झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)
Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography
वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा
२७६ झाँसी की रानी कमरपेटी से कसी रहती थी। कभी साड़ी और कभी ढीला पैजामा पहिन आती थी। रानी के आसन के पास ही दीवान लक्ष्मणराव कागज, कलम, दावात लिये बैठता था। यद्यपि वह पढ़ा लिखा बहुत कम था, परन्तु वह अपनी निरक्षरता को खूबी के साथ छिपाये रहता था। कभी कभी रानी अपने हाथ से फैसला लिखती थी और कभी बोल देती थी। लक्ष्मणराव लिखने का बहाना करता था और नीचे बैठे हुये मुसद्दियो से लिखवा कर झटपट मुहर लगा देता था ! आये गये की उनको जबरदस्त याद रहती थी। नित्य का आने वाला यदि एक दिन भी चूक जाय तो वह उसके आते ही गैरहाजिरी का कारण पूछती थी, और समय की वे कठोर पाबन्दी करती थी। वर्षा का प्रारम्भ विलम्ब से हुआ, परन्तु प्रचण्डता के साथ। फिर भी उनके कार्यों में शिथिलता न आई-घोडे की सवारी करने से जरूर विवश थी। ऐसी ऋतु में प्रायः डकैती बटमारी बन्द हो जाती है, परन्तु इन्ही दिनो उनको सूचना मिली कि बरवासागर के पास सागरसिंह-कुंवर सागरसिंह-डाकू ने लगातार कई डाके डाले हैं और बरवासागर का थानेदार उसका कुछ नही कर पा रहा है। रानी ने तुरन्त निश्चय किया। मोतीबाई द्वारा खुदाबख्श को बुलवाया। आने पर खुदाबख्श से कहा, 'सागरसिंह का शीघ्र दमन किया जाना चाहिये।' खुदाबख्श ने हाथ जोड कर स्वीकार किया। रानी—'तुम इसी समय २५ सिपाही लेकर वरवामागर जाओ और सागरसिंह को जीवित या मृत ले आओ। उसकी दुष्टता के कारण बरवासागर और बरवासागर का त्रस्त और सन्तप्त हो उठा है। इस काम को कितने दिन में पूरा कर सकोगे ? — एक महीने में ?'
लक्ष्मीबाई २७७ खुदाबख्श — 'श्रीमंत सरकार, जितनी जल्दी हो सकेगा उतनी जल्दी । केवल वर्षा की कठिनाई है।' रानी — 'परन्तु सागरसिंह को वर्षा कोई विघ्न बाधा नही पहुँचाती !' खुदाबख्श — 'सरकार —' रानी — 'कहो, कहो।' खुदाबख्श — सरकार, ये लोग कुछ ग्रामीणो से मिलकर बनियो महाजनो को लूटते हैं और सघन जंगलो में भाग कर छिप जाते हैं।' रानी — 'पानी बरसते घने जगलो मे वे सोते खाते कहा होगे ? यदि तुम उन्हे उनके अड्डो पर ढूढो तो वे जगलो मे नही मिलेगे बल्कि अपने अड्डो पर। कुछ और सिपाही चाहिये हो तो ले जाओ।' खुदाबख्श — 'नही सरकार इतने ही बहुत हैं। यदि अटक पडेगी तो समाचार दूंगा।' खुदाबख्श चला गया । रानी ने अपनी सहेलियो से एकान्त में सलाह की । रानी ने प्रश्न किया, 'खूब बरसते पानी में घोडा दौडा सकोगी ?' मुन्दर ने उत्तर दिया, 'दौडा लूँगी । अभ्यास तो किया है।' 'तुम सुन्दर, और काशीबाई ?' रानी ने पूछा । उन दोनो ने भी हा भरी, परन्तु काशीबाई की हा में कुछ दुर्बलता थी । रानी ने मुस्करा कर कहा, 'काशी हाल मे कुछ अस्वस्थ रही है इसलिये वह महल में ही रहेगी और यहां का काम काज देखेगी। मेरी अनुपस्थिति का समाचार झांसी से बाहर न जाने पावे। खुदाबख्श के बरवासागर पहुँचने के बाद किसो दिन हम लोग यहा से चलेगे।' खुदाबख्श उसी दिन चला गया। सन्ध्या तक वरवासागर पहुँचा । भीगा हुआ और भूखा । परन्तु उसको मानसिक क्लेश कुछ न था । जरा सुस्ता कर भोजन किया। थानेदार से सागरसिंह की गतिविधि पर बात चीत की। खुदाबख्श झांसी से वह ख्याल लेकर आया था कि बरवासागर का थानेदार किंकर्तव्य विमूढ हो गया है, परन्तु उसका यह
