भारतकोश
झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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पृष्ठ 302

लक्ष्मीबाई २६१ परन्तु वह सफल न हो सका । उसने अपने दातो को काम में लाने का प्रयत्न किया । रानी ने तुरन्त कहा, 'सावधान, यदि मुह खोला तो तलवार ठूंस दूंगी ।' सागरसिंह को रानी और मुन्दर के बल की प्रतीत हो गई और उसने अपनी रक्षा को अपने भाग्य के हवाले कर दिया । थोडी दूर चलने पर रानी के दस्ते के लोग सिमट आये । सागरसिंह उस वज्रपाश में से निकला और रस्सियो से बाध लिया गया । घोडे पर लाद कर यह टुकडी एक जगह ठहर गई । मोतीबाई, काशी और सुन्दर की बाट देखने लगी । रानी ने बिगुल बजवाया । वे तीनो थोडी देर में उस स्थल पर आ गईं । मालूम हुआ कि बाकी डाकू निकल भागे । दीवान रघुनाथसिंह को समाचार देकर रानी बरवासागर चली आईं । उन्होने कहा, ये भागे हुये डाकू इस समय हाथ न लगेंगे । समय काफी हो चुका है । बरवासागर सन्ध्या के पहले पहुँच जाना चाहिये ।' रानी सन्ध्या के पहले बरवासागर पहुँच गईं । सागरसिंह सख्त पहरे में रख दिया गया । रात होने के पहले रघुनाथसिंह अपने दल समेत आ गया । रानी की बुद्धि और विकट वीरता की घर घर महिमा बखानी जाने लगी । दूसरे दिन गांव गांव में चर्चा फैल गई । समय पर सागरसिंह रानी के सामने पेश किया गया । उसने प्रणाम किया और पैर छूने के लिये हाथ बढाने चाहे । पहरे वालो ने रोक लिया । रानी ने पूछा, 'तुम्हारा नाम ?' उसने उत्तर दिया, 'कुंवर सागरसिंह, श्रीमन्त सरकार ।' रानी मुस्कराई । सागरसिंह उस मुस्कराहट से कांप गया ।' रानी ने कहा, 'कुंवर होकर यह निकृष्ट आचरण कैसा ?' सागरसिंह बोला, 'सरकार, हमारा वश सदा लडाइयो में भाग लेता रहा है । महाराजा ओरछा की सेवा में लडा महाराज छत्रसाल की सेवा में रहकर युद्ध किये । जब अङ्गरेज आये तब उनकी आधीनता जिन