भारतकोश
झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

पृष्ठ 304, कुल 526 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 304

लक्ष्मीबाई २६३ सागरसिंह—'सरकार की आज्ञा हुई तो सरकार की सेना में मेरे साथ नोकरी।' रानी—'यदि मैंने आज्ञा न दी तो ?' सागरसिंह— सरकार के राज्य के सिवाय और सब जगह उनकी बगावत का अधिकार-क्षेत्र चाहूंगा।' रानी—'तुमको मैं इसी समय छोड़ दूँ तो सीधे कहा जाओगे ?' सागरसिंह—'सरकार, झासी।' रानी—'तुम सबसे बडी सोगन्ध किसकी मानते हो ?' सागरसिंह—'गगाजी की। सरकार के चरणो की, अपनी तलवार की।' रानी—'मैं तुमको छोडती हू सागरसिंह। सौगन्ध खाओ और अपने साथियो सहित झासी की सेना में भर्ती होजाओ।' सागरसिंह ने सौगन्ध खाई। रानी ने उसको छोड़ दिया। वह उसके पैरो में गिर पडा। हाथ जोड कर बोला, 'सरकार मै झासी चलूँगा। वहा सेना में भर्ती होने के उपरान्त घर लौटूँगा और अपने साथियो की बटोर कर झासी ले आऊँगा। और उन सबको भर्ती कराऊँगा।' 'नही सागरसिंह,' रानी ने कहा, मै बरवासागर तब छोड़ूँगी जब तुम्हारे सब साथी मेरे सामने आ जायें और सौगन्ध खा जाये नही तो मैं उनको पकडूंगी और दड दूँगी।' 'मेरा नाम कु वर सागरसिंह नहीं जो मैंने सरकार के सामने सबो को पेश न किया।' सागरसिंह ने दम्भ को दबाते हुए कहा। आंख में झेंप थी। रानी जरा हँसी। सोचने लगी। बोली, 'तुमको कुँवर शब्द से सम्बोधन करने के पहले मेरा एक और सामन्त इस पदवी के पाने का पात्र है। वही जो तुमको पकडने के लिए तुम्हारी हवेली में पहुँच गया था और जिसको तमने घायल कर दिया था।'