झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)
Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography
वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंलक्ष्मीबाई २८६ परन्तु जब उसको निश्चय हो गया कि सागरसिंह हवेली में नही है, उसने रानी के पास सन्देशा खिसनी की ओर भेज दिया । खुद हवेली का घेरा डाले रहा । रानी जब जगल को घेरने की योजना तैयार कर रही थी, तब उनको यह सन्देशा मिला। उनका मन कह रहा था कि सागरसिंह इसी डाग में है। जासूस ने घन्टे भर के भीतर सूचना दी, 'दो पहाडियो की दून के सिरे पर एक बडी सी पर्णकुटी बागी खाने पीने की तार मे लगे हुये हैं। उनके पास घोडे हैं। रानी ने दोनो पहाडियो की ऊँचाइयाँ बन्दूक वालो से घिरवा ली और दून के सिरे पर भी कुछ आदमी भेज दिये । स्वय तीनो सहेलियो और मोतीबाई के साथ दून के निकास पर दो कतारो में ओट लेकर घोडो ॅ समेत ठहर गई । उनकी आज्ञा थी कि ऊपर वाले सिपाही धीरे धीरे दून के ढाल की ओर बढे और जब डाकुओ के जरा निकट आ जावें तब बन्दूको की बाढ दगे । ऐसा ही किया गया । डाकू बेहद हडबडा गये । खाना-पीना और साज-सामान छोडकर, घोडो पर न गी पीठ सवार हुये और दून के निकास की ओर भागे । ऊपर, तीन ओर से बन्दूके चल रही थी, परन्तु डाकुओ का एक आदमी भी घायल तक नही हुआ । निकास पर पहुँचते ही उनके ऊपर सामने से पाँच बन्दूके चली । घोडे मरे, डाकू घायल हुये । उन लोगो ने बन्दूको से जवाब दिया, परन्तु रानी का दल आड लिये हुये था । इसलिये कोई प्रभाव नही पडा । डाकू सिर पर पैर रखकर इधर-उधर भागे । काशी, सुन्दर और मोतीबाई ने अलग अलग पीछा किया । रानी और मुन्दर के पास से जो डाकू घोडे पर सवार, जरा पीछे निकला वह सतर्क था । नगी तलवार हाथ में, गले में सोने का जेवर ।