झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)
Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography
वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा
DevanagariHindipublished526 पृष्ठ
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लक्ष्मीबाई २८७ मोतीबाई ने खुदाबख्श की आखो में स्नेह को पकडने का प्रयत्न किया। बोली, 'तब मैं खुद तो उनसे नही कह सकूँगी। वह सोचेगी, मैं बहुत तुच्ची हूँ।' 'जी हा,' खुदाबख्श ने जरा सा सिर उठा कर कहा, 'आप चाहती हैं वह आपको बहादुर समझे और मुझे तुच्चा और निकम्मा।' 'मैंने यह तो नही कहा,' मोतीबाई बोली, 'खुदा करे आप जल्दी अच्छे हो जावें', और वह वहा से चली गई। ऊपर की छत को घेरे हुये किले की दीवार थी। दीवार में मुडेरदार खिडकी। उसमे होकर मोतीबाई झील की लहरो को परखने लगी-और रोने लगी। जब उसने रत्नावली का अभिनय किया था इतनी नही रोई थी। नियन्त्रण करके वह अपने काम में लग गई।