झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)
Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography
वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२६० झाँसी की रानी वस्त्र भी उसके अच्छे। जो वर्णन उनको सागरसिंह का मिला था, उससे इस डाकू-सवार की हुलिया मिलती थी। रानी ने निर्णय किया कि यही सागरसिंह है। रानी ने मुन्दर को मुस्कराकर इशारा किया। मुन्दर ने होठ दाबे और सपाटे के साथ उस पर टूटी। रानी दूसरी बगल से। सागरसिंह ने घोडा तेज किया। इन दोनो ने पीछा किया। जब तक मार्ग ऊवड-खावड रहा सागरसिंह वचता हुआ चला गया। जब मार्ग कुछ समस्थल आया, जमीन मुलायम और कीचड वाली मिली। सागरसिंह का घोडा अटकने लगा। रानी और मुन्दर के घोडे बहुत प्रबल थे—दोनो काठियावाडी। सागरसिंह को एक ओर से मुन्दर ने दबाया और दूसरी ओर से रानी ने। रानी गले में हीरो का दमदमाता हुआ कण्ठा डाले थी। उनको देखते ही सागरसिंह समझ गया कि जिस रानी के विषय में बहुत सुना करते थे, वह स्वय आज, इसी क्षण उसके प्राणो की गाहक बनकर आ कूदी है। आत्मरक्षा के भाव से प्रेरित होकर उसने रानी पर वार किया। तुरन्त मुन्दर ने चपल गति से अपनी तलवार उस पर ढाई। वार ओछा पडा, घोडे की पीठ पर। उधर रानी ने घोडे को फुर्ती के साथ जरासा रोका। वह कुछ अगुल पीछे हुई, और सागरसिंह का वार उनके आगे खिंच गया। रानी ने अपनी तलवार ऐसी कसी कि सागरसिंह की तलवार के दो टुकडे हो गये। उसने अपने घोडे को बहुत खीचा दावा, परन्तु उसकी पीठ कट चुकी थी। मुन्दर ने सागरसिंह की गर्दन को ताक कर तलवार उबारी कि रानी ने तुरन्त कहा, 'जीवित पकडना है,' और रानी ने इस तरकीब मे अपना घोडा सागरसिंह की वराबरी पर किया कि वह सट गया। रानी ने सागरसिंह की कमर में अपना हाथ डाला। मुन्दर समझ गई कि क्या करना है। दूसरी ओर से उसने अपना हाथ उसकी कमर में लपेट दिया। और झटका देकर घोड़े पर से उठा लिया। घोडा पीछे रह गया। सागरसिंह ने इस वज्रपाश में से निकलने, खिसकने की बहुत कोशिश की