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झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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पृष्ठ 287

२७६ झाँसी की रानी कमरपेटी से कसी रहती थी। कभी साड़ी और कभी ढीला पैजामा पहिन आती थी। रानी के आसन के पास ही दीवान लक्ष्मणराव कागज, कलम, दावात लिये बैठता था। यद्यपि वह पढ़ा लिखा बहुत कम था, परन्तु वह अपनी निरक्षरता को खूबी के साथ छिपाये रहता था। कभी कभी रानी अपने हाथ से फैसला लिखती थी और कभी बोल देती थी। लक्ष्मणराव लिखने का बहाना करता था और नीचे बैठे हुये मुसद्दियो से लिखवा कर झटपट मुहर लगा देता था ! आये गये की उनको जबरदस्त याद रहती थी। नित्य का आने वाला यदि एक दिन भी चूक जाय तो वह उसके आते ही गैरहाजिरी का कारण पूछती थी, और समय की वे कठोर पाबन्दी करती थी। वर्षा का प्रारम्भ विलम्ब से हुआ, परन्तु प्रचण्डता के साथ। फिर भी उनके कार्यों में शिथिलता न आई-घोडे की सवारी करने से जरूर विवश थी। ऐसी ऋतु में प्रायः डकैती बटमारी बन्द हो जाती है, परन्तु इन्ही दिनो उनको सूचना मिली कि बरवासागर के पास सागरसिंह-कुंवर सागरसिंह-डाकू ने लगातार कई डाके डाले हैं और बरवासागर का थानेदार उसका कुछ नही कर पा रहा है। रानी ने तुरन्त निश्चय किया। मोतीबाई द्वारा खुदाबख्श को बुलवाया। आने पर खुदाबख्श से कहा, 'सागरसिंह का शीघ्र दमन किया जाना चाहिये।' खुदाबख्श ने हाथ जोड कर स्वीकार किया। रानी—'तुम इसी समय २५ सिपाही लेकर वरवामागर जाओ और सागरसिंह को जीवित या मृत ले आओ। उसकी दुष्टता के कारण बरवासागर और बरवासागर का त्रस्त और सन्तप्त हो उठा है। इस काम को कितने दिन में पूरा कर सकोगे ? — एक महीने में ?'