भ्रम निकला। सागरसिंह बहुत चालाक और बडा साहसी था। उसके साथ उत्पातियो का काफी बडा गिरोह था। बरवासागर का थाना प्रयास करने पर भी उसके कार्यक्रम में बहुत कम बाधा डाल सकता था। सागरसिंह का घर रावली ग्राम मे, बरवासागर से पाच छह कोस की दूरी पर था, परन्तु वह घर पर रहता बहुत कम था। खुदाबख्श को बरवासागर आकर अपने आसामी की विकटता का पता लगा। और अधिक सिपाही मँगाने मे नाक सी कटती थी। समय केवल एक महीने का था। मोतीबाई की याद आई। अपने जादू से शायद वह कुछ कर डालती। तुरन्त उसके मन ने इस कल्पना को धिक्कारा। दूसरे दिन बादल जरा खुला। भरे भरे सावले घूंघरे बादल आते और चले जाते थे। एकाध फुहार छोड जाते। नदिया नाले भरे, इठलाये हुये और सवेग। खुदाबख्श ने बरवासागर के थानेदार, उसके सिपाहियो और अपने सिपाहियो को लेकर सबेरे ही रावली की ओर दौर कर दी। छिपे लुके, भीगे और कीचड में लतपत, बन्दूको को कपडो से ढके, जेबो में भुने चनें और प्याज भरे. ये लोग दुपहरी में रावली के गेवडे पहुँच गये। खेतो में कोई काम नही हो रहा था, इसलिये मार्ग में किसी से भेट नही हुई। सब लोग गाव मे थे और पानी के खुलने की की मना रहे थे। सागरसिंह भी घर पर था। सागरसिंह का मकान ऊँची टौरिया पर था। सागरसिंह खाना खाने के बाद झपकी ले रहा था। झकोरो हवा चल रही थी और कभी कभी फुहार पड जाती थी, इसलिये खुदाबख्श के दल का शब्द नही सुनाई पडा। जब तक गाव वाले सागरसिंह को सचेत करे कि खुदाबख्श ने सागरसिंह की हवेली घेर ली। उसको फाटक लगवा लेने का अवसर मिल गया। हवेली में उसके कुछ आदमी थे। वे सब जल्दी तैयार हो गये। सागरसिंह को आश्चर्य था कि कुऋतु और कुसमय पर किसने घेरा डालने की हिम्मत की। दीवारो के तीरकशो में होकर उसने परख लिया कि घेरने वालो के साथ तोप नही है और वे केवल घर में घुसकर ही
लक्ष्मीबाई २७६ नुकसान पहुचा सकते हैं । सोचा शाम तक यो ही पडा रहने दूँ और देखता रहूँ, फिर उसको ख्याल आया कि घेरने वाले रानी के सिपाही होगे और इनकी पीठ पर कुछ बन कही और लगा होगा । इसलिये उसने तुरन्त लड डालने की ठानी । वह जानता था कि घेरने वाले अधिक समय तक बन्दूक नही चला सकेंगे और वह स्वय सूखी जगह में बैठकर बहुत अच्छा और बडी देर तक लड सकेगा । हवेली टोरिया की ठीक चोटी पर न थी किन्तु अपराधी से जरा ऊपर । खुदाबख्श ने इस स्थिति से लाभ उठाने का प्रयत्न किया, परन्तु सागरसिंह की पहली वाढ ने ही खुदाबख्श के कई सिपाहियो को घायल कर दिया । खुदाबख्श ने तुरन्त हवेली पर चढ जाने की आज्ञा दी । स्वय आगे हो गया । जब तक सागरसिंह फिर बन्दूको को भरे, खुदाबख्श हवेली पर चढ गया और उसके कई साथी भी । सागरसिंह ने फिर वाढ दागी, परन्तु खाली गई । सागरसिंह ने समझ लिया कि अब गये । उसने तलवार हाथ में ली । खुदाबख्श और उसके साथी आँगन मे कूद पडे । सागरसिंह का मुकाबला न हो सका । खुदाबख्श घायल होकर गिर पडा । और सागरसिंह उसके साथियो को चीरता हुआ बाहर निकल गया । तब खुदाबख्श के अन्य सिपाही फाटक से होकर भीतर आगये । खुदाबख्श और उसके साथियो ने गाव में टिकना ठीक नही समझा । खुदाबख्श बैलगाडी से रात होते बरवासागर आ गया । घाव बहुत गहरे न थे, परन्तु थे कई, खून काफी निकल चुका था । उसकी और उसके घायल सिपाहियो की मरहम पट्टी की गई । रात में खुदाबख्श को बेहोशी रही । सबेरे रानी के पास समाचार भेज दिया गया ।
२८० झाँसी की रानी [ ५५ ] मेघ छाये हुये थे। हवा सन्न थी। पानी रिमझिम रिमझिम बरस रहा था। महल के ऊपरी खण्ड के हवाई कमरे में रानी आंखे मूँदे हुये मोतीबाई का भजन सुन रही थी। मुन्दर जमुहा रही थी। सुन्दर बैठे बैठे सावधानी के साथ निद्रामग्न हो गई थी। काशी सचेत थी। भजन की समाप्ति पर रानी का ध्यान टूटा, मुन्दर की जमुहाई हटी। परन्तु सुन्दर की निद्रा-समाधि भग्न न हुई। रानी ने हँसकर कहा, 'सुन्दर, देख यह भालू कहा से आ गया है? सुन्दर हडबड़ा गई। भौंचक्की होकर बोली, 'कहां है बाईसाहब?' 