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झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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लक्ष्मीबाई २७७ खुदाबख्श — 'श्रीमंत सरकार, जितनी जल्दी हो सकेगा उतनी जल्दी । केवल वर्षा की कठिनाई है।' रानी — 'परन्तु सागरसिंह को वर्षा कोई विघ्न बाधा नही पहुँचाती !' खुदाबख्श — 'सरकार —' रानी — 'कहो, कहो।' खुदाबख्श — सरकार, ये लोग कुछ ग्रामीणो से मिलकर बनियो महाजनो को लूटते हैं और सघन जंगलो में भाग कर छिप जाते हैं।' रानी — 'पानी बरसते घने जगलो मे वे सोते खाते कहा होगे ? यदि तुम उन्हे उनके अड्डो पर ढूढो तो वे जगलो मे नही मिलेगे बल्कि अपने अड्डो पर। कुछ और सिपाही चाहिये हो तो ले जाओ।' खुदाबख्श — 'नही सरकार इतने ही बहुत हैं। यदि अटक पडेगी तो समाचार दूंगा।' खुदाबख्श चला गया । रानी ने अपनी सहेलियो से एकान्त में सलाह की । रानी ने प्रश्न किया, 'खूब बरसते पानी में घोडा दौडा सकोगी ?' मुन्दर ने उत्तर दिया, 'दौडा लूँगी । अभ्यास तो किया है।' 'तुम सुन्दर, और काशीबाई ?' रानी ने पूछा । उन दोनो ने भी हा भरी, परन्तु काशीबाई की हा में कुछ दुर्बलता थी । रानी ने मुस्करा कर कहा, 'काशी हाल मे कुछ अस्वस्थ रही है इसलिये वह महल में ही रहेगी और यहां का काम काज देखेगी। मेरी अनुपस्थिति का समाचार झांसी से बाहर न जाने पावे। खुदाबख्श के बरवासागर पहुँचने के बाद किसो दिन हम लोग यहा से चलेगे।' खुदाबख्श उसी दिन चला गया। सन्ध्या तक वरवासागर पहुँचा । भीगा हुआ और भूखा । परन्तु उसको मानसिक क्लेश कुछ न था । जरा सुस्ता कर भोजन किया। थानेदार से सागरसिंह की गतिविधि पर बात चीत की। खुदाबख्श झांसी से वह ख्याल लेकर आया था कि बरवासागर का थानेदार किंकर्तव्य विमूढ हो गया है, परन्तु उसका यह