झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)
Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography
वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२८८ झाँसी की रानी [ ५६ ] सन्ध्या के पहले बरवासागर के मुखिया और पञ्च रानी से मिलने के लिये आये । नज़र न्योछावर हुई । रानी ने सबसे कुशलक्षेम की वार्ता की । जब एकान्त पाया थानेदार ने रानी को सागरसिंह के विषय में सूचना दी । मालूम हुआ कि खिसनी के जङ्गल में आश्रय पाये हुये हैं । खिसनी का जङ्गल बरवासागर से १२ मील था । थानेदार को उन्होने आदेश दिया । 'सवेरे आठ बजे तैयार रहना किसी को मालूम न होने पावे ।' सवेरे सब तैयार हो गये । ठीक समय पर उन्होने मोतीबाई को बुलाकर कहा, 'तुम यही रहो । खुदाबख्श की मरहम पट्टी और देख भाल करना ।' मोतीबाई ने पलके नीची की । बोली, 'मै तो सरकार की सेवा में चलूगी । क्या किसी ने प्रार्थना की है ?' 'नही, मैं ही कह रही हू,' रानी ने उत्तर दिया । मोतीबाई ने चलने का हठ किया । उनकी अन्य सहेलियो ने भी अनुरोध किया । रानी मान गई । रानी अपनी और बरवासागर के थाने की टुकडी को लिये हुये चल दी । उन्होने इस टुकडी के दो भाग किये । एक को दीवान रघुनाथसिंह की अधीनता में रावली की ओर रवाना किया और दूसरी को स्वय लेकर खिसनी के जङ्गल का ओर चलदी । दीवान रघुनाथसिंह ने सागरसिंह की हवेली घेर ली । एक गाव वाले से कहलवा भेजा, 'हथियार डालकर मेरे पास आ जाओ । रानी साहब कुछ रियायत कर देंगी, नही तो हवेली की ईंट से ईंट बजा दूँगा ।' गाव वाले ने कहा, 'कुंवर सागरसिंह हवेली में नही है ।' रघुनाथसिंह—'तब तो हवेली को पटक देने में और भी सुभीता रहेगा ।'