'ढूंढ तो पता लग जायगा', रानी ने कहा, 'साधारण भालू तो है नही।' सुन्दर लज्जित हो गई। हाथ जोड़कर बोली, 'सरकार दिन भर की थकी थी, इसलिये अभी अभी थोडी सी नीद आ गई।' काशीबाई—'सरकार, यह आज दिन भर चक्की चलाती रही है, इसलिये बहुत थक गई।' सुन्दर—'नही काशीबाई, चक्की नही चलाई तो और काम तो बहुत किया है।' मुन्दर—तुम अकेली ने !' उसी समय पहरे वाले ने निवेदन किया, 'बरवासागर से एक सिपाही आवश्यक समाचार लाया है।' रानी ने दूसरे कमरे में उसको बुलवाया। उनका आदेश था कि आवश्यक समाचार के लिये समय-कुसमय न देखा जावे और उनको तुरन्त सूचना दी जाया करे।' रानी सहेलियो के साथ दूसरे कमरे में गई । समाचार-वाहक ने कहा, 'सरकार, रावली के बागियो से सरदार खुदाबख्श की लडाई हुई। वे घायल हो गये हैं। सात सिपाही भी घायल
लक्ष्मीबाई २६१ हुये हैं। सरदार को तलवार के घाव लगे हैं और सिपाहियो को गोलियो के। भगवान की कृपा से मरे कोई नही हैं। और, न किसी के लिये इस तरह का भय है। सागरसिंह भाग गया है। लड़ाई रावली में सागरसिंह के घर पर हुई थी।' मोती का चहरा पीला पड गया। रानी ने पूछा, 'रावली बरवासागर से कितनी दूर है?' उसने उत्तर दिया, 'पाच-छ कोस है सरकार। जासूस ने पता दिया कि सागरसिंह अपने घर है। सरदार ने धावा बोल दिया।' रानी—'खुदाबख्श को कहा चोट आई है और अब क्या हाल है? लडाई को कितने दिन हो गये?' उत्तर—'लडाई को आज चौथा दिन है। घाव बाहो और जांघो में हैं सिर पर भी एक वार है। अच्छे हो रहे हैं। सिपाहियो के घाव अलबत्ता ज्यादा गहरे हैं।' रानी—'तुमको समाचार लाने मे इतना विलम्ब क्यो हुआ?' उत्तर—'बेतवा इतनी चढी हुई है कि नाव नही लग सकी, सरकार आज दोपहर कुछ उतरी तब आ पाया हूँ।' रानी—'प्रबन्ध करती हू। तुम जाओ।' रानी अपने कक्ष में लौट आईं। रानी ने कहा, 'कल बरवासागर चलना चाहिये।' काशी बोली, 'सरकार न जाये। कुछ ठीक नही किस समय जोर से पानी बरस पडे, नदी चढ आवे। उस दिन जब आपने बरवासागर जाने का निश्चय किया, में कुछ न कह सकी थी, परन्तु आज तो मैं हठ करुँगी।' रानी सोचने लगी। उन्होने मोतीबाई की उदासी देख ली, और पहिचान ली। रानी—'तुम ठीक कहती हो काशी। परन्तु स्थिति की मांग हम पर प्रबल है। यदि कल पानी न बरसा तो अच्छे घोड़ो पर चल देंगे। हाथी
२८२ झांसी की रानी भी जा सकता है, परन्तु मै इस समय प्रदर्शन बचाना चाहती हूँ, और वह सवारी बहुत धीमी भी है ।' मोतीबाई—'सरकार को कुछ घुडसवार साथ में ले लेने चाहिये ।' रानी—'लूंगी । दीवान रघुनाथसिंह को सबेरे सूचना दे देना ।' काशीबाई—'मै भी चलूंगी ।' रानी—'चलना, मैं क्या रोकती हूँ ?' मोतीबाई--'आज्ञा हो तो मै भी चलूं ।' रानी--'नाव न लगी तो घोडे पर नदी पार कर लेगी ?' मोतीबाई--'सरकार की सेवा में रहते, मुझको आग-पानी, किसी का भी डर नही रहा ।' रानी ने स्वीकृत किया । रात में पानी थोडा थोडा बरसता रहा । सबेरे बादल खुला सा दिखलाई दिया । रानी सहेलियो समेत बरवासागर की ओर चल दी । पच्चीस घुडसवार साथ में ले लिये । दीवान रघुनाथसिंह सङ्ग में । शीघ्र ही घाट पर यह दस्ता पहुच गया । देखे तो बेतवा दोनो पाट दाबे वेग से चली जा रही है । ऊपर ज्यादा पानी बरस गया था, इसलिये बेतवा बेतहाशा इठला गई । हवा, आँधी के रूप में चल रही थी । मल्लाहो के लिये नाव का लगाना असम्भव था । अनेक घुडसवारो के दिल टूटने लगे । उस पार की पहाडियो का लहरियादार सिलसिला हरियाली से ढका हुआ था । बादल के सफेद धूनरे टुकडे पहाडियो की चोटी और हरियाली को चूमने के लिये नभ से उतर उतर कर टकराते चले जा रहे थे । बेतवा का शोर आँधी का साथ पाकर तुमुल हो उठा । रानी ने मुडकर मोतीबाई की ओर देखा । वह उस पार की पहाडियो से टकराते हुये मेघ खण्डो पर दृष्टि जमाये थी । रानी ने आज्ञा दी, 'कूद पड़ो ।' और वे सबसे आगे घोडे पर पानी में धस गईं ।
