपे लुके, भीगे और कीचड में लतपत, बन्दूको को कपडो से ढके, जेबो में भुने चनें और प्याज भरे. ये लोग दुपहरी में रावली के गेवडे पहुँच गये। खेतो में कोई काम नही हो रहा था, इसलिये मार्ग में किसी से भेट नही हुई। सब लोग गाव मे थे और पानी के खुलने की की मना रहे थे। सागरसिंह भी घर पर था। सागरसिंह का मकान ऊँची टौरिया पर था। सागरसिंह खाना खाने के बाद झपकी ले रहा था। झकोरो हवा चल रही थी और कभी कभी फुहार पड जाती थी, इसलिये खुदाबख्श के दल का शब्द नही सुनाई पडा। जब तक गाव वाले सागरसिंह को सचेत करे कि खुदाबख्श ने सागरसिंह की हवेली घेर ली। उसको फाटक लगवा लेने का अवसर मिल गया। हवेली में उसके कुछ आदमी थे। वे सब जल्दी तैयार हो गये। सागरसिंह को आश्चर्य था कि कुऋतु और कुसमय पर किसने घेरा डालने की हिम्मत की। दीवारो के तीरकशो में होकर उसने परख लिया कि घेरने वालो के साथ तोप नही है और वे केवल घर में घुसकर ही