झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)
Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography
वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२६२ झाँसी की रानी ठाकुरो ने स्वीकार नही की, उनमे हम लोग भी थे । हमको जब दबाया गया, हम लोग बिगड खडे हुये और डाके डालने लगे । मैं अपने लिये और अपने साथियो के लिये गङ्गाजी की शपथ लेकर कह सकता हूँ कि हम-लोगो ने स्त्रियो और दीन-दरिद्रो को कभी नही सताया ।' रानी ने कहा, 'इन दिनो जिन लोगो पर तुमने डाके डाले वे सब मेरी प्रजा है, अङ्गरेजो की नही । डाके के लिये दण्ड प्राणो का है । तैयार हो आजो । तुम्हारे साथी भी न बचेगे और न तुम्हारे और उनके घर । मिट्टी मे मिलवा दूंगी ।' सागरसिंह ने कनखियो रानी को देखा । उसने इतनी बडी, ऐसी करारी और प्रभापूर्णा आँख न देखी थी । उसको ऐसा लगा मानो साक्षात् दुर्गा सामने खडी है । सागरसिंह बोला, 'सरकार, मै कुछ प्रार्थना कर सकता हू ?' रानी ने अनुमति दी । सागरसिंह ने प्रार्थना की, 'मुझको प्राणदण्ड गोली या तलवार से दिया जाय, फांसी से नही । यदि फांसी दी गई तो मेरा और जाति भर का अपमान होगा । बागी बढ जावेगे । घटेंगे नही सरकार ।' रानी—तुमको यदि छोडदूं तो क्या करोगे ?' सागरसिंह—'श्रीमन्त सरकार के सामने झूठ नही बोलूंगा । यदि काम न मिला तो फिर डाके डालूंगा, परन्तु सरकार के राज्य मे नही । रानी—'यदि मैं कहूँ कि तुम डाके बिलकुल न डालो तो इसके बदले मे क्या चाहोगे ?' सागरसिंह—'सरकार के चरणो की नौकरी, जहा रह कर लडाई में कल की अपेक्षा अधिक पराक्रम दिखला सकूँगा ।' रानी—'तुम्हारे साथी कितने हैं ?' सागरसिंह—'जङ्गल में १५, १६ थे । गावो में ६०, ६५ है और अदृष्ट सहायक मेरे सब नातेदार ।' रानी—'वे लोग क्या करेंगे ?'