लक्ष्मीबाई २८३ फिर क्या था, उनको सहेलियां और सब घुड़सवार धार को चीरते दिखलाई पड़ने लगे । रानी सबसे आगे । बेतवा की धार पुञ्ज के ऊपर पुञ्ज सी दिखलाई पड़ती थी । क्रम अभंग और अनन्त सा । जब एक क्षण में ही अनेक बार एक जलपुञ्ज दूसरे से सघर्ष खाता और एक, दूसरे से, आगे निकल जाने का अनवरत, अथक, अटूट प्रयास करता तब इतना फेनिल हो जाता कि सारी नदी में फेन ही फेन दिखलाई पड़ता था । झाग की इतनी बड़ी निरन्तर बहती और उत्पन्न होती हुई राशियां आड़े आ जाती थीं कि घुड़सवारों को सामने का किनारा नही दिखलाई पड़ पाता था । लहरो के एक पल्लड़ को चीरा, उस पर के झाग को बेधा कि दूसरा सामने । शब्दमय प्रवाह की निरर्थक भाषा मानो बार बार कहती थी बचो, बचो । सामने की उथल पुथल से आगे बढ़े कि बगल से थपेड़ पड़ी । घोड़े आँखें फाड़े नथनो से जल फुफकारते बढ़ रहे थे । वे अपना और अपने सवार का संकट समझ रहे थे । सवार के पैर घोड़े से चिमटे हुये और उनके पैरो के नीचे घोड़े की निस्तब्ध टाप । और टाप के नीचे ? न जाने कितनी गहराई । सवारो के चारो ओर भँवरे पड़ पड़ जा रही थी । एक भंवर बनी, पार की, कि दूसरी तुरन्त मौजूद । परन्तु अपनी रानी और उनकी सहेलियो को आगे देखकर किस सिपाही के मनमें अधिक समय तक भय ठहर सकता था ? रानी के घोड़े का केवल सिर ऊपर, शेष भाग पानी और झाग में । रानी की कमर तक झाग, पानी और धार के साथ बहकर आया हुआ झाड़ी-झंखाड़ । धार की बूँदो की झड़ी उचट उचट कर आखो में, बालो पर और सारे शरीर पर बरस रही थी । जब कभी सिपाहियो और सहेलियो को उत्साह देना होता तो हँस हँसकर शाबाशी देती—मानो प्रचण्ड बेतवा की मलिन अञ्जलि में मुक्ता बरसा दिये हो । घूमरे बादलो के आगे एक ओर बगुलो की पात निकल गई । मानो पहाड़ियो और पहाड़ियो से मिलने वाले बादलो को सफेद कोर लगा दी हो ।
२८४ झांसी की रानी पहाडो की कन्दराओ में घुसे हुये, उनको आच्छादित किये हुये वादलो में होकर वह वकुलावलि छिपती हुई सी मालूम पडी और फिर तितर-वितर हुई । जैसे हिलती हुई सावली सलोनी चादर में टके हुये सितारे । पहाड पर बडे बडे और सघन पेड । गहरे हरे श्यामल । बगुले एक पेड पर जा बैठे मानो वनदेवी ने प्रभा छिटका दी हो । उस विषम धार के पार थोडी देर में किनारा दिखलाई दिया । रानी फिर हँसी । बगुलो की सफेदी से रानी के दातो ने तुरन्त होड लगा दी । चिल्लाकर बोली, 'देखो किनारा आ गया । पडाव मार लिया ।' थोडी देर में पूरा दस्ता नदी पार हो गया । सब भीग गये थे परन्तु पीठ पर कसे ढके हुये हथियार लगभग सूखे थे । घोडे ठिठुर गये थे । घाट पर कपडे सुखाने, बदलने में और घोडो को आराम देने में थोडा सा समय लगा । फिर दौड लगी और रानी बरुआसागर के किले में दोपहर के करीब पहुँच गईं । बरवासागर का किला विशाल झील के ठीक ऊपर है । झील में बरवा नाम का बड़ा नाला पडता है । झील को विशालता इस नाले ने ही दी है । घायल सिपाही और खुदाबख्श इसी किले में पडे हुये थे । रानी ने तुरन्त इन सबको देखा । किसी के सिर पर हाथ फेरा, किसी की मरहमपट्टी की देखभाल की । सिपाही अपनी रानी के स्नेह को पाकर मुग्ध और गद्गद् हो गये । फिर खुदाबख्श के पास पहुँची । खुदाबख्श ने चारपाई से उठने का प्रयत्न किया, परन्तु न उठ सका । रानी को देखते ही उसके आंसू आ गये । चरण स्पर्श करने की कोशिश की ।
लक्ष्मीबाई २८५ रानी ने फिर सिर पर हाथ फेरा। चौकी पर बैठ गई। सहेलिया खडी थी। मोतीबाई सहेलियो के पीछे से खुदाबख्श को एकटक देख रही थी। खुदाबख्श ने उसको देख लिया, परन्तु आखे उसकी मोतीबाई की ओर न थी। खुदाबख्श ने रानी को सागरसिंह की लडाई का व्योरेवार हाल सुनाया। रानी—'कुछ पता चला सागरसिंह अब कहा चला गया है?' खुदाबख्श—'सरकार गाव वाले पता नही बतलाते। वे ही उसको शरण, भोजन इत्यादि सब देते हैं। इतना तो भी मालूम हो गया है कि वह पडोस के जगल मे है।' रानी—'गाव वाले डाकुओ से डरते हैं। उनके पास निर्भय होने का कोई साधन नही है। अग्रेजी राज्य ने पञ्चायतो का सर्वनाश कर दिया है इसलिये गावो में परस्पर सहायता की प्रणाली उठसी गई है और उसने डाकुओ को सहायता देने का रूप पकड़ लिया है। देखू गी। तुम चिन्ता मत करो।' खुदाबख्श—'अब सरकार स्वय यहा आगई हैं। मुझको किस बात की चिन्ता? घाव लगभग अच्छे होगये हैं। एकाध दिन में ठीक हुआ जाता हूँ। फिर देखता हूँ सागरसिंह को।' रानी ने उसको विश्राम करने का हठ किया। मोतीबाई को खुदाबख्श के पास छोडकर, किले के महल वाले हिस्से में चली गईं। स्नान ध्यान में लग गईं। अब मोतीबाई की आखे तरल हुई। रुद्ध कठ मुखरित होने के लिये आकुल हो गया। खुदाबख्श ने देख लिया। बोला, 'यह क्या ! आखो में आसू ! आपको तो हर्ष और गर्व से हँसना चाहिये था। आपका कैदी—नही आपकी सरकार का सिपाही अपने मालिक के लिये कुछ तो कर सका।' मोतीबाई ने आख पोछ कर कहा, 'क्या दर्द बहुत है।'
२८६ झांसी की रानी खुदाबख्श ने जवाब दिया, 'जरा भी नही। मालिक ने हाथ क्या फेरा, अमृत लुढका दिया । सच कहता हूं, अभी उनकी आज्ञा हो तो घोडे पर बैठकर उस अत्याचारी से दो हाथ करूं ।' फिर उसने करवट लेने की कोशिश की । जरा कष्ट हुआ । एक आह को दबाकर बोला, 'जान पडता है कि श्रीमन्त सरकार मेरे स्वस्थ होने तक नही ठहरेंगी ।' मोतीबाई ने सतृष्ण नेत्रो से कहा, 'मै भी उनके साथ जाऊँगी ।' खुदाबख्श ने आंख मीच ली । बोला, 'आप भी जाओगी ।' 'क्यो ? मुझे क्या हुआ ? उनकी छाया में आदमी आधी बन जाता है, तो औरत क्या आदमी भी नही बन सकती ।' मोतीबाई को रत्नावली नाटक में रंगमंच पर रत्नावली का अभिनय करते देखा था । स्मरण हो आया । एक साथ कोमलता और प्रसूनो के चित्र आंखो में घूम गये । खुदाबख्श ने एक निश्वास लिया । आंखे मूंदे ही बोला, 'मेरी मरहम-पट्टी के लिये रह जाना ।' मोतीबाई ने सस्नेह कहा, 'सरकार से कह देना । मैं खुशी से रह जाऊँगी ।' खुदाबख्श ने आंख खोली । भ्रुकुटि भंग की । जरा रुखाई के साथ बोला, 'श्रीमन्त सरकार से भिक्षा मागूंगा कि रत्नावली को सेवा टहल के लिये दे दीजिये ।' मोतीबाई ने उसकी उपेक्षा की । कहा, 'रत्नावली कौन ?' खुदाबख्श को आश्चर्य हुआ । बोला, 'क्या मैंने रत्नावली कहा ?' मोतीबाई हंसी । उसकी हंसी में चमत्कार था परन्तु खुदाबख्श पर कोई प्रभाव नही पडा । मोतीबाई—'रत्नावली ही तो कहा। क्या कोई सपना देख रहे थे ?' खुदाबख्श—'वह सपना था । अब मीठा जागरण सामने है ।'
लक्ष्मीबाई २८७ मोतीबाई ने खुदाबख्श की आखो में स्नेह को पकडने का प्रयत्न किया। बोली, 'तब मैं खुद तो उनसे नही कह सकूँगी। वह सोचेगी, मैं बहुत तुच्ची हूँ।' 'जी हा,' खुदाबख्श ने जरा सा सिर उठा कर कहा, 'आप चाहती हैं वह आपको बहादुर समझे और मुझे तुच्चा और निकम्मा।' 'मैंने यह तो नही कहा,' मोतीबाई बोली, 'खुदा करे आप जल्दी अच्छे हो जावें', और वह वहा से चली गई। ऊपर की छत को घेरे हुये किले की दीवार थी। दीवार में मुडेरदार खिडकी। उसमे होकर मोतीबाई झील की लहरो को परखने लगी-और रोने लगी। जब उसने रत्नावली का अभिनय किया था इतनी नही रोई थी। नियन्त्रण करके वह अपने काम में लग गई।
२८८ झाँसी की रानी [ ५६ ] सन्ध्या के पहले बरवासागर के मुखिया और पञ्च रानी से मिलने के लिये आये । नज़र न्योछावर हुई । रानी ने सबसे कुशलक्षेम की वार्ता की । जब एकान्त पाया थानेदार ने रानी को सागरसिंह के विषय में सूचना दी । मालूम हुआ कि खिसनी के जङ्गल में आश्रय पाये हुये हैं । खिसनी का जङ्गल बरवासागर से १२ मील था । थानेदार को उन्होने आदेश दिया । 'सवेरे आठ बजे तैयार रहना किसी को मालूम न होने पावे ।' सवेरे सब तैयार हो गये । ठीक समय पर उन्होने मोतीबाई को बुलाकर कहा, 'तुम यही रहो । खुदाबख्श की मरहम पट्टी और देख भाल करना ।' मोतीबाई ने पलके नीची की । बोली, 'मै तो सरकार की सेवा में चलूगी । क्या किसी ने प्रार्थना की है ?' 'नही, मैं ही कह रही हू,' रानी ने उत्तर दिया । मोतीबाई ने चलने का हठ किया । उनकी अन्य सहेलियो ने भी अनुरोध किया । रानी मान गई । रानी अपनी और बरवासागर के थाने की टुकडी को लिये हुये चल दी । उन्होने इस टुकडी के दो भाग किये । एक को दीवान रघुनाथसिंह की अधीनता में रावली की ओर रवाना किया और दूसरी को स्वय लेकर खिसनी के जङ्गल का ओर चलदी । दीवान रघुनाथसिंह ने सागरसिंह की हवेली घेर ली । एक गाव वाले से कहलवा भेजा, 'हथियार डालकर मेरे पास आ जाओ । रानी साहब कुछ रियायत कर देंगी, नही तो हवेली की ईंट से ईंट बजा दूँगा ।' गाव वाले ने कहा, 'कुंवर सागरसिंह हवेली में नही है ।' रघुनाथसिंह—'तब तो हवेली को पटक देने में और भी सुभीता रहेगा ।'
लक्ष्मीबाई २८६ परन्तु जब उसको निश्चय हो गया कि सागरसिंह हवेली में नही है, उसने रानी के पास सन्देशा खिसनी की ओर भेज दिया । खुद हवेली का घेरा डाले रहा । रानी जब जगल को घेरने की योजना तैयार कर रही थी, तब उनको यह सन्देशा मिला। उनका मन कह रहा था कि सागरसिंह इसी डाग में है। जासूस ने घन्टे भर के भीतर सूचना दी, 'दो पहाडियो की दून के सिरे पर एक बडी सी पर्णकुटी बागी खाने पीने की तार मे लगे हुये हैं। उनके पास घोडे हैं। रानी ने दोनो पहाडियो की ऊँचाइयाँ बन्दूक वालो से घिरवा ली और दून के सिरे पर भी कुछ आदमी भेज दिये । स्वय तीनो सहेलियो और मोतीबाई के साथ दून के निकास पर दो कतारो में ओट लेकर घोडो ॅ समेत ठहर गई । उनकी आज्ञा थी कि ऊपर वाले सिपाही धीरे धीरे दून के ढाल की ओर बढे और जब डाकुओ के जरा निकट आ जावें तब बन्दूको की बाढ दगे । ऐसा ही किया गया । डाकू बेहद हडबडा गये । खाना-पीना और साज-सामान छोडकर, घोडो पर न गी पीठ सवार हुये और दून के निकास की ओर भागे । ऊपर, तीन ओर से बन्दूके चल रही थी, परन्तु डाकुओ का एक आदमी भी घायल तक नही हुआ । निकास पर पहुँचते ही उनके ऊपर सामने से पाँच बन्दूके चली । घोडे मरे, डाकू घायल हुये । उन लोगो ने बन्दूको से जवाब दिया, परन्तु रानी का दल आड लिये हुये था । इसलिये कोई प्रभाव नही पडा । डाकू सिर पर पैर रखकर इधर-उधर भागे । काशी, सुन्दर और मोतीबाई ने अलग अलग पीछा किया । रानी और मुन्दर के पास से जो डाकू घोडे पर सवार, जरा पीछे निकला वह सतर्क था । नगी तलवार हाथ में, गले में सोने का जेवर ।
२६० झाँसी की रानी वस्त्र भी उसके अच्छे। जो वर्णन उनको सागरसिंह का मिला था, उससे इस डाकू-सवार की हुलिया मिलती थी। रानी ने निर्णय किया कि यही सागरसिंह है। रानी ने मुन्दर को मुस्कराकर इशारा किया। मुन्दर ने होठ दाबे और सपाटे के साथ उस पर टूटी। रानी दूसरी बगल से। सागरसिंह ने घोडा तेज किया। इन दोनो ने पीछा किया। जब तक मार्ग ऊवड-खावड रहा सागरसिंह वचता हुआ चला गया। जब मार्ग कुछ समस्थल आया, जमीन मुलायम और कीचड वाली मिली। सागरसिंह का घोडा अटकने लगा। रानी और मुन्दर के घोडे बहुत प्रबल थे—दोनो काठियावाडी। सागरसिंह को एक ओर से मुन्दर ने दबाया और दूसरी ओर से रानी ने। रानी गले में हीरो का दमदमाता हुआ कण्ठा डाले थी। उनको देखते ही सागरसिंह समझ गया कि जिस रानी के विषय में बहुत सुना करते थे, वह स्वय आज, इसी क्षण उसके प्राणो की गाहक बनकर आ कूदी है। आत्मरक्षा के भाव से प्रेरित होकर उसने रानी पर वार किया। तुरन्त मुन्दर ने चपल गति से अपनी तलवार उस पर ढाई। वार ओछा पडा, घोडे की पीठ पर। उधर रानी ने घोडे को फुर्ती के साथ जरासा रोका। वह कुछ अगुल पीछे हुई, और सागरसिंह का वार उनके आगे खिंच गया। रानी ने अपनी तलवार ऐसी कसी कि सागरसिंह की तलवार के दो टुकडे हो गये। उसने अपने घोडे को बहुत खीचा दावा, परन्तु उसकी पीठ कट चुकी थी। मुन्दर ने सागरसिंह की गर्दन को ताक कर तलवार उबारी कि रानी ने तुरन्त कहा, 'जीवित पकडना है,' और रानी ने इस तरकीब मे अपना घोडा सागरसिंह की वराबरी पर किया कि वह सट गया। रानी ने सागरसिंह की कमर में अपना हाथ डाला। मुन्दर समझ गई कि क्या करना है। दूसरी ओर से उसने अपना हाथ उसकी कमर में लपेट दिया। और झटका देकर घोड़े पर से उठा लिया। घोडा पीछे रह गया। सागरसिंह ने इस वज्रपाश में से निकलने, खिसकने की बहुत कोशिश की
लक्ष्मीबाई २६१ परन्तु वह सफल न हो सका । उसने अपने दातो को काम में लाने का प्रयत्न किया । रानी ने तुरन्त कहा, 'सावधान, यदि मुह खोला तो तलवार ठूंस दूंगी ।' सागरसिंह को रानी और मुन्दर के बल की प्रतीत हो गई और उसने अपनी रक्षा को अपने भाग्य के हवाले कर दिया । थोडी दूर चलने पर रानी के दस्ते के लोग सिमट आये । सागरसिंह उस वज्रपाश में से निकला और रस्सियो से बाध लिया गया । घोडे पर लाद कर यह टुकडी एक जगह ठहर गई । मोतीबाई, काशी और सुन्दर की बाट देखने लगी । रानी ने बिगुल बजवाया । वे तीनो थोडी देर में उस स्थल पर आ गईं । मालूम हुआ कि बाकी डाकू निकल भागे । दीवान रघुनाथसिंह को समाचार देकर रानी बरवासागर चली आईं । उन्होने कहा, ये भागे हुये डाकू इस समय हाथ न लगेंगे । समय काफी हो चुका है । बरवासागर सन्ध्या के पहले पहुँच जाना चाहिये ।' रानी सन्ध्या के पहले बरवासागर पहुँच गईं । सागरसिंह सख्त पहरे में रख दिया गया । रात होने के पहले रघुनाथसिंह अपने दल समेत आ गया । रानी की बुद्धि और विकट वीरता की घर घर महिमा बखानी जाने लगी । दूसरे दिन गांव गांव में चर्चा फैल गई । समय पर सागरसिंह रानी के सामने पेश किया गया । उसने प्रणाम किया और पैर छूने के लिये हाथ बढाने चाहे । पहरे वालो ने रोक लिया । रानी ने पूछा, 'तुम्हारा नाम ?' उसने उत्तर दिया, 'कुंवर सागरसिंह, श्रीमन्त सरकार ।' रानी मुस्कराई । सागरसिंह उस मुस्कराहट से कांप गया ।' रानी ने कहा, 'कुंवर होकर यह निकृष्ट आचरण कैसा ?' सागरसिंह बोला, 'सरकार, हमारा वश सदा लडाइयो में भाग लेता रहा है । महाराजा ओरछा की सेवा में लडा महाराज छत्रसाल की सेवा में रहकर युद्ध किये । जब अङ्गरेज आये तब उनकी आधीनता जिन
२६२ झाँसी की रानी ठाकुरो ने स्वीकार नही की, उनमे हम लोग भी थे । हमको जब दबाया गया, हम लोग बिगड खडे हुये और डाके डालने लगे । मैं अपने लिये और अपने साथियो के लिये गङ्गाजी की शपथ लेकर कह सकता हूँ कि हम-लोगो ने स्त्रियो और दीन-दरिद्रो को कभी नही सताया ।' रानी ने कहा, 'इन दिनो जिन लोगो पर तुमने डाके डाले वे सब मेरी प्रजा है, अङ्गरेजो की नही । डाके के लिये दण्ड प्राणो का है । तैयार हो आजो । तुम्हारे साथी भी न बचेगे और न तुम्हारे और उनके घर । मिट्टी मे मिलवा दूंगी ।' सागरसिंह ने कनखियो रानी को देखा । उसने इतनी बडी, ऐसी करारी और प्रभापूर्णा आँख न देखी थी । उसको ऐसा लगा मानो साक्षात् दुर्गा सामने खडी है । सागरसिंह बोला, 'सरकार, मै कुछ प्रार्थना कर सकता हू ?' रानी ने अनुमति दी । सागरसिंह ने प्रार्थना की, 'मुझको प्राणदण्ड गोली या तलवार से दिया जाय, फांसी से नही । यदि फांसी दी गई तो मेरा और जाति भर का अपमान होगा । बागी बढ जावेगे । घटेंगे नही सरकार ।' रानी—तुमको यदि छोडदूं तो क्या करोगे ?' सागरसिंह—'श्रीमन्त सरकार के सामने झूठ नही बोलूंगा । यदि काम न मिला तो फिर डाके डालूंगा, परन्तु सरकार के राज्य मे नही । रानी—'यदि मैं कहूँ कि तुम डाके बिलकुल न डालो तो इसके बदले मे क्या चाहोगे ?' सागरसिंह—'सरकार के चरणो की नौकरी, जहा रह कर लडाई में कल की अपेक्षा अधिक पराक्रम दिखला सकूँगा ।' रानी—'तुम्हारे साथी कितने हैं ?' सागरसिंह—'जङ्गल में १५, १६ थे । गावो में ६०, ६५ है और अदृष्ट सहायक मेरे सब नातेदार ।' रानी—'वे लोग क्या करेंगे ?'
लक्ष्मीबाई २६३ सागरसिंह—'सरकार की आज्ञा हुई तो सरकार की सेना में मेरे साथ नोकरी।' रानी—'यदि मैंने आज्ञा न दी तो ?' सागरसिंह— सरकार के राज्य के सिवाय और सब जगह उनकी बगावत का अधिकार-क्षेत्र चाहूंगा।' रानी—'तुमको मैं इसी समय छोड़ दूँ तो सीधे कहा जाओगे ?' सागरसिंह—'सरकार, झासी।' रानी—'तुम सबसे बडी सोगन्ध किसकी मानते हो ?' सागरसिंह—'गगाजी की। सरकार के चरणो की, अपनी तलवार की।' रानी—'मैं तुमको छोडती हू सागरसिंह। सौगन्ध खाओ और अपने साथियो सहित झासी की सेना में भर्ती होजाओ।' सागरसिंह ने सौगन्ध खाई। रानी ने उसको छोड़ दिया। वह उसके पैरो में गिर पडा। हाथ जोड कर बोला, 'सरकार मै झासी चलूँगा। वहा सेना में भर्ती होने के उपरान्त घर लौटूँगा और अपने साथियो की बटोर कर झासी ले आऊँगा। और उन सबको भर्ती कराऊँगा।' 'नही सागरसिंह,' रानी ने कहा, मै बरवासागर तब छोड़ूँगी जब तुम्हारे सब साथी मेरे सामने आ जायें और सौगन्ध खा जाये नही तो मैं उनको पकडूंगी और दड दूँगी।' 'मेरा नाम कु वर सागरसिंह नहीं जो मैंने सरकार के सामने सबो को पेश न किया।' सागरसिंह ने दम्भ को दबाते हुए कहा। आंख में झेंप थी। रानी जरा हँसी। सोचने लगी। बोली, 'तुमको कुँवर शब्द से सम्बोधन करने के पहले मेरा एक और सामन्त इस पदवी के पाने का पात्र है। वही जो तुमको पकडने के लिए तुम्हारी हवेली में पहुँच गया था और जिसको तमने घायल कर दिया था।'
२६४ झाँसी की रानी 'सरकार' सागरसिंह बोला, 'उस दिन यदि मैंने उस सामन्त को घायल न कर पाया होता तो मैं किसी प्रकार भी न बच पाता।' रानी—'वह यही है। अभी अस्वस्थ है।' सागरसिंह—'मैं उसके दर्शन करना चाहता हूँ। क्षमा माँगूँगा।' रानी ने खुदाबख्श की कुशलवार्ता मँगवाई। वह एक सिपाही का सहारा लेकर आ गया। सागरसिंह ने उसको अभिवादन किया। रानी ने कहा, 'क्या हाल है?' खुदाबख्श ने उत्तर दिया, 'इतने बड़े स्वामी की रक्षा होते हुये हाल बुरा हो ही नहीं सकता। जिस समय सरकार के पराक्रम की बात मालूम हुई उसी समय दुख दर्द एक स्वप्न सा हो गया।' रानी ने कहा, 'तुमने सुन लिया होगा कि मैंने अपराधी को छोड़ दिया है।' खुदाबख्श बोला, 'मैंने सरकार की दया का सब हाल सुन लिया।' रानी ने कहा, 'आज से तुम कुंवर खुदाबख्श कहलाओगे और यह कुँवर सागरसिंह। जितने लोग अनोखी सूरवीरी के काम करेंगे, वे सब कुँवर कहलायेंगे और उनका वर्ग कुँवर मंडली के नाम से राज्य के कागज़ पत्रो में सम्बोधित होगा।' खुदाबख्श गद्गद् हो गया। पैर छुये और बोला, 'सरकार, कुंवर मंडली का नाम सच्चा तब होगा जब कदमो की सेवा करते हुये हम सबके सिर कटे।' रानी ने कहा, 'जाओ कुँवर खुदाबख्श आराम करो।' खुदाबख्श बोला, 'माता का आशीर्वाद मिल गया अब आराम ही आराम है।' 'सागरसिंह,' रानी ने कहा, 'तुम्हारा नाम हमारे कागजो में कुँवर युक्त लिखा जावेगा, परन्तु मुझको बारबार कुँवर, राव, दीवान इत्यादि कहने में अड़चन जान पड़ती है। क्या बुरा मानोगे?'
लक्ष्मीबाई २६५ सागरसिंह का गला रुद्ध हो गया । जिस मनुष्य ने एक दीर्घ समय डकैती और वटमारी में विताया था उसको जान पड़ा मेरे भीतर कुछ पवित्र भी है । हाथ जोड कर बोला, 'नही सरकार, कभी नही । यदि मेरा आधा नाम ही लिया जायगा तो बहुत है । मुझको क्षमा किया जाय ।' कुवर रघुनाथसिंह ने कहा, 'जब हम लोग पूरे कुवर की पदवी पर पहुँच जावेगे तव हमारा नाम आधा लिया जावेगा